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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 482 में से

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पृष्ठ 125

विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६७

सत्ता प्रमातृचैतन्य से भिन्न नहीं है । इस अतिव्याप्ति के वारण के लिए लक्षणगत 'विषय' में 'योग्य' विशेषण के देने से धर्मादिकों के प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त नहीं होगा। यह समाधान दिया गया है।

किसी भी वादी के मत में 'धर्माधर्म पदार्थ' प्रत्यक्ष के योग्य नहीं है। सभी दार्शनिक धर्माधर्म को परोक्ष ही मानते हैं। इससे ( 'योग्य विषयावच्छिन्न चैतन्य' और प्रमाता के अभेद को विषयगत प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक मानने से ) धर्माधर्मादि-परोक्ष-विषय में अतिव्याप्ति नहीं होने पाती ।

तथापि वादी पुनः दूसरे प्रकार से अतिव्याप्ति की शंका करता है—

नन्वेवमपि रूपी घट इति प्रत्यक्षस्थले घटगतपरिमाणादेः प्रत्यक्षत्वापत्तिः रूपावच्छिन्न-चैतन्यस्य परिमाणाद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य चैकतया रूपावच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमातृचैतन्याभेदे परिमाणाद्यवच्छिन्न-चैतन्यस्यापि प्रमात्रभिन्नतया परिमाणादिसत्तायाः प्रमातृसत्ताऽतिरिक्तत्वाभावादिति चेत् ।

**अर्थ—**पूर्वोक्त प्रकार से ( 'विषय' में 'योग्य' विशेषण के देने पर भी ) धर्मादि-परोक्ष-विषयों में विषयगतप्रत्यक्षत्व-प्रयोजक-लक्षण की अतिव्याप्ति न होने पर भी 'यह घट रूपवान् हैं' इस प्रत्यक्षप्रमा में घटगत-परिमाणादिकों का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि रूपावच्छिन्नचैतन्य और परिमाणावच्छिन्न-चैतन्य, दोनों का अभेद है । इस अभेद के कारण रूपावच्छिन्न चैतन्य का प्रमातृचैतन्य से अभेद सिद्ध होने के कारण परिमाणावच्छिन्न-चैतन्य का भी प्रमातृभिन्नत्व सिद्ध होता है । जिससे परिमाणादि सत्ता प्रमातृसत्ता से पृथक् प्रतीत नहीं होती ।

अर्थात् प्रमातृसत्ता ही परिमाणसत्तारूप होने से घटरूप के प्रत्यक्ष ज्ञान में घटगत-परिमाणादिकों का भी ज्ञान होने लगेगा । जिससे पूर्वोक्त प्रत्यक्षलक्षण की अलक्ष्य-भूत घटगत-परिमाणादि में अतिव्याप्ति होती है ।

**विवरण—**जिस समय घट के रूप का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है उसी समय घटगत परिमाण का भी प्रत्यक्ष होता है अतः उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति होती है। रूप-प्रत्यक्ष होने के समय घट-परिमाण का भी प्रत्यक्ष होता है यह मानना होगा । क्योंकि रूपावच्छिन्न चैतन्य ही परिमाणावच्छिन्न चैतन्य है इसलिए परिमाणादिकों की सत्ता प्रमातृसत्ता से भिन्न नहीं है, कारण यह है कि परिमाणादि कल्पित होने से उनके अधिष्ठानभूत चैतन्य की सत्ता ही परिमाणादिकों की सत्ता है । और स्वाधिष्ठानभूत चैतन्य के प्रमातृरूप होने से पूर्वोक्त लक्षण की परिमाण आदि में अतिव्याप्ति होती है ।

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