भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 482 में से

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पृष्ठ 122
६४वेदान्तपरिभाषा[ विषयप्रत्यक्षविचारः

उच्यते। प्रमात्रभेदो नाम न ^१तदैक्यम्, किन्तु प्रमातृसत्ताऽतिरिक्तसत्ताकत्वाभावः। तथा च^२ घटादेः स्वावच्छिन्नचैतन्ये^३ऽध्यस्ततया विषयचैतन्यसत्तैव घटादिसत्ता, अधिष्ठानसत्ताऽतिरिक्ताया आरोपितसत्ताया अनङ्गीकारात्। विषयचैतन्यञ्च पूर्वोक्तप्रकारेण प्रमातृचैतन्यमेवेति प्रमातृचैतन्यस्यैव घटाद्यधिष्ठानतया प्रमातृसत्तैव घटादिसत्ता नान्येति सिद्धं घटादेरपरोक्षत्वम् ॥

अर्थ—'विषय का प्रमात्रभेद कैसे' यदि पूछो तो कहते हैं—'प्रमात्रभेद' (प्रमातृ + अभेद) का अर्थ प्रमात्रैक्य (प्रमातृ + ऐक्य) नहीं। किन्तु 'अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य रूप प्रमाता की सत्ता से भिन्न, घटादिविषय की सत्ता का अभाव' ही यहाँ 'प्रमात्रभेद' शब्द से विवक्षित है। अतः घटादिविषयों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य में घटादि विषयों का अध्यारोप (अध्यास) हुआ होने से विषयचैतन्य-सत्ता ही घटादिविषयों की सत्ता है। क्योंकि हम (वेदान्ती) अधिष्ठान की सत्ता से, आरोपित की सत्ता को भिन्न नहीं मानते। पूर्वोक्त प्रकार से प्रमातृचैतन्य ही विषयचैतन्य है। प्रमातृचैतन्य में घटादिविषयों की अधिष्ठानता होने से प्रमातृसत्ता ही घटादिसत्ता है, उससे भिन्न नहीं। इससे घटादिकों का अपरोक्षत्व (प्रत्यक्षत्व) सिद्ध हुआ।

विवरण—प्रमात्रभेद का अर्थ यदि यहाँ ऐसा होता कि "घटादि विषय और घटाद्यवच्छिन्न या अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य का ऐक्य" तो विरोध हुआ होता' परन्तु यहाँ 'विषय और चैतन्य का (घटादि विषयों का प्रमाता से ऐक्य) ऐक्य' रूप अर्थ विवक्षित नहीं। अर्थात् 'अभेद' का अर्थ 'ऐक्य' न होकर 'प्रमातृलक्षण जो सत्ता, वही प्रमेय सत्ता है, अर्थात् प्रमातृसत्ता से विषय की सत्ता का पृथक् न रहना' यही प्रमातृभेद शब्द का अर्थ है। यहाँ 'सत्ता' शब्द का अर्थ 'प्रमाता में रहनेवाली सत्तारूप जाति' नहीं है। कारण प्रमाता, और प्रमेय, (विषय) में रहनेवाली जो 'सत्ता' जाति उसके एक (अभिन्न) ही होने से प्रमातृनिष्ठ सत्ता से अतिरिक्त प्रमातृत्व व प्रमेयत्व (स्वरूप) सत्ता असिद्ध है। इस प्रकार सत्तैक्यरूप प्रमात्रभेद के होने से तात्पर्य यह निकलता है कि घटादि-विषय, घटाद्यवच्छिन्न-चैतन्य में आरोपित है। अतः विषय-चैतन्य की जो सत्ता है, वही घटादि-विषयों की सत्ता है। अर्थात् आरोपित घटादि-विषयों की सत्ता, अधिष्ठानरूप विषयावच्छिन्न-चैतन्य की सत्ता से पृथक् नहीं है। क्योंकि हम


१. 'तावदै०'-इति पाठान्तरम्।
२. 'हि'-इति पाठान्तरम्।
३. 'चैतन्याध्यस्त०' इति पाठान्तरम्।