वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ वृत्तेश्चातुर्विध्यम् |
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ज्ञानगतप्रत्यक्षत्व और ज्ञेयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताया गया। प्रत्यक्षयोग्य-विषयाकार वृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का प्रत्यक्षविषयावच्छिन्न चैतन्य (वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य और विषयावच्छिन्न-चैतन्यों की एकता)—ज्ञानगत ‘प्रत्यक्षत्व’ में प्रयोजक है। ‘विषयज्ञान प्रत्यक्ष है’ इस आकार में ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व का व्यपदेश (व्यवहार) होता है। इसी प्रकार प्रत्यक्षयोग्य विषय का पूर्वोक्त प्रकार से प्रमातृ-चैतन्य के साथ अभेद, विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है। ‘घटः प्रत्यक्षः’ घट प्रत्यक्ष है इस आकार में उसका व्यपदेश होता है।
चैतन्य ही प्रत्यक्ष-विषय का ज्ञान है और चैतन्य अनादि है। ऐसी स्थिति में संयोगादि सन्निकर्षों का उपयोग क्या है? इस आशंका के समाधान में ग्रन्थकार कहते हैं—पूर्वोक्त प्रकार से द्विविध प्रयोजकों के सिद्ध होने पर संयोग, संयुक्ततादात्म्य, संयुक्तभिन्नतादात्म्य, तादात्म्य, अभिन्नतादात्म्य आदि सन्निकर्षों का घट, घटगतरूप, रूपगत रूपत्व, शब्द और शब्दत्व से अवच्छिन्न हुए चैतन्य को अभिव्यक्त करनेवाली वृत्ति को उत्पन्न करने में विनियोग होता है। (वे संयोगादि-सन्निकर्ष तत्तद्विषयावच्छिन्न चैतन्य की अभिव्यंजकवृत्ति को पैदा करते हैं। संयोग से घटाकारवृत्ति, संयुक्ततादात्म्य से घटगतरूपाकारवृत्ति, संयुक्ताभिन्नतादात्म्य से घट-रूपगत रूपत्वाकार वृत्ति, तादात्म्य से शब्दाकार वृत्ति और अभिन्नतादात्म्य से शब्दगत-शब्दत्वाकार वृत्ति पैदा होती है। और प्रत्येक वृत्ति, चैतन्य की अभिव्यंजक है। अब इन संनिकर्षों से उत्पन्न होने वाली वृत्ति (अन्तःकरण वृत्ति) कितनी प्रकार की है? उसे ग्रन्थकार बताते हैं—
सा¹ च वृत्तिश्चतुर्विधा—संशयो, निश्चयो, गर्वः, स्मरणमिति। एवंविध²वृत्तिभेदेन एकमप्यन्तःकरणं मन इति बुद्धिरिति अहङ्कार इति चित्तमिति ³व्याख्यायते। तदुक्तम्—
मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं करणमान्तरम् ।
संशयो निश्चयो गर्वः स्मरणं विषया इमे ॥ १ ॥
अर्थ— और वह सन्निकर्षजन्य-वृत्ति चार प्रकार की है—संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण। अन्तःकरण के एक होने पर भी इस वृत्तिभेद के कारण वह मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त इन चार शब्दों से बोला जाता है⁴। इस अन्तःकरण-वृत्ति
१. सा चेत्यत्र प्रसिद्धा वृत्तिर्ग्राह्या ।
२. एवं सतिवृ०—इति पाठान्तरम् ।
३. चाख्या०—इति पाठान्तरम् ।
४. संशयाकारवृत्तिमदन्तःकरणं मनः, निश्चयाकारवृत्तिमदन्तःकरणं बुद्धिः, गर्वाकार-वृत्तिमदन्तःकरणमहङ्कारः स्मरणकारवृत्तिमदन्तःकरणं चित्तमिति प्रसङ्गप्राप्तः केषां-