भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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६६वेदान्तपरिभाषा[ विषयप्रत्यक्षविचारः

की सत्ता से पृथक् ( भिन्न ) नहीं है । ऐसी शंका हो सकती है । परन्तु अनुमेय विषय की सत्ता, चैतन्य की सत्ता से पृथक् न होने पर भी अनुमेय विषय प्रमातृरूप नहीं होता, इसलिये अतिव्याप्ति नहीं है । घटादि के प्रत्यक्ष-ज्ञानों में अन्तःकरण-वृत्ति, घटादि-विषयों के प्रदेश में जाकर विषय के आकार को धारण करती है । इसलिये वहाँ घटादि विषयों का प्रमाता के साथ अभेद ( प्रमात्रभेद ) सम्भव होता है । परन्तु अनुमिति आदि ज्ञानों में अन्तःकरण-वृत्ति, विषय के प्रदेश में नहीं जाती । इसलिये वहाँ वह्न्यवच्छिन्न-चैतन्य और प्रमातृचैतन्य इन दोनों का अभेद नहीं होता । अतः अनुमिति विषय की सत्ता, प्रमातृसत्ता से भिन्न है । इसी कारण विषयगत-प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक-लक्षण की अनुमेय विषय में अतिव्याप्ति नहीं होती । लक्षण में इसीलिये 'चैतन्य' पद न रखकर 'प्रमात्रभेद' शब्द रखा गया है ।

इस पर पुनः वादी दूसरे प्रकार से अतिव्याप्ति की शंका करता है और सिद्धान्ती उसका थोड़े में ही निरसन करता है ।

नन्वेवमपि धर्माधर्मादिगोचरानुमित्यादिस्थले धर्माधर्मयोः प्रत्यक्षत्वापत्तिः, ^१'धर्माद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्याभिन्नतया धर्मादिसत्तायाः प्रमातृसत्तानतिरेकादिति चेत् । न । योग्यत्वस्यापि विषयविशेषणत्वात् ।

अर्थ—'प्रमात्रभेद' का अर्थ 'प्रमातृसत्ता से विषयसत्ता का भिन्न न रहना' मानने पर भी धर्माधर्म आदि परोक्ष पदार्थों को विषय करने वाले अनुमिति आदि स्थलों में धर्माधर्म के प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त होगा । क्योंकि प्रमातृचैतन्य से धर्माधर्मादि-विषयावच्छिन्न-चैतन्य का यहाँ पर अभेद है ही । ( विषयचैतन्य और प्रमातृचैतन्य का अभेद है ) उस कारण धर्मादिसत्ता, प्रमातृसत्ता से भिन्न नहीं है । इसलिए विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक जो प्रमात्रभेद, उसकी परोक्ष धर्मादि-विषय में अतिव्याप्ति बताना उचित नहीं है, क्योंकि 'योग्यत्व' को भी विषयविशेषणत्व है, अर्थात् विषय में 'योग्य' इस विशेषण के लगाने से अतिव्याप्ति का निवारण होता है । क्योंकि धर्माधर्मादिकों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है ( प्रत्यक्ष के योग्य विषय 'धर्माधर्मादि' नहीं है ) ।

विवरण—'प्रमाता की प्रमातृलक्षणसत्ता से प्रमेय की सत्ता का पृथक् न होना' इस लक्षण की पूर्वोक्त प्रकार से अतिव्याप्ति, अनुमेय वह्नि आदि विषयों में अन्तःकरण के न जाने से न होने पर भी धर्म आदि परोक्षविषयक अनुमितिज्ञान में अतिव्याप्ति होती है अर्थात् धर्मादिकों का प्रत्यक्ष होता है कहना पड़ेगा । क्योंकि धर्मादि विषयों से अवच्छिन्न अन्तःकरणस्थ-चैतन्य और प्रमातृचैतन्य का अभेद होने से धर्मादि की


१. 'धर्माधर्माद्यव०'-इति पाठान्तरम् ।