वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७१
चैतन्य से प्रकाशित नहीं होती अर्थात् वह अपने ही से अवच्छिन्न हुए चैतन्य से प्रकाशित होती है)।
इसी तरह अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों को केवल-साक्षिविषयत्व के होते हुए भी वृत्तिविषयत्व का भी स्वीकार करने से यहाँ भी अव्याप्ति नहीं होती। 'कामादि' यहाँ आदि शब्द से प्रातिभासिक रजतादिकों का ग्रहण करना चाहिये।
'केवल-साक्षिविषयत्व' यहाँ 'केवल' पद वृत्त्यादिकों की व्यावृत्ति करने के लिए है, (अन्तःकरणादिकों को वृत्त्यादिशून्य-साक्षिविषयत्व है) तब उसके विरुद्ध आप अन्तःकरणादिकों में वृत्ति-विषयत्व कैसे बता रहे हैं? इस शंका का अनुवाद करके सिद्धान्ती उसका परिहार करता है।
न^१ चान्तःकरणतद्धर्मादीनां वृत्तिविषयत्वाभ्युपगमे केवलसाक्षिविषय^२त्वाभ्युपगमविरोध इति वाच्यम्। न हि वृत्तिं विना साक्षिविषयत्वं केवल-साक्षिवेद्यत्वं, किन्त्विन्द्रियानुमानादिप्रमाणव्यापारमन्तरेण साक्षिविषयत्वम्।
**अर्थ—**अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों में वृत्तिविषयत्व मानने से आपके पूर्वस्वीकृत 'केवल-साक्षिविषयत्व' के सिद्धान्त से विरोध होता है—यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि हमने 'केवल-साक्षिविषयत्व' में 'केवल' शब्द का प्रयोग, वृत्ति का परिहार करने के लिए नहीं किया है (बिना वृत्ति के ही साक्षिवेद्यत्व—'यह केवल-साक्षिवेद्यत्व' का अर्थ नहीं है) किन्तु इन्द्रिय (प्रत्यक्ष), अनुमान आदि प्रमाणों के व्यापार के बिना ही 'अन्तःकरण और तद्धर्मों में साक्षिविषयत्व होता है, इस आशय से 'केवल-साक्षिविषयत्व' कहा गया है।
विवरण—'केवल-साक्षिविषयत्व' यहाँ 'केवल' पद वृत्त्यादिकों के हटाने के लिए है—ऐसी अन्यथा कल्पना कर लेने से विरोधी की यह शंका थी। परन्तु यहाँ 'केवल' शब्द, वृत्ति आदि का व्यावर्तक न होकर प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणों के इन्द्रियसन्निकर्षादि व्यापारों की व्यावृत्ति के लिए है, इसलिये कोई विरोध नहीं है। ('बिना वृत्ति के साक्षिविषयत्व' यह 'केवल साक्षिविषयत्व, न होकर 'प्रत्यक्षादि-प्रमाणों के व्यापार के बिना साक्षिविषयत्व' यह 'केवल साक्षिविषयत्व है।)
१. अत्र शङ्कते—यदि सुख-दुःखाद्याकारा वृत्तिः स्यात् तदा तद्व्यवधानेनैव तेषां साक्षिवेद्यत्वं वक्तव्यम्। किन्तु तन्न युक्तम्, साक्षात् साक्षिचैतन्याध्यस्ताना मव्यवधानेनैव साक्षिग्राह्यत्वनियमात्। तथा च विवरणकाराः—"आत्मचैतन्येनाऽव्यवधानात् तत् प्रतिभासोपपत्तेः।" एवं च विवरणविरोधइत्याशङ्काकर्तुरभिप्रायः।
२. वेद्यत्वाभ्यु० इति पाठान्तरम्।