भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 482 में से

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पृष्ठ 123

विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६५

'अधिष्ठान की सत्ता से आरोपित की सत्ता को पृथक् नहीं मानते' । शुक्ति रूप अधिष्ठान की सत्ता से आरोपित रजत की सत्ता पृथक् नहीं है । शुक्ति की सत्ता से ही शुक्तिरजत 'सत्तावत्' हुए की तरह प्रतीत होता है ।

पूर्वोक्त तडागोदकन्याय के अनुसार (जैसे तडागोदक ही केदारोदक होता है) प्रमातृचैतन्य ही विषयचैतन्य ( प्रमेयचैतन्य ) है । उस कारण प्रमातृचैतन्य ही घटादिविषयों का अधिष्ठान है । आरोपित घटादिकों का अधिष्ठान प्रमातृचैतन्य होने से प्रमातृचैतन्य की सत्ता ही घटादिकों की सत्ता है । प्रमातृचैतन्य की सत्ता से घटादि विषयों की सत्ता पृथक् नहीं है । इसलिये प्रमातृ-( प्रमाता ) की सत्ता से घटादिविषयों की सत्ता का अतिरिक्त (भिन्न) न होना ही घटादिकों को अपरोक्षत्व (प्रत्यक्ष) है । चैतन्य के नित्य होने से उसकी सत्ता भी नित्य है । परन्तु प्रमातृचैतन्य, प्रमाणचैतन्य और विषयचैतन्य ( प्रमेयचैतन्य ) इस ( चैतन्य ) भेद के औपाधिक होने से उनकी सत्ता अनित्य है । घट, पट आदि विषयों को देखते समय उस उस विषय से सम्बद्ध वह वह त्रिपुटीरूप चैतन्य (घटप्रमातृ-चैतन्य, घटाकारवृत्तिचैतन्य और घटविषयचैतन्य) भी नवीन उत्पन्न हो रहा है ऐसा प्रतीत होता है । इसीलिये ऊपर प्रमातृसत्ता का अर्थ प्रमातृलक्षणसत्ता बता चुके हैं, तन्निष्ठ सत्ताजाति नहीं । उस उस विषय के प्रमाता की जो सत्ता, वही उस उस प्रमेय की सत्ता है, यह तात्पर्य है । इस प्रकार घटादि-विषय का 'प्रमात्रभेद' का अर्थ प्रमातृचैतन्याभेद नहीं है, और अभेद का अर्थ ऐक्य भी नहीं, किन्तु प्रमाता की सत्ता ही घट की सत्ता है । अब मूल में 'प्रमातृचैतन्य' न कहकर 'प्रमातृ' ही क्यों कहा गया ? उसे कहते हैं—

अनुमित्यादिस्थले¹ त्वन्तःकरणस्य वह्न्यादिदेशनिर्गमनाभावेन-
वह्न्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्यानात्मकतया वह्न्यादिसत्ता
प्रमातृसत्तातो भिन्नेति नातिव्याप्तिः ।

**अर्थ—**परन्तु अनुमिति आदि ज्ञानों में अन्तःकरण, वृत्ति के द्वारा अनुमेय वह्नि आदि के देश में नहीं जाता । उस कारण वह्न्यवच्छिन्न-चैतन्य को प्रमातृचैतन्यरूपता नहीं है । इसी से वह्नि आदि की सत्ता, प्रमातृसत्ता से भिन्न है । इस कारण पूर्वोक्त घटादिविषय के प्रत्यक्ष-लक्षण की अनुमेय वह्नि आदि परोक्ष-विषयों में अतिव्याप्ति नहीं होती ।

**विवरण—**घटादि-विषयों के प्रत्यक्ष में प्रयोजक 'प्रमात्रभिन्नत्व' को यदि बतावें तो अनुमेय विषयों में ( अनुमिति के विषयों में ) अतिव्याप्ति होगी । क्योंकि 'प्रमात्रभिन्नत्व' का अर्थ 'प्रमातृचैतन्याभिन्नत्व' करने से अनुमेय वह्नि आदि की सत्ता, चैतन्य


१. 'लेऽन्तः'–इति पाठान्तरम् ।