वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७० | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षविचारः |
|---|
विषयत्वाभ्युपगमेन¹ स्वविषयवृत्त्युपहितप्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्वस्य तत्रापि भावात्²। एवं चान्तःकरणतद्धर्मादीनां केवलसाक्षिविषयत्वेऽपि तत्तदाकारवृत्त्यभ्युपगमेन उक्तलक्षणस्य³ तत्रापि सत्त्वान्नाव्याप्तिः ॥
अर्थ—अनवस्था के भय से 'एक वृत्ति को दूसरी वृत्ति का विषय होना' हमारे स्वीकार न करने पर भी वृत्ति में उस वृत्ति का ही (अपना ही) विषयत्व मानते हैं। इस कारण 'वृत्तिविषयक' जो वृत्ति (स्वयं को विषय करने वाली वृत्ति) उससे उपहित प्रमातृचैतन्याभिन्नसत्ताकत्व' यह विषयगत-प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक का लक्षण वृत्ति में है। इसी तरह अन्तःकरण और अन्तःकरण के धर्मादिकों को केवल साक्षिविषयत्व होने पर भी तत्तदाकार वृत्ति के स्वीकार करने से पूर्वोक्त लक्षण, उस साक्षिविषय-पदार्थों में भी है, अतः वहाँ भी अव्याप्ति नहीं होती।
विवरण—यद्यपि यह सच है कि ब्रह्म-भिन्न सभी पदार्थ जड़ हैं, तथापि उन जड़ पदार्थों में भी स्वभाववैचित्र्य है ही। सभी जड़ पदार्थ एक से स्वभाव के नहीं होते। जैसे घट और दीप दोनों पदार्थ ब्रह्मभिन्न होने से जड़ हैं। तथापि घट को प्रकाश और चक्षुरिन्द्रिय के सन्निकर्षादि-सम्बन्ध की स्वाभाविक अपेक्षा रहती है। किन्तु प्रदीप को आलोक (प्रकाश) की अपेक्षा नहीं होती। प्रदीप, घट को प्रकाशित करते हुए अपने को भी प्रकाशित करता है। ठीक उसी तरह अन्तःकरणवृत्ति भी जिस विषय को प्रकाशित करने के लिए पैदा हुई हो, उसे प्रकाशित करती हुई ही, दूसरी वृत्ति की अपेक्षा बिना किये स्वयं (अपने) को भी प्रकाशित करती है। क्योंकि जड़ पदार्थों के विचित्र अनुभव के बल से कुछ जड़ पदार्थों में भी कतिपय स्वभाव विशेषों को अगत्या स्वीकार करना पड़ता है।
एक वृत्ति को विषय करनेवाली दूसरी वृत्ति (वृत्ति-विषयक वृत्ति) के मानने पर अनवस्था प्रसङ्ग के भय से ही सिद्धान्त में वृत्तिविषयक वृत्ति नहीं मानी जाती, तथापि हमारे अभ्युपगम के अनुसार 'मैं इस घट को जानता हूँ' इस वृत्ति में स्वविषयत्व होने से अव्याप्ति नहीं होती। (कोई भी वृत्ति अपने से भिन्न वृत्ति के द्वारा अवच्छिन्न हुए
१. स्वविषयत्वाभ्युपगमेन अर्थात् स्वाकारवृत्त्युपहितत्वस्य स्वविषयवृत्त्युपहितत्वार्थकत्वाङ्गीकारेण। अत्र 'स्व'-पदं लक्ष्य-प्रत्यक्ष-विषयपरम्। एवञ्च यज्-ज्ञानं यद्विषयव्यवहारजननयोग्यं, तज्-ज्ञानं तद्विषयकमिति नियमः।
२. 'सम्भवात्'—इति पाठान्तरम्।
३. उक्तलक्षणस्य स्वविषयवृत्त्युपहितत्वघटितलक्षणस्येत्यर्थः। तत्रापि अन्तःकरणादिष्वपि।