वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवृत्तेश्चातुर्विध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७५
के विषय में पूर्वाचार्यों ने इस प्रकार कहा है—'मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त—रूप से चार प्रकार का अन्तःकरण ( भीतरी करण ) है। संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण—ये उसके क्रम से विषय हैं।'
विवरण—पूर्वोक्त सन्निकर्ष से पैदा होने वाली 'वृत्ति' से अवच्छिन्न हुआ 'चैतन्य' ही प्रत्यक्ष और 'वृत्ति', अन्तःकरण का परिणाम है। अतः अन्तःकरण की घटक ( अवयव ) भूत-वृत्ति से युक्त अन्तःकरण का निरूपण करना प्रकृत में असंगत नहीं है। प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण प्रकृत है और अन्तःकरण का निरूपण उसका उपकारक है। संशयाकार, निश्चयाकार, गर्वाकार और स्मरणाकार—इन चार प्रकार के आकारों में परिणत होने वाली वृत्ति चार प्रकार की है। वास्तव में एक होता हुआ भी अन्तःकरण, संशयादि विषयाकार से परिणत हुई विविध वृत्तियों के भेद से विविधता को प्राप्त होता है ( विविध = अनेक रूप होता है)। संशयाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तःकरण को 'मन', निश्चयाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तःकरण को 'बुद्धि', गर्वाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तःकरण को 'अहङ्कार', और स्मरणाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तः-करण को 'चित्त' संज्ञाएं प्राप्त होती हैं। 'अन्तःकरण' का उपर्युक्त यह विभाग स्वकपोलकल्पित न होकर उसमें पूर्वाचार्यों की सम्मति 'मनो बुद्धिः', वचन से ग्रन्थकार दिखा रहे हैं—वृत्तिभेद से वृत्तिमान् का भेद होने से, एक ही अन्तःकरण, मन आदि भेद से चार प्रकार का हो जाता है। और उसके विषय—संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण होते हैं। इसी कारण तदाकार हुई वृत्तियों को भी संशय, निश्चय इत्यादि संज्ञायें प्राप्त हुई हैं।
इस प्रकार प्रत्यक्ष-प्रमा की घटक 'वृत्ति' के स्वरूप को बताकर विषयावच्छिन्न-चैतन्याभिन्न जो वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य तद्रूप प्रत्यक्ष के विभाग ( पूर्वोक्त विषयाच्छिन्न-चैतन्याभिन्न-वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्यरूप प्रत्यक्ष प्रमा के प्रकार ) को बताते हैं।
विदभ्युपगमः प्रदर्शितः। तेषां मते एकमपि अन्तःकरणं चतुर्धा भिद्यते। तद्भेदाभ्युप-गमात् अन्तःकरणस्य इन्द्रियत्वाभ्युपगमाच्च संशयादीनामन्तःकरणवृत्तित्वं युज्यते।
किन्तु सिद्धान्ते प्रमात्मकनिश्चयस्य अन्तःकरणवृत्तित्वेऽपि भ्रमात्मकनिश्चयस्य संशयादीनाञ्च अन्तःकरणवृत्तित्वं नैव युज्यते। यतः अन्तःकरणवृत्तिः इन्द्रियादिप्रमाण-व्यापारमपेक्षते। संशयादयस्तु अविद्यावृत्तिरूपाः, अतः प्रमाणव्यापारं नापेक्षन्ते, अन्तः-करणस्य च अनिन्द्रियत्वमभ्युपगम्यते सिद्धान्तिना।
ननु 'एतत् सर्वं मन एव' इति श्रुतौ संशयादीनां मनः-परिणामत्व-प्रतिपादनात् श्रुतिविरोधः। किन्तु एकस्मिन् धर्मिणि उभयकोटिकवृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यमेव संशयः, तस्य च विशेषाकारमनोवृत्तिघटितत्वेन एककोट्याकारमनोवृत्तिघटितत्वेन वा मनस्तादात्म्य-निर्देशान्न श्रुतिविरोधः।