वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ वेदान्तपरिभाषा [ विषयप्रत्यक्षविचारः
इस प्रकार वादी के शंका करने पर सिद्धान्ती 'न' से निरसन की प्रतिज्ञा करके 'तत्तदाकार०' आदि ग्रन्थ से उपर्युक्त शंका का निरसन करता है—
न। तत्तदाकारवृत्त्युपहितत्वस्यापि प्रमातृविशेषणत्वात् । रूपा- कारवृत्तिदशायां परिमाणाद्याकार-वृत्त्यभावेन परिमाणाद्याकार-वृत्त्यु- पहित-प्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्वाभावेनाऽतिव्याप्त्यभावात् ॥
अर्थ—( 'रूपी घटः' यह रूपवान् घट है, इस रूपप्रत्यक्षस्थल में घटगत-परिमाण आदि का भी प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त होने का भय करना व्यर्थ है ) पूर्व-प्रदर्शित अतिव्याप्ति नहीं हो पाती । क्योंकि 'प्रमात्रभेद' इस लक्षण के 'प्रमातृ' पद का विशेषण है 'तत्तदाकारवृत्त्युपहितत्व' । इसलिए भिन्न-भिन्न विषयाकार वृत्तिरूप उपाधि से उपहित ( युक्त ) हुए प्रमाता की सत्ता से उन उन विषयों की पृथक् सत्ता का न होना ही विषयगत-प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक है । तात्पर्य यह हुआ कि अन्तःकरणवृत्ति जब रूपाकार होती है तब वह घटगत-परिमाणादि के आकार की नहीं रहती । अर्थात् रूपाकार-वृत्ति के समय परिमाणाकार-वृत्ति का अभाव रहता है । इसलिए परिमाणा-कारवृत्त्युपहित-प्रमातृचैतन्य से परिमाणादि विषय की सत्ता अभिन्न नहीं होती । ( उन विषयों में प्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्व नहीं होता ) इसलिए 'रूपी घटः' इस प्रत्यक्ष के समय परिमाणादि विषयों का प्रत्यक्ष प्राप्त नहीं होता । अर्थात् विषयगत प्रत्यक्ष के प्रयोजक का लक्षण अतिव्याप्त नहीं है ।
विवरण— घटगत-परिमाण की सत्ता प्रमातृसत्ता, से पृथक् न होने पर भी ( उन दोनों का सत्ताकाल एक होने पर भी ) जिस समय घट का प्रमाता विद्यमान है उसी समय घट में घटगत-रूप से भिन्न गुणों के रहने पर भी तत्तदाकार (परिमाणाद्याकार) वृत्ति से युक्त प्रमातृचैतन्य की सत्ता से परिमाणादि विषयों की सत्ता भिन्न होने से पूर्वोक्त लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं ।
इस प्रकार विषयगत-प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक का लक्षण 'प्रमात्रभेद' बताकर लक्षणगत 'अभेद' का अर्थ 'ऐक्य' नहीं, किन्तु प्रमातृसत्ता से प्रमेयसत्ता का अभिन्न ( भिन्न न ) होना अर्थात् प्रमाता की जो सत्ता, वही विषय ( प्रमेय ) की सत्ता है, ( इस प्रकार 'अभेद' का अर्थ ) बताकर, इस लक्षण की अनुमिति आदि में अतिव्याप्ति का न होना बताया । धर्माधर्मादि परोक्ष स्थलों में अतिव्याप्ति के निवारणार्थ 'विषय' में 'प्रत्यक्ष-योग्य' विशेषण लगाने के लिए कहा । 'रूपी घटः' प्रत्यक्ष के समय घटगत परिमाणादि गुणों में अतिव्याप्ति नहीं होती, यह भी दिखाया । अब इसके आगे वादी 'विषयगत-प्रत्यक्षत्व' प्रयोजक के लक्षण में अव्याप्ति को दिखाता है ।