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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 482 में से

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विषयप्रत्यक्षस्यनिकृष्टलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७३

लक्षण अन्तःकरणादि-प्रत्यक्ष में भी है। इसलिए लक्षण की अव्याप्ति (लक्ष्य के किन्हीं अंशों में न रहना) नहीं हो पाती।

इस प्रकार ज्ञानगत और ज्ञेयगत-प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक को (सब दोषों का निरसन करते हुए) बताकर श्रोताओं के सुखबोधार्थ उपर्युक्त विशेषणों से निष्पन्न हुए लक्षण को संक्षेप में बताते हैं।

'तदयं निर्गलितोऽर्थः स्वाकारवृत्त्युपहित-प्रमातृचैतन्यसत्ताति-रिक्त-सत्ताकत्वशून्यत्वे सति योग्यत्वं विषयस्य प्रत्यक्षत्वम्। तत्र संयोग-संयुक्ततादात्म्यादीनां सन्निकर्षाणां चैतन्याभिव्यञ्जक-वृत्ति-जनने विनियोगः।

अर्थ—उसका यह निष्कृष्ट अर्थ है। 'स्व' = विषय- तदाकार = विषयाकार अर्थात् विषयगोचर वृत्ति (उपाधि) से उपहित प्रमातृचैतन्यरूप सत्ता से जिस विषय की सत्ता भिन्न होती है वह विषय, 'स्वाकारवृत्त्युपहित-प्रमातृ-चैतन्यसत्तातिरिक्तसत्ताक' होता है। उसका जो भाव उसे 'सत्तातिरिक्तसत्ताकत्व' कहते हैं, उससे शून्य होते हुए 'प्रत्यक्षयोग्यत्व होना ही विषय के प्रत्यक्ष-व्यवहार का प्रयोजक है। इस प्रकार ज्ञानगत और विषयगत (ज्ञेयगत) प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक सिद्ध होने पर संयोग, संयुक्त-तादात्म्य इत्यादि सन्निकर्षों का चैतन्याभिव्यंजक-वृत्ति के उत्पन्न करने में विनियोग (उपयोग) होता है।

विवरण—स्वाकारवृत्ति (विषयाकारवृत्ति) में उपहित (प्रविष्ट) हुए प्रमातृ-चैतन्य की सत्ता से, प्रत्यक्षयोग्य विषय की सत्ता का पृथक् न होना ही विषयगत प्रत्य-क्षत्व (प्रत्यक्ष-व्यवहार) का प्रयोजक है। प्रमातृ-चैतन्य की सत्ता और विषय की सत्ता के एक होने पर 'यह घट प्रत्यक्ष है' यह व्यवहार होने लगता है। इस प्रकार


१. 'तदयम्' इति मूलस्थपदस्य पञ्चमी-षष्ठी वा समासोऽवगन्तव्यः। 'तस्य पूर्वोक्तस्य अयम्' इति, 'तस्मात् अयम्' इति वा।

२. स्वयं विषयः तदाकारा तद्विषया या वृत्तिः तदुपहितं यत् प्रमातृचैतन्यं तद्रूपा या सत्ता तदतिरिक्ता सत्ता यस्य सः तथा तस्य भावः तत्त्वं तेन शून्यत्वे सति—तदति-रिक्तसत्तावत्त्वरहितत्वेसति प्रत्यक्षयोग्यत्वं प्रत्यक्षव्यवहारप्रयोजकम्।
एवञ्च—ज्ञानगतस्य ज्ञेयगतस्य च प्रत्यक्षत्वस्य यत् प्रयोजकमुक्तं तत्र 'तादृशवृत्त्य-वच्छिन्न-चैतन्यस्य तादृशविषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नत्वं' ज्ञानगतप्रयोजकम्।
तादृशविषयस्य तथाभूतप्रमातृचैतन्याभिन्नत्वं विषयगतप्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकम्।

३. प्रत्यक्षस्य विषयस्य प्रत्यक्षज्ञानं चैतन्यमेव, तच्च अनादीति संयोगादिसन्नि-कर्षाणां क्व विनियोगः इति जिज्ञासायां घटतद्गतरूप-रूपत्व-शब्द-शब्दत्वावच्छिन्नचैत-न्याभिव्यञ्जकवृत्त्युत्पादने विनियोगो ज्ञातव्यः।