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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 482 में से

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७२वेदान्तपरिभाषा[ विषयप्रत्यक्षविचारः

अब इस विषय में पद्मपादाचार्य की सम्मति बताते हैं—

अत एवाहंकार-टीकायामाचार्यैरहमाकारान्तःकरणवृत्तिरङ्गीकृता, अत एव च प्रातिभासिकरजतस्थले रजताकाराऽविद्यावृत्तिः ¹साम्प्रदायिकैरङ्गीकृता, तथा² चान्तःकरण-तद्धर्मादिषु केवलसाक्षिवेद्येषु वृत्त्युपहितत्वघटित-लक्षणस्य सत्त्वान्नाव्याप्तिः ॥

**अर्थ—**इस प्रकार 'केवल-साक्षिवेद्यत्व' में 'केवल' पद, वृत्ति का व्यावर्तक न होने से ही अहङ्कार-टीका में आचार्य ने अहमाकार-अन्तःकरण-वृत्ति का स्वीकार किया है। इसी कारण सर्वज्ञमुनिप्रभृति साम्प्रदायिकों ने प्रातिभासिक-रजतस्थल में रजताकार अविद्यावृत्ति को स्वीकार किया है। इस प्रकार केवल साक्षिवेद्य अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों में वृत्त्युपहितत्व-घटित लक्षण संगत होने से अव्याप्ति नहीं है।

विवरण—'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' ( ब्र० सू० १।१।१ ) सूत्र के शांकरभाष्य पर पद्मपादाचार्य की 'पञ्चपादिका' नामकी टीका है। उस टीका पर श्री प्रकाशाचार्य का विवरण है, उसी का दूसरा नाम 'अहङ्कार टीका' है। उसके प्रथम वर्णक में 'अहं वृत्त्यवच्छिन्नमेव अन्तःकरणं चैतन्यस्य विषयभावमापद्यते'—अहं वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य ही विषयभाव को प्राप्त होता है—कहा है। ( श्री प्रकाशमुनि ने अन्तःकरण को विषय को करने वाली अहम्-इत्याकारक वृत्ति को माना है। उस कारण 'केवल साक्षिभास्यत्व' के 'केवल' शब्द से 'वृत्ति' की व्यावृत्ति न होकर प्रत्यक्षादि प्रमाणों के इन्द्रिय-सन्निकर्षादि व्यापारों की व्यावृत्ति होती है। इसलिये 'अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों में वृत्तिविषयत्व के स्वीकार करने पर भी 'केवल-साक्षि-विषयत्व' के सिद्धान्त से विरोध नहीं होता। श्री प्रकाशाचार्य ने अहमाकार-अन्तः-करणवृत्ति का स्वीकार किया होने से संक्षेपशारीरकाचार्य सर्वज्ञमुनि प्रभृति साम्प्र-दायिकों ने भी प्रातिभासिक शुक्तिरजत-स्थल में रजताकार-अविद्यावृत्ति को माना है। इस प्रकार अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों को वृत्तिविषयत्व सिद्ध होने से पूर्वोक्त अव्याप्ति का निरसन अपने आप हो जाता है। यथा—पीछे 'विषयाकार-वृत्त्युपहित-प्रमातृचैतन्य की सत्ता से विषय की सत्ता का पृथक् न होना' ही विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताया गया है। यह लक्षण, केवल साक्षिवेद्य हुए अन्तःकरण और उसके कामादि धर्मों में भी है। क्योंकि साम्प्रदायिकों ने अन्तःकरणादिविषयक 'अहमाकार' ( अहं इस आकार की ) वृत्ति मानी है। इस कारण 'वृत्त्युपहितत्व' विशेषण से युक्त


१. साम्प्रदायिकैः विवरणानुयायिभिरिति ।
२. प्रातिभासिकेषु अविद्यावृत्तिस्वीकारफलं निर्दिशति ।