वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६९
नन्वेवं वृत्तावव्याप्तिः, अनवस्थाभिया वृत्तिगोचर-वृत्त्यनङ्गीकारेण तत्र स्वाकारवृत्त्युपहितत्वघटितोक्तलक्षणाभावात् ।
अर्थ— घटगत-परिमाण में अतिव्याप्ति के निवारणार्थ 'तत्तदाकारवृत्त्युपहित' विशेषण से प्रमाता को विशेषित करने पर भी 'वृत्ति' में पूर्वोक्त लक्षण की अव्याप्ति होती है। क्योंकि अनवस्था के भय से 'वृत्ति' को विषय करने वाली 'दूसरी वृत्ति' के स्वीकार न करने के कारण वृत्ति में 'वृत्त्याकारवृत्त्युपहितप्रमात्रभेद' लक्षण घटित नहीं हो पाया।
विवरण— सभी जड पदार्थ अज्ञान से आवृत होने से स्वतः प्रकाशमान नहीं होते। किन्तु उस पदार्थविषयक-वृत्ति के द्वारा आवरण का भङ्ग होने पर प्रकाशित होते हैं। घटादि जैसे जड़ है उसी तरह अन्तःकरणवृत्ति भी जड़ (अचेतन) है। अतः घटादिविषय जैसे वृत्ति से ही प्रकाशित होते हैं वैसे ही वृत्ति भी दूसरी अन्तःकरणवृत्ति से ही प्रकाशित होने के योग्य है। क्योंकि वृत्ति के जड़ होने से घट की तरह उसका स्वयं भान होना सम्भव नहीं। इसलिए उस वृत्ति के आवरणभंग के हेतु, वृत्ति-विषयक दूसरी वृत्ति की आवश्यकता है। क्योंकि जड़-पदार्थ के आवरण को भंग करनेवाली वृत्ति ही है। परन्तु एक वृत्ति के आवरणभंगार्थ दूसरी वृत्ति के मानने पर उसके आवरण भङ्ग के लिए तीसरी, उसके आवरण भंग के लिए चौथी इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होती है। और यदि वृत्ति को ही न माना जाय, तो बिना उसके जड़ वस्तु का भान होना सम्भव नहीं। ऐसी 'उभयतःपाशा रज्जु' सिद्धान्ती के गले पतित होती है।
अनवस्था के भय से वृत्तिविषयक-वृत्ति न मान सकने के कारण विषयाकारवृत्त्युपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता ही विषयावच्छिन्न-चैतन्य की और घटादिविषय की सत्ता है, अर्थात् उसकी सत्ता से इनकी सत्ता का पृथक् न होना, यह पूर्वोक्त विषयगत-प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक का लक्षण, वृत्ति में नहीं है। परन्तु वृत्ति का प्रत्यक्ष होता है। इस कारण 'लक्ष्य के एक देश में लक्षण का न रहना' यही अव्याप्ति है।
इस प्रकार वादी की शंका का 'इति चेत्' से अनुवाद कर 'न' से उसके निरसन की प्रतिज्ञा करके पूर्वोक्त लक्षण में दी हुई अव्याप्ति को दूर करते हैं—
इति चेत् । न । अनवस्थाभिया वृत्तेर्वृत्त्यन्तराविषयत्वेऽपि स्व-
१. वृत्त्याकारा वृत्तिर्यदि स्यात् तदा प्रथमा वृत्तिः द्वितीयवृत्तेर्विषयः। एवं द्वितीयवृत्तेः प्रत्यक्षाय तदाकारा अन्या वृत्तिः यदि भवेत्, तदा सा द्वितीयवृत्तिः तृतीयवृत्तेः विषयो भवेत्। एवं सति वृत्तिविषयक-वृत्त्यन्तराभ्युपगमे अनवस्था भविष्यति। अतः वृत्त्याकारा वृत्तिः न स्वीकार्या।