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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

वृत्तेश्चातुर्विध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७५

के विषय में पूर्वाचार्यों ने इस प्रकार कहा है—'मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त—रूप से चार प्रकार का अन्तःकरण ( भीतरी करण ) है। संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण—ये उसके क्रम से विषय हैं।'

विवरण—पूर्वोक्त सन्निकर्ष से पैदा होने वाली 'वृत्ति' से अवच्छिन्न हुआ 'चैतन्य' ही प्रत्यक्ष और 'वृत्ति', अन्तःकरण का परिणाम है। अतः अन्तःकरण की घटक ( अवयव ) भूत-वृत्ति से युक्त अन्तःकरण का निरूपण करना प्रकृत में असंगत नहीं है। प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण प्रकृत है और अन्तःकरण का निरूपण उसका उपकारक है। संशयाकार, निश्चयाकार, गर्वाकार और स्मरणाकार—इन चार प्रकार के आकारों में परिणत होने वाली वृत्ति चार प्रकार की है। वास्तव में एक होता हुआ भी अन्तःकरण, संशयादि विषयाकार से परिणत हुई विविध वृत्तियों के भेद से विविधता को प्राप्त होता है ( विविध = अनेक रूप होता है)। संशयाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तःकरण को 'मन', निश्चयाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तःकरण को 'बुद्धि', गर्वाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तःकरण को 'अहङ्कार', और स्मरणाकार वृत्ति में परिणत हुए अन्तः-करण को 'चित्त' संज्ञाएं प्राप्त होती हैं। 'अन्तःकरण' का उपर्युक्त यह विभाग स्वकपोलकल्पित न होकर उसमें पूर्वाचार्यों की सम्मति 'मनो बुद्धिः', वचन से ग्रन्थकार दिखा रहे हैं—वृत्तिभेद से वृत्तिमान् का भेद होने से, एक ही अन्तःकरण, मन आदि भेद से चार प्रकार का हो जाता है। और उसके विषय—संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण होते हैं। इसी कारण तदाकार हुई वृत्तियों को भी संशय, निश्चय इत्यादि संज्ञायें प्राप्त हुई हैं।

इस प्रकार प्रत्यक्ष-प्रमा की घटक 'वृत्ति' के स्वरूप को बताकर विषयावच्छिन्न-चैतन्याभिन्न जो वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य तद्रूप प्रत्यक्ष के विभाग ( पूर्वोक्त विषयाच्छिन्न-चैतन्याभिन्न-वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्यरूप प्रत्यक्ष प्रमा के प्रकार ) को बताते हैं।


विदभ्युपगमः प्रदर्शितः। तेषां मते एकमपि अन्तःकरणं चतुर्धा भिद्यते। तद्भेदाभ्युप-गमात् अन्तःकरणस्य इन्द्रियत्वाभ्युपगमाच्च संशयादीनामन्तःकरणवृत्तित्वं युज्यते।

किन्तु सिद्धान्ते प्रमात्मकनिश्चयस्य अन्तःकरणवृत्तित्वेऽपि भ्रमात्मकनिश्चयस्य संशयादीनाञ्च अन्तःकरणवृत्तित्वं नैव युज्यते। यतः अन्तःकरणवृत्तिः इन्द्रियादिप्रमाण-व्यापारमपेक्षते। संशयादयस्तु अविद्यावृत्तिरूपाः, अतः प्रमाणव्यापारं नापेक्षन्ते, अन्तः-करणस्य च अनिन्द्रियत्वमभ्युपगम्यते सिद्धान्तिना।

ननु 'एतत् सर्वं मन एव' इति श्रुतौ संशयादीनां मनः-परिणामत्व-प्रतिपादनात् श्रुतिविरोधः। किन्तु एकस्मिन् धर्मिणि उभयकोटिकवृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यमेव संशयः, तस्य च विशेषाकारमनोवृत्तिघटितत्वेन एककोट्याकारमनोवृत्तिघटितत्वेन वा मनस्तादात्म्य-निर्देशान्न श्रुतिविरोधः।

७६वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षद्वैविध्यम्

तच्च प्रत्यक्षं द्विविधम् । ¹सविकल्पक-निर्विकल्पकभेदात् । तत्र सविकल्पकं वैशिष्ट्यावगाहि² ज्ञानं । यथा घटमहं जानामीत्यादि ज्ञानम् । निर्विकल्पकं तु संसर्गानवगाहि ज्ञानम्³ । यथा--सोऽयं


१. विषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यरूपस्य प्रत्यक्षस्य विभागनिरूपणा- वसरे सकलवादिसम्मतत्वात् सर्वव्यवहारहेतुत्वाच्च प्रथमं सविकल्पकस्य निर्देशः ।

२. वैशिष्ट्यं विशेष्य-विशेषणयोः सम्बन्धमवगाहते विषयीकरोति-इति वैशिष्ट्या- वगाहि । तच्च तज्ज्ञानञ्चेति वैशिष्ट्यावगाहिज्ञानम् । यस्मिन् ज्ञाने विशेष्यं विशेषणं तयोः सम्बन्धश्च विषयो भवति, तज्ज्ञानं सविकल्पकं भवति । निर्विकल्पके अतिव्याप्ति- वारणाय वैशिष्ट्यावगाहीतिविशेषणदलम् । सविकल्पकस्योदाहरणं 'घटमहं जानामि' इति । अर्थात् 'घटविषयकज्ञानवानहम्' । अत्र घटविषयकज्ञानसाक्षात्कारे 'अहङ्कारः' विशेष्यतया, तत्र च 'घटज्ञानं' विशेषणतया, तयोः 'घटज्ञानाहङ्कारयोः सम्बन्धश्च' संसर्गतया, घटज्ञाने च 'घटः' विशेषणतया, 'ज्ञानञ्च' विशेष्यतया, तयोः 'घट घटज्ञा- नयोः सम्बन्धश्च' संसर्गतया, घटे घटत्वं विशेषणतया, घटः विशेष्यतया, तयोः घट- घटत्वयोः सम्बन्धः संसर्गतया भासते । अतः घटमहंजानामीति ज्ञानं वैशिष्ट्यविषय- कतया सविकल्पकं भवति ।

३. निर्विकल्पकस्योदाहरणं 'सोऽयं देवदत्तः' इति--लौकिकम् । 'तत्त्वमसि' इति वैदिकम् । इदं लौकिकं वैदिकञ्चोदाहरणं संसर्गानवगाहि संसर्गाऽविषयकं (विशेष्य- विशेषणयोः सम्बन्धाऽविषयकम् ) वर्तते ।

'सोऽयं देवदत्तः' इत्यनेन प्रत्यभिज्ञायामवगतमेकत्वं परस्मै प्रतिपादयति । इदं वाक्यं शृण्वन् पुरुषः 'तत्' पदस्य 'इदम्' पदस्य च प्रथमं तावत् सामानाधिकरण्यं जानाति । तदनन्तरं तस्य शृण्वतः पुरुषस्य चेतसि 'तत्' शब्दात् शक्त्या तद्देश-काल- विशिष्टस्य, 'इदम्' शब्दात् शक्त्या एतद्देश-कालविशिष्टस्य 'देवदत्त' शब्दात् शक्त्या देवदत्तस्य उपस्थितिर्भवति । ततः पश्चात् तस्य चेतसि द्वयोः विशिष्टयोः अभेदान्वयो भवति-'तद्देशकालविशिष्टाऽभिन्नः एतद्देशकालविशिष्टाभिन्नः 'देवदत्ततः' इति ।

परन्तु द्वयोर्विशिष्टयोः अभेदान्वयो न संभवति, विशिष्टयोर्द्वयोर्भिन्नत्वात् । यतः विशेषणभेदेन विशिष्टस्य भेदो भवति । अतः विशिष्टाऽभेदस्य मुख्यार्थस्य बाधप्रतिसन्धानं जायते । ततः तस्य पुरुषस्य देवदत्तस्वरूपमात्रबोधस्य तात्पर्यविषयत्वात् विशिष्टवाच- काभ्यां पदाभ्यां विरुद्धस्य स्वार्थैकदेशस्य तदेतद्देशकालस्य परित्यागेन देवदत्तस्वरूपलक्ष- णया देवदत्तस्वरूपमात्रविषयकं ज्ञानं भवति । तथा च संक्षेप शारीरके--

"सामानाधिकरण्यमत्र भवति प्राथम्यभागन्वयः, पश्चादेव विशेषणेतरतया पश्चाद् विरोधोद्भवः । उत्पन्ने च विरोध एकरसके, वस्तुन्यखण्डात्मके वृत्तिर्लक्षणया भवत्ययमिह ज्ञेयः क्रमः सूरिभिः" तच्च ज्ञानं स्वरूपमात्रविषयकत्वात् संसर्गानवगाहि भवति । शब्द-

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७७

देवदत्तः, तत्त्वमसीत्यादि-वाक्यजन्य-^१ज्ञानम् ॥

**अर्थ—**और वह प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार का है। एक सविकल्पक और दूसरा निर्विकल्पक। उनमें विकल्प को विषय करनेवाले ज्ञान को 'सविकल्पक' ज्ञान कहते हैं। जैसे—'मैं घट को जानता हूँ' यह ज्ञान सविकल्प है। परन्तु संसर्ग को विषय न करनेवाला ज्ञान निर्विकल्प ज्ञान होता है। जैसे—'वह यह देवदत्त' 'वह (सत्) तू है' इत्यादि वाक्यों से उत्पन्न होने वाला ज्ञान।

**विवरण—**प्रत्यक्ष ज्ञान को उत्पन्न करनेवाली वृत्ति का स्वरूप ऊपर बताया गया। अब प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रकारों को बताते हैं। 'विषयावच्छिन्न चैतन्यात्मक, जो वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य', वही प्रत्यक्ष-ज्ञान है। वह (प्रत्यक्ष) सविकल्पक और निर्विकल्पक भेद से दो प्रकार का है। मूल में 'सविकल्पक और निर्विकल्पक' ऐसा उद्देश्य किया है (प्रत्यक्ष के दो प्रकारों में से)—'सविकल्पक' का निर्देश प्रथम किया है। सविकल्पक ज्ञान सभी को सम्मत है और समस्त व्यवहार में उसके प्रयोजक होने से 'तत्र' ग्रन्थ से प्रथमतः सविकल्पक ज्ञान का लक्षण कहा जाता है। विकल्प का अर्थ, 'वैशिष्ट्य' है। जो ज्ञान विकल्प से युक्त रहता है, वह सविकल्पक कहलाता है (जिस ज्ञान का विषय 'वैशिष्ट्य' होता है, वह सविकल्पक ज्ञान है) ग्रन्थकार ने 'वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानं सविकल्पकम्' इस प्रकार सविकल्पक ज्ञान का लक्षण करके 'मैं घट को जानता हूँ, यह उदाहरण दिया है। इसमें 'वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानम्' इतना लक्षण है और 'सविकल्पकम्' यह लक्ष्य है। केवल 'वैशिष्ट्यवगाहि' इतना ही लक्षण यदि किया जाता तो वह 'इच्छा आदि' में अतिव्याप्त होता, क्योंकि इच्छादिक भी वैशिष्ट्य-विषयक होती हैं। (इच्छा का विषय वैशिष्ट्य ही रहता है) अतः इस अतिव्याप्ति का निवारण करने के लिए लक्षण में 'ज्ञान' पद दिया है। यदि केवल


जन्यमपि सन्निकृष्ट देवदत्तविषयकत्वात् प्रत्यक्षञ्च तत्, सन्निकृष्टविषये शब्दादपि प्रत्यक्षज्ञानाभ्युपगमात्।

एवं 'तत्त्वमसि' इत्यत्र तच्छब्देन शक्त्या सर्वज्ञत्वादिविशिष्टस्य चैतन्यस्य युष्मच्छब्देन असर्वज्ञत्वादि विशिष्टस्य चैतन्यस्य, प्रथमया च विभक्त्या अभेदस्य उपस्थितिर्भवति, ततः विशिष्टयोर्द्वयोरभेदान्वयो जायते। ततो मुख्यार्थस्य विशिष्टाऽभेदस्य बाधज्ञानं सम्पद्यते, ततो विशिष्टवाचकाभ्यां पदाभ्यां विरुद्धांशस्य सर्वज्ञत्वादेः परित्यागेन चैतन्यस्वरूपलक्षणया चैतन्यस्वरूपमात्रविषयकं ज्ञानं जायते। तच्च ज्ञानं संसर्गाऽविषयकत्वात् सन्निकृष्टविषयकत्वाच्च निर्विकल्पकम्प्रत्यक्षम्।

तथा च विवरणकारा अष्टमवर्णके—"सोयमिति विशिष्टाऽभिधायिभ्याम्पदाभ्यां स्वार्थैकदेशपरित्यागेनै कदेशलक्षणया देवदत्तस्वरूपैक्यं प्रतिपादयति।"


१. जन्यं ज्ञानम्—इति पाठान्तरम् ।

७८ वेदान्तपरिभाषा [ प्रत्यक्षविचारः

'ज्ञानम्' इतना ही लक्षण करें तो वह निर्विकल्पक ज्ञान में अतिव्याप्त होगा, इसलिये 'वैशिष्ट्यावगाहि' यह विशेषण भी आवश्यक है।

'मैं घट को जानता हूँ' यह सविकल्पक-ज्ञान का उदाहरण है। क्योंकि वह घटरूप-विशेषण से विशिष्ट घटज्ञान को विषय कर रहा है, अतः 'मैं घट को जानता हूँ' यह ज्ञान वैशिष्ट्यावगाहि है।

इस प्रकार सविकल्पक ज्ञान का निर्दोष लक्षण बताकर 'निर्विकल्पकं तु०' ग्रन्थ से दूसरे प्रकार के ज्ञान का लक्षण बताते हैं। जिससे विकल्प (वैशिष्ट्य) निवृत्त हुआ हो वह निर्विकल्पक ज्ञान है। यहाँ 'निर्विकल्पकम्' लक्ष्य है और 'संसर्गाविगाहि ज्ञानम्' लक्षण है। संसर्ग का अर्थ है—विशेषण-विशेष्य-सम्बन्ध, इसी को 'वैशिष्ट्य' कहते हैं। एवं च संसर्ग (वैशिष्ट्य) को विषय न करनेवाले ज्ञान को 'निर्विकल्पक ज्ञान' कहते हैं 'सोऽयं देवदत्तः', 'तत् त्वमसि' आदि वाक्यों से उत्पन्न हुआ ज्ञान, निर्विकल्पक ज्ञान का उदाहरण है। 'सोऽयं देवदत्तः' इस ऐक्य प्रत्यभिज्ञा से ही 'सोऽयं देवदत्तः' ऐसे वाक्य का प्रयोग होता है। इस कारण देश और काल से उपलक्षित देवदत्त रूप अभेद को विषय करनेवाला इन्द्रियजन्य ज्ञान भी निर्विकल्प प्रत्यक्ष है। तब इन्द्रियजन्य निर्विकल्पक प्रत्यक्ष को उदाहरण रूप से न बताकर शाब्दज्ञान को ही उदाहरणरूप से क्यों बताया गया है ?

उत्तर :—देश और काल से उपलक्षित (जो) देवदत्त (तद्) रूप अभेद को विषय करनेवाले (वह यह देवदत्त) इस इन्द्रियजन्यप्रत्यक्षज्ञान में सन्निकर्ष के बल से, 'उपलक्षक देश-काल' का भी भान होता है, परन्तु शाब्दज्ञान में नियम से 'तात्पर्य-विषय' का ही भान होता है। इसलिए शाब्दज्ञान को अभेदमात्र विषयत्व होने से यहाँ पर शाब्द उदाहरण ही दिया है। मूल में 'तत्त्वमसि' इत्यादि के शब्द से 'प्रकृष्ट प्रकाश-श्चन्द्रः।' 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' आदि अवान्तर वाक्यों को समझना चाहिए। इस पर वादी शंका करता है—

ननु शाब्दमिदं ज्ञानं न प्रत्यक्षमिन्द्रियाजन्यत्वात् ।

अर्थ—यह जो शाब्द (शब्दजन्य) ज्ञान है। प्रत्यक्ष नहीं है, क्योंकि वह इन्द्रिय से पैदा नहीं है।

विवरण—निर्विकल्पक ज्ञान के उदाहरण में 'वाक्यजन्य ज्ञान' बताया देखकर वादी कहता है कि यह (निर्विकल्पक प्रत्यक्ष का तो लक्षण और उसका लक्ष्य वाक्य-जन्य ज्ञान) कथन अत्यन्त असंगत है। 'वह यह देवदत्त' इस वाक्य से होनेवाला ज्ञान, शाब्दज्ञान है, प्रत्यक्षज्ञान नहीं है। कारण इन्द्रियजन्य ज्ञान को ही प्रत्यक्षज्ञान कहते हैं। तब वाक्यजन्य ज्ञान को निर्विकल्पक प्रत्यक्ष कैसे कह सकते हैं? 'इति चेत्' आदि ग्रन्थ से उपर्युक्त शंका का अनुवाद कर उसका निरसन करते हैं।

प्रत्यक्षे इन्द्रियजन्यत्वस्याप्रयोजकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७१

इति चेत् । न । न हि इन्द्रियजन्यत्वं प्रत्यक्षत्वे तन्त्र, दूषितत्वात् । किन्तु योग्य-वर्तमान-विषयकत्वे सति प्रमाणचैतन्यस्य विषयचैतन्याभिन्नत्वमित्युक्तम् । तथा च सोऽयं देवदत्त इति वाक्यजन्य-ज्ञानस्य सन्निकृष्ट-विषयतया बहिर्निःसृतान्तःकरणवृत्त्यभ्युपगमेन ^१देवदत्तावच्छिन्न ^२वृत्त्यवच्छिन्नचैतनयोरभेदेन सोऽयं देवदत्त इति वाक्यजन्य-ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् । एवं तत्त्वमसि इत्यादिवाक्यजन्यज्ञानस्यापि । तत्र प्रमातुरेव^३ विषयतया तदुभयाभेदस्य^४ सत्त्वात् ।

अर्थ—'वाक्यजन्यज्ञान, इन्द्रियजन्य न होने से शाब्द है, प्रत्यक्ष नहीं है' ऐसा यदि कहें तो उचित नहीं। क्योंकि प्रत्यक्षत्व ( प्रत्यक्ष ) में 'इन्द्रियजन्यत्व' प्रयोजक नहीं है। हमने नैयायिकों के द्वारा स्वीकृत प्रयोजक को दूषित सिद्ध कर विषय में योग्यता तथा वर्तमानता ( विद्यमानता ) होते हुए प्रमाणचैतन्य का विषयचैतन्याभिन्नत्व होना प्रत्यक्ष में प्रयोजक है—ऊपर बताया है। 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय सन्निकृष्ट है, अतः हम ( वेदान्ती ) ने उस ज्ञान में बाहर निकली अन्तःकरण-वृत्ति को स्वीकार किया है। इस तरह इस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय समीप होने से सन्निकृष्ट विषय को उद्देश्य कर अन्तःकरण-वृत्ति बाहर निकलती है, हमारे इस सिद्धान्त के कारण देवदत्तावच्छिन्न चैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्य का अभेद होता है, ( विषयावच्छिन्न चैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य का अभेद होने से ) जिससे 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है। इसी न्याय से 'तत्त्वमसि' इस वाक्यजन्य ज्ञान का भी प्रत्यक्षत्व है। कारण उस ज्ञान में प्रमाता ही विषय होने से विषय-चैतन्य और वृत्तिचैतन्य का अभेद है।

विवरण—'वह यह देवदत्त' इत्यादि वाक्यजन्य-ज्ञान शब्दजन्य होने से (इन्द्रियजन्य-ज्ञान न होने से ) निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष ज्ञान का उदाहरण हो नहीं सकता, यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि शाब्दज्ञान को इन्द्रियजन्यत्व न होने पर भी उपर्युक्त प्रत्यक्षत्व-प्रयोजकत्व 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य ज्ञान में है। इस कारण यहाँ लक्षण और लक्ष्य की असंगति नहीं होती। नैयायिक 'इन्द्रियजन्य' ज्ञान को प्रत्यक्षज्ञान कहते हैं, परन्तु वह अतिव्याप्त होता है, क्योंकि इन्द्रियजन्यत्व को प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक मानने पर नैयायिकों


१. देवदत्तावच्छिन्नचैतन्यस्य वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्याभेदेन—इति पाठान्तरम् ।
२. तद्वृत्यवच्छिन्नचैतन्याभिन्नतया-इति पाठान्तरम् ।
३. प्रमातृत्वोपलक्षित-स्वरूपचैतन्यस्यैव ।
४. तदुभयाभेदस्य स्वरूपाकारवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्वरूपचैतन्ययोरभेदस्य ।

८० वेदान्तपरिभाषा [ प्रत्यक्षे इन्द्रियजन्यत्वस्याविचारः

के मत में 'मन भी इन्द्रिय होने से उससे होनेवाला अनुमितिज्ञान भी प्रत्यक्ष कहा जायगा', यह बताकर उसका निरसन भी कर दिया गया। इसलिए इन्द्रियजन्यत्व, प्रत्यक्ष में प्रयोजक हो नहीं सकता।

शंका—इससे पूर्व आपने 'प्रमाणचैतन्य का, योग्य वर्तमान-विषयावच्छिन्न चैतन्य से अभिन्नत्व' प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक बताया, और अब 'योग्य वर्तमान विषयकत्व होते हुए प्रमाणचैतन्य का विषय-चैतन्य से अभिन्नत्व, प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक बता रहे हैं। अतः दोनों की संगति कैसे हो ?

समाधान—दोनों लक्षणों का अर्थ एक ही है। 'वृत्तिरूप प्रमाण से अवच्छिन्न चतन्य' और योग्य, वर्तमान, अबाधित विषय से अवच्छिन्न चैतन्य दोनों का अभेद' यह अर्थ दोनों लक्षणों से समान ही निकलता है।

इस प्रकार प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक इन्द्रियजन्यत्व के न होने से, अर्थात् पूर्वोक्त उभय- विधचैतन्य का अभेद ही प्रत्यक्ष में प्रयोजक होने से 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्य से उत्पन्न ज्ञान 'प्रत्यक्ष' कहलाता है। क्योंकि उस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय (देवदत्त) समीप है। विषय के सन्निकृष्ट होने से अन्तःकरण की वृत्ति, इन्द्रिय के द्वारा बाहर निकलकर 'देव- दत्त' रूप विषय के आकार की बन जाती है—हमारा सिद्धान्त है। इसकारण 'देवदत्त' (रूप) विषय से अवच्छिन्न चैतन्य और विषयाकार वृत्ति से अवच्छिन्न चैतन्य, इन दानों का अभेद होकर 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य-ज्ञान को प्रत्यक्षत्व सिद्ध होता है।

शंका—वाक्यजन्य ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है—इस विषय में लौकिक उदाहरण के होने पर भी वैदिक उदाहरण का होना असम्भव प्रतीत होता है। कारण—'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' हे मैत्रेयि ! विज्ञाता को किस साधन से जानना चाहिए ? इत्यादि श्रुति से प्रमाता के विषयत्व का निराकरण किया गया है। इससे तत्पदार्थाभिन्न त्वंपदार्थ प्रमातृ- चैतन्य को विषयावच्छिन्न-चैतन्यत्व का अभाव होने से 'तत् त्वमसि' इस वाक्यजन्यज्ञान में पूर्वोक्त प्रयोजक का अभाव है।

समाधान—'तत्त्वमसि' वह सत् तू है—इस वैदिक वाक्यजन्य ज्ञान को भी प्रत्यक्षत्व है, क्योंकि उसमें पूर्वोक्त प्रत्यक्षत्व प्रयोजक है—यथा—'तत्त्वमसि' इस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय सन्निकृष्ट है। 'तत्' और 'त्वम्' पदों का लक्ष्य अर्थ 'चैतन्य', उस ज्ञान का विषय है। उस वाक्य से अन्तःकरण-वृत्ति पैदा होती है—यह हमारा सिद्धान्त है। इस कारण लक्ष्य-चैतन्य और वृत्यवच्छिन्न चैतन्य का अभेद होता है। इस अभेद के कारण ही 'तत्त्वमसि' इस वाक्यजन्य ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है। ('तत्वमसि' के सुनने पर सर्वज्ञत्व, किञ्चिज्ज्ञत्व—अकर्तृत्व, कर्तृत्व इत्यादि से विशिष्ट वस्तु का अभेद है—यह ज्ञान नहीं होता। किन्तु 'तत्' और त्वम्' इन दो पदों के लक्ष्य स्वरूप के ऐक्य का ज्ञान होता है। कारण यह है कि सर्वज्ञत्व—अकर्तृत्व आदि धर्मों से युक्त 'तत्पदार्थ' और किञ्चिज्ज्ञत्व- कर्तृत्व आदि धर्मों से युक्त 'त्वं पदार्थ' के ऐक्य का असम्भव है, क्योंकि विरुद्ध धर्म के

वृत्तिव्याप्तेरावश्यकता ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८१

दो पदार्थों की एकता होना अशक्य है । परन्तु उस 'तत्' और 'त्वम्' पदों के लक्ष्य ( चैतन्य ) तो सन्निकृष्ट ही हैं । इसलिये 'तत्त्वमसि' वाक्य से उत्पन्न हुई अन्तःकरण-वृत्ति के स्वीकार करने में कोई बाधक नहीं है । इसी कारण लक्ष्यचैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य को एकदेशस्थित दो उपाधियों से अवच्छिन्नत्व है । इस प्रकार उन दो चैतन्यों का अभेद होने से 'तत्त्वमसि' इस वाक्यजन्य ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है । इस ज्ञान में प्रमाता ही विषय होने से ( उस वाक्यजन्य ज्ञान में प्रमातृ पद को—'तत्त्वं' पद से लक्ष्यभूत चैतन्य को—ही विषयत्व होने से ) विषय चैतन्य और वृत्ति चैतन्य का ऐक्य ( एकता ) हो पाता है ।

शंका—'तत्त्वम्' पद से लक्ष्यभूत ब्रह्म शास्त्रजन्यज्ञान का विषय है—यह कहने पर 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' आदि श्रुतियों की क्या गति है ?

समाधान—यह श्रुति विज्ञाता के 'फलव्याप्यत्व' का निराकरण करती है । वह उसके 'वृत्तिव्याप्यत्व' का निराकरण नहीं करती । पंचदशीकार कहते हैं—'फलव्याप्यत्वमेवास्य शास्त्रकृद्भिर्निवारितम् । ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता ॥'

इन्द्रियसन्निकर्ष के कारण अन्तःकरण की घटादिविषयाकार वृत्ति के उत्पन्न होने पर उसमें चैतन्य प्रतिबिम्बित होता है । उस 'चैतन्य' को 'फल' कहते हैं । चैतन्य-प्रतिबिम्ब से युक्त हुई वृत्ति, विषय को व्याप्त करती है । इस कारण उस वृत्ति के साथ फलरूप चैतन्य की व्याप्ति भी सिद्ध ही है । ऐसा होने से घटादि जड़ विषयों को फलव्याप्यत्व है । परन्तु वह फलव्याप्यत्व 'ब्रह्म' में नहीं बन पाता । कारण—ब्रह्म, साक्षात् चैतन्यात्मक है । इस कारण वृत्ति के साथ रहनेवाला चैतन्य भी चिद्रूप ब्रह्म में किसी प्रकार का अतिशय पैदा नहीं कर सकता । दूसरी बात यह भी है कि ब्रह्म में फलव्याप्ति के मानने पर वह ब्रह्म जड़ हो जायगा । कारण जड़ में ही फलव्याप्ति का सम्भव होता है और जड़ के साक्षात्कार के लिए उसकी आवश्यकता भी होती है इससे 'तत्त्वमसि' सुनने पर पैदा हुई वृत्ति के द्वारा ब्रह्म के व्याप्त होने में किसी प्रकार का दोष नहीं है । प्रत्युत, किसी पदार्थ के अज्ञान की निवृत्ति हुए बिना उसका भान (ज्ञान) नहीं होता और अज्ञान की निवृत्ति, अन्तःकरण की वृत्ति के द्वारा ही होती है । इसलिये ब्रह्मविषयक अज्ञान की निवृत्ति के लिए अन्तःकरण-वृत्ति को स्वीकार करना ही चाहिये, यह कारिका का आशय है ।

इस पर शंका—

ननु वाक्यजन्य-ज्ञानस्य पदार्थ-संसर्गावगाहितया कथं निर्विकल्पकत्वम् ?

अर्थ—वाक्यजन्यज्ञान को पदार्थसंसर्गविषयत्व होने से निर्विकल्पकत्व कैसे ?


१. 'सोऽयं देवदत्तः इत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानं संसर्गावगाहि वाक्यजन्यज्ञानत्वात्, गामा-नयेति-वाक्यजन्यज्ञानवत् ।'

८२वेदान्तपरिभाषा[ वेदान्तानामखण्डार्थत्वम्

विवरण—( १ ) 'वह^१ यह देवदत्त' आदि वाक्यजन्यज्ञान संसर्गावगाहि है—( संसर्ग को विषय करनेवाला है ), ( २ ) क्योंकि उसमें वाक्यजन्यज्ञानत्व है, ( ३ ) 'गो को लाओ' इत्यादि वाक्यजन्य ज्ञान की तरह । अथवा^१—( १ ) 'वह यह देवदत्त' वाक्य से पैदा हुआ ज्ञान निर्विकल्पक नहीं है, ( २ ) क्योंकि उसमें संसर्गावगाहित्व है, ( ३ ) 'गो को लाओ' आदि वाक्यजन्य ज्ञान की तरह । इस आशय से यहाँ पर यह शङ्का की गई है । वाक्य से होने वाला ज्ञान उस वाक्यगत प्रत्येक पद के अर्थ के परस्पर सम्बन्ध को विषय करता है । जैसे—'गो को लाओ' इस वाक्य में 'तू' पद 'लाओ' क्रिया के साथ 'कर्तृत्व' रूप से सम्बन्धित होता है । और 'गो' पद, उस क्रिया के साथ 'कर्मत्व' रूप से सम्बन्धित होता है । और 'त्वत्कर्तृक-गोकर्मक-आनयन' इत्याकारक शाब्द बोध होता है । इसलिये यह संसृष्ट वाक्यार्थ है ।

वाक्यजन्य सभी ज्ञान, प्रत्येक पद के अर्थ में स्थित परस्पर कर्तृत्वादि संसर्ग को विषय करते हैं । ऐसी स्थिति में उसे निर्विकल्पकज्ञान कैसे कहा जा सकता है ? जो ज्ञान, विशिष्ट का ग्रहण करे वह 'सविकल्पक' होता है, जैसे—यह डित्थ है, यह ब्राह्मण है, यह श्याम है, यह पाचक है आदि ज्ञान । इस आकार का जो नहीं हो वह 'निर्विकल्पक' ज्ञान कहा जाता है । वाक्यजन्यज्ञान को संसर्गावगाहि होने से उसमें निर्विकल्पकत्व कैसे ?

उच्यते। वाक्यजन्य-ज्ञानविषयत्वे हि न पदार्थसंसर्गत्वं तन्त्रम्, अनभिमतसंसर्गस्यापि वाक्यजन्य ज्ञानविषयत्वापत्तेः, किन्तु तात्पर्यविषयत्वम् ॥

अर्थ—उपर्युक्त शङ्का का समाधान बताया जाता है—वाक्यजन्यज्ञान के विषयत्व में पदार्थों का संसर्गत्व, तन्त्र ( प्रयोजक-निमित्त ) नहीं है । कारण यह है कि वाक्यजन्य-ज्ञानविषयत्व में पदार्थसंसर्गत्व को ही प्रयोजक मानने से वक्ता के द्वारा अनभिप्सित संसर्ग को भी वाक्यजन्यज्ञानविषयत्व होने का प्रसंग आवेगा । अतः वक्ता के तात्पर्य का जो विषय हो वही वाक्यजन्यज्ञान का विषय है, अर्थात् तात्पर्यविषयत्व को वाक्यजन्यज्ञानविषय में प्रयोजकता है ।

विवरण—वाक्यजन्यज्ञान के विषय-निर्धारण में पदार्थसंसर्ग यदि निमित्त रहता तो वाक्यजन्यज्ञान को निर्विकल्पक नहीं कहा जाता । वस्तुतः पदार्थसंसर्ग में वाक्यजन्यज्ञान की विषयता है ही नहीं ( पदार्थसंसर्गविषयत्व, वाक्यजन्यज्ञान में प्रयोजक नहीं है ) क्योंकि पदार्थसंसर्ग को ही यदि वाक्यजन्यज्ञान में प्रयोजक मानें तो वक्ता को अनभिमत ऐसे अश्वादिसंसर्ग को भी वाक्यजन्यज्ञानविषयत्व प्राप्त होगा । भोजन


१. 'सोऽयं देवदत्तः इत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानं, निर्विकल्पकं नास्ति, संसर्गावगाहित्वात्. गामानयेतिवाक्यजन्यज्ञानवत् ।'

वेदान्तानामखण्डार्थत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८३

के समय 'सैन्धवमानय' वाक्य में वक्ता को असंमत अश्वादि-पदार्थसंसर्ग भी वाक्यज्ञान का विषय है, मानना पड़ेगा। 'सैन्धव' का अर्थ है सेंधा नमक और सिंधु देश का 'घोड़ा। भोजन करते समय 'सैन्धव लाओ' कहने वाले वक्ता का तात्पर्य 'सेंधा नमक' रूप अर्थ में होता है, इसलिये उसके वाक्य का तात्पर्यविषय 'सेंधा नमक' है। उस समय 'सैन्धव ( अश्व ) लाओ' इस वाक्य में 'अश्वकर्मक आनयन क्रिया' रूप संसर्ग, वक्ता को अभिमत नहीं रहता। इस कारण वह संसर्ग वाक्यज्ञान के विषय-निर्धारण में प्रयोजक नहीं बन सकता। इसलिये केवल पदार्थसंसर्ग को वाक्यज्ञान का विषय नहीं माना जा सकता। तो फिर वाक्यजन्यज्ञान-विषयत्व में क्या निमित्त है ? उत्तर—वक्ता के तात्पर्य का जो विषय हो वही वाक्यजन्यज्ञान का विषय होता है। फिर वह तात्पर्य-विषय पदार्थों का संसर्ग हो या न हो, यह विचार आवश्यक नहीं है। अब प्रकृत के 'सोऽयं देवदत्तः' लौकिक वाक्य में वक्ता का तात्पर्य देवदत्त के देह में ( उसका देह, इस अर्थ में ) होने से तात्पर्य का विषय न बने हुए पदार्थसंसर्ग की वाक्यजन्यज्ञान-विषय में प्रयोजकता नहीं होती।

इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' वैदिक महावाक्य का तात्पर्य, अद्वितीय विशुद्ध ब्रह्म में है। यह निश्चय 'उपक्रमोपसंहारादि' तात्पर्य-लिंगों से होता है। इसलिए तात्पर्य-विषय न हुआ वाक्यगत पदार्थों का संसर्ग, तात्पर्य का अविषय है। क्योंकि ऐसे वाक्यों में पदार्थों का असंसर्ग ही तात्पर्य का विषय है, इस आशय से ग्रन्थकार कहते हैं—

प्रकृते च 'सदेव सौम्येदमग्र आसीत्' छां०-६-२-१ इत्युपक्रम्य 'तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' छां० ६-८-७ इत्युपसंहारेण विशुद्धे ब्रह्मणि वेदान्तानां तात्पर्यमवसितमिति कथं ¹तात्पर्याविषय संसर्गमवबोधयेत् ।

अर्थ— प्रकृत 'तत्त्वमसि' उदाहरण में "हे सौम्य प्रियदर्शन पुत्र ! यह जगत् उत्पत्ति से पूर्व 'सत्' ही था"। यह उपक्रम ( प्रारम्भ ) कर "वह सत् ही सत्य है, वह आत्मा है, और वह सत् ही तू है" ऐसा उपसंहार किया होने से विशुद्ध ब्रह्म में वेदान्त का तात्पर्य निश्चित हुआ है। ऐसी स्थिति में यह वाक्य, तात्पर्य का विषय न बने हुए पदार्थसंसर्ग को कैसे बतावेगा ?

विवरण— 'पहले यह सब सत् ही था' इस उपक्रम और 'वह सत्य है, वही आत्मा है, वह तू है' इस उपसंहार से 'तत्त्वमसि' वाक्य का तात्पर्य अद्वितीय विशुद्ध ब्रह्म में है—निश्चय होता है। इसके वाक्यगत-पदार्थों के 'संसर्ग' में तात्पर्यविषयता न 'असंसर्ग' में ही तात्पर्य-विषयत्व है। इसलिये 'सोऽयं देवदत्तः', 'तत्त्वमसि' ऐसे वाक्यों के तात्पर्य का विषय न होने वाले संसर्गविषयत्व का बाध होता है।


१. तात्पर्याविषयसंसर्गं० —इति पाठान्तरम् ।

८४वेदान्तपरिभाषा[ वेदान्तानामखण्डार्थत्वम्

शंका—तत्त्वमस्यादि वाक्यों के प्रसिद्ध अखण्डार्थत्व का त्यागकर उनमें (वाक्यों में) संसर्ग के विषय न होने वाले ज्ञान का विषयत्व किस तरह माना जा सकता है ? संसर्ग का विषय न होने वाले ज्ञान का जनकत्व उन वाक्यों में है—यह कुछ नवीन सा लग रहा है।

'इदमेव तत्त्वम²स्यादि वाक्यानामखण्डार्थत्वम्, यत् संसर्गानवगाहियथार्थज्ञानजनकत्वमिति ॥ तदुक्तम्
संसर्गासङ्गि सम्यग् धी हेतुता या गिरामियम् ।
उक्ताऽखण्डार्थता यद्वा तत्प्रातिपदिकार्थता ॥ १ ॥
प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्वं ³वाऽखण्डार्थत्वमिति चतुर्थपादार्थः ॥

अर्थ—संसर्ग का विषय न होने वाले यथार्थ ज्ञान का जनकत्व (उत्पादकत्व) ही तत्त्वमस्यादि वाक्य का अखण्डार्थत्व है। इस विषय में चित्सुखाचार्य ने इस प्रकार कहा है 'गिराम्' तत्त्वमस्यादि वाक्यों को संसर्ग का विषय न होने वाले सम्यग्ज्ञान का हेतुत्व (उन वाक्यों से तादृश यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होना) ही उन वाक्यों का अखण्डार्थत्व है। अथवा उन वाक्यों का प्रातिपदिकार्थत्व है। परन्तु इस दूसरे 'प्रातिपदिकार्थत्व' लक्षण पर अतिव्याप्ति न हो इसलिए 'प्रातिपदिकार्थत्व' में 'मात्र' पद का निवेश करना चाहिए। अर्थात् 'प्रातिपदिकार्थत्व' से तात्पर्य 'प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्व' है, यही अखण्डार्थत्व है। यह उपर्युक्त कारिका के चौथे पाद का अर्थ है।

विवरण—मूल में 'इदमेव' के 'एव'कार का अर्थ 'अपि' समझना चाहिए। अर्थात् 'यही' अर्थ न कर 'यह भी' अर्थ करना चाहिये। क्योंकि 'यही' अर्थ करने पर दूसरे लक्षण का असंभव होगा। परन्तु चित्सुखाचार्य की कारिका के '(यद्वा) तत्प्रातिपदिकार्थता' इस चौथे पाद में अखण्डार्थत्व का दूसरा लक्षण बताया है, इसलिये तीन पादों के द्वारा कहे गये प्रथम लक्षण से द्वितीय लक्षण का समुच्चय करने के लिये 'इदमेव' के स्थान में 'इदमपि' समझना चाहिये। अब 'संसर्ग का विषय न होने वाले यथार्थ ज्ञान का जनकत्व' रूप लक्षण नवीन न होकर प्राचीन ही है, यह प्रदर्शित करने के लिये उसमें चित्सुखाचार्य की सम्मति दिखाते हैं। तत्त्वमस्यादि वाक्यों का जो संसर्गासंगि-सम्यग्ज्ञानहेतुत्व है वही उनका अखण्डार्थत्व है। महावाक्यों का सम्यग्ज्ञान


१. ननु तत्त्वमस्यादिवाक्यानां प्रसिद्धमखण्डार्थत्वं विहाय कथं संसर्गानवगाहिज्ञानजनकत्वमपूर्वमुक्तमित्याशङ्क्याह—'इदमेवेति' । एवकारः अप्यर्थे, तेन च प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्वमखण्डार्थत्वमित्यस्य समुच्चयः ।
२. तत्त्वमसीत्यादिवाक्य०—इति पाठान्तरम् ।
३. त्वमखण्डार्थत्वम्—इति पाठान्तरम् ।

प्रत्यक्षद्वैविध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८५

में निमित्त-कारण होना ही उनका अखण्डार्थत्व है। परन्तु वह सम्यग्ज्ञान संसर्ग से सम्बन्ध रखनेवाला नहीं होना चाहिए। अर्थात् 'गाय को लाओ' आदि वाक्य, जैसे संसर्ग को अपना विषय बनाकर वाक्यार्थज्ञान में कारण होता है। वैसे 'तत्त्वमसि' वाक्य 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थों के संसर्ग को अपना विषय बनाकर संसर्गसम्बन्धी सम्यक् ज्ञान ( वाक्यार्थज्ञान ) में कारण नहीं होता। अपितु संसर्ग से सम्बद्ध न होने वाले सम्यग्ज्ञान में कारण होता है। वाक्य का संसर्गासंसिगसम्यग्ज्ञान में कारण होना ही उसका अखण्डार्थत्व है। यह अखण्डार्थत्व का एक लक्षण हुआ। उसी का 'यद्वा तत्प्रातिपदिकार्थता' दूसरा लक्षण है। 'सोऽयं देवदत्तः', 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों की प्रातिपतिकार्थता ही अखण्डार्थत्व है। मूल में 'प्रातिपदिकार्थता' इतना ही लक्षण है। परन्तु वह लक्षण संसर्ग-परक वाक्यों में अतिव्याप्त होता है, कारण संसर्गपरक वाक्य में भी प्रातिपदिकार्थ का प्रतिपादकत्व रहता है, संसर्गपरक वाक्यगत पद भी प्रातिपदिकार्थ का प्रतिपादन करते ही हैं। इसलिए उसमें 'मात्र' पद का निवेश करना चाहिए जिससे ऐसे वाक्यों का 'प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्व' ही अखण्डार्थत्व है। इस लक्षण से उपर्युक्त अतिव्याप्ति का भी निवारण होगा।

क्योंकि संसर्ग-परक वाक्य, प्रातिपदिकार्थ का प्रतिपादन भले ही करते हों तथापि प्रातिपदिकार्थ मात्र का प्रतिपादन नहीं करते। इसलिए उनमें इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती।

अब साक्षिचैतन्य की द्विविधता से पूर्वोक्त प्रत्यक्ष के द्विविधत्व को बताते हैं—

तच्च प्रत्यक्षं पुनर्द्विविधं—जीवसाक्षि ईश्वरसाक्षि चेति। तत्र जीवो नामान्तःकरणावच्छिन्नं¹ चैतन्यम्। तत्साक्षि तु अन्तःकरणोपहितं चैतन्यम्। अन्तःकरणस्य विशेषणत्वोपाधित्वाभ्यामनयोर्भेदः। विशेषणं च कार्यान्वयि व्यावर्तकम्²। उपाधिश्च कार्यानन्वयी व्यावर्तको वर्तमानश्च। ³रूपविशिष्टो घटोऽनित्य इत्यत्र रूपं विशेषणम्। कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नभः श्रोत्रमित्यत्र कर्णशष्कुल्युपाधिः। अयमेवोपाधिर्नैयायिकैः परिचायक इत्युच्यते ॥

अर्थ—और वह सविकल्पक-निर्विकल्पक रूप प्रत्यक्ष पुनश्च दो प्रकार का है। एक जीवसाक्षि-प्रत्यक्ष और दूसरा ईश्वरसाक्षि-प्रत्यक्ष। इनमें अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य


१. च्छिन्नं चैत०—इति पाठान्तरम्।
२. व्यावर्तकं वर्तमानम्—इति पाठान्तरम्।
३. यथारूप०—इति पाठान्तरम्।

८६ वेदान्तपरिभाषा [प्रत्यक्षद्वैविध्यम्

'जीव' है। और अन्तःकरणोपहित चैतन्य 'जीवसाक्षि' है। अन्तःकरण के विशेषणत्व और उपाधित्व के कारण जीव और जीवसाक्षी का भेद है, अर्थात् अन्तःकरण-विशिष्ट-चैतन्य-जीव है, और अन्तःकरणोपहित-चैतन्य-जीवसाक्षि है। विशेषण उसे कहते हैं—जो कार्यान्वयि तथा व्यावर्तक और वर्तमान हो। और उपाधि उसे कहते हैं जो कार्य से अन्वय (सम्बन्ध) न रखते हुए व्यावर्तक और वर्तमान हो। 'रूप (इस) विशेषण से विशिष्ट हुआ घट अनित्य है' इस उदाहरण में 'रूप' यह विशेषण है। 'कर्ण-शष्कुलि से अवच्छिन्न (पृथक्) हुआ आकाश-श्रोत्र है।' इस उदाहरण में 'कर्ण-शष्कुलि' (यह) उपाधि है। नैयायिक इस उपाधि को ही 'परिचायक' कहते हैं।

**विवरण—**पहले सविकल्पक और निर्विकल्पक भेद से प्रत्यक्षज्ञान दो प्रकार का होता है, यह बताया। परन्तु संसर्ग का विषयत्व और अविषयत्व रूप दो निमित्तों से उसकी द्विविधता का सम्भव होने पर भी वह दोनों प्रकार का ज्ञान, चैतन्य रूप होने से एक ही है। चैतन्य रूप से उस एक ही ज्ञान के पुनः जीव-साक्षि-चैतन्य और ईश्वर-साक्षि-चैतन्य, अर्थात् 'शिखामणि' टीकाकार के कथनानुसार जीवसाक्षि-जन्य चैतन्य और ईश्वरसाक्षि-जन्य चैतन्य (ये) दो प्रकार हैं।

इस पर 'अर्थदीपिकाकार ने यह आक्षेप किया है कि शिखामणिकार ने जो 'साक्षि-जन्य' कहा है वह हमें मान्य नहीं है क्योंकि ज्ञान के चैतन्य रूप होने से उसमें (चैतन्य में) जन्यत्व का सम्भव नहीं।

परन्तु चैतन्य रूप ज्ञान, स्वरूपतः अजन्य (उत्पन्न न होनेवाला) होने पर भी वृत्तिरूपज्ञान अथवा वृत्तिविशिष्ट ज्ञान तो जन्य है ही, यह वेदान्त-सिद्धान्त है। इसलिए केवल जीवसाक्षि और ईश्वरसाक्षि चैतन्य का भेद मानने की अपेक्षा, जीवसाक्षिजन्य और ईश्वरसाक्षिजन्य चैतन्य का भेद मानना अधिक उचित प्रतीत होता है। अतः जीव का (जो) साक्षी, उससे उत्पन्न होनेवाला और ईश्वर का (जो) साक्षी, उससे उत्पन्न होनेवाला चैतन्य—ऐसा शिखामणिकार की व्याख्यानुसार ही व्याख्यान करना उचित है। इस प्रकार व्याख्यान करने से ही 'एवं साक्षिद्वैविध्येन प्रत्यक्षज्ञानद्वैविध्यम्' इस तरह साक्षिद्वैविध्य से प्रत्यक्षज्ञान का द्विविधत्व है—इस उत्तर ग्रन्थ की सङ्गति लगती है। सिवाय 'साक्षि' शब्द का 'साक्षिजन्य' व्याख्यान न कर 'जीवसाक्षि ईश्वरसाक्षि च' वाक्य से केवल साक्षी के द्विविधत्व को यदि बताया जाय तो 'प्रत्यक्षज्ञानद्वैविध्यं निरूपितम्' इस अग्रिम ग्रन्थ की असंगति स्पष्ट ही है। क्योंकि "वह प्रत्यक्ष पुनः दो प्रकार का है", ऐसा उपक्रम कर बीच में ही जीवेश्वर-साक्षी का निरूपण करना सर्वथा अयुक्त है। इस प्रकार साम्प्रदायिक विद्वान् कहते हैं।

इस (जीवसाक्षिजन्य प्रत्यक्ष और ईश्वरसाक्षिजन्य प्रत्यक्ष) प्रत्यक्ष चैतन्य के द्विविधत्व को दूसरे प्रकार से बताकर जीव का निरूपण किये बिना जीवसाक्षिजन्य

मायाया एकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८७

प्रत्यक्ष का निरूपण करना आवश्यक जानकर ग्रन्थकार प्रथमतः जीव के स्वरूप का निरूपण करके जीव-साक्षी के स्वरूप-लक्षण को कहते हैं।

'तत्र ०' ईश्वर और जीव में से जीव किसे कहते हैं—अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्य—जीव है। और अन्तःकरणोपहित चैतन्य—उसका ( जीव का ) साक्षी है। अन्तःकरण जब चैतन्य का विशेषण रहता है तब ( चैतन्य ) 'जीव' कहलाता है और अन्तःकरण जब उसकी ( चैतन्य की ) उपाधि रहता है तब उसे जीव का साक्षित्व प्राप्त होता है। अर्थात् अन्तःकरण के विशेषणत्व और उपाधित्व के कारण 'जीव' और 'जीवसाक्षी' ऐसा भेद होता है।

विशेषण और उपाधि में क्या अन्तर है?—विशेषण और उपाधि दोनों व्यावर्तक और वर्तमान होते हैं, अर्थात् वर्तमानत्व और व्यावर्तकत्व ( ये ) दोनों धर्म, विशेषण, और उपाधि में समानतया रहते हैं, परन्तु विशेषण कार्यान्वयी होता है और उपाधि, कार्यान्वयी नहीं होता । जैसे—'रूपविशिष्ट ( रूप विशेषण से युक्त ) घट अनित्य है' इसमें रूप विशेषण है क्योंकि 'घट' उससे युक्त है । परन्तु 'कर्णशष्कुलि से अवच्छिन्न ( महाकाश से पृथक् हुआ ) आकाश—श्रोत्र है यहाँ 'कर्णशष्कुलि' उपाधि है। 'रूप' घट से सम्बन्ध रहने के कारण विशेषण है, परन्तु आकाश कर्णशष्कुलि से सम्बद्ध नहीं है, क्योंकि निरवयव आकाश और सावयव कर्णशष्कुलि दोनों के सम्बन्ध का सम्भव नहीं है। इसलिए 'कर्णशष्कुलि' उपाधि है, विशेषण नहीं। घट जैसा रूप से विशिष्ट रहता है वैसे कर्णछिद्र कान से विशिष्ट नहीं है। मूल में 'कार्यान्वयी' और 'कार्यानन्वयी' शब्द हैं। इसमें से 'कार्य' पद का अर्थ अवच्छेद्य ( अन्वय योग्य ) है। अवच्छेद्य से सम्बन्ध होने योग्य-घटादि पदार्थ । 'रूपविशिष्ट घट' यहाँ 'रूप' को 'घट' पदार्थ से अन्वयित्व, व्यावर्तकत्व और वर्तमानत्व होने से विशेषणत्व है। और 'कर्णशष्कुल्यवच्छिन्न आकाश' यहाँ कर्णशष्कुलि पद को कार्य से अनन्वयित्व, व्यावर्तकत्व और वर्तमानत्व होने से उपाधित्व है। वेदान्ती के इस उपाधि को ही नैयायिक परिचायक कहते हैं। यह कह कर उपाधि पदार्थ, अन्यान्य शास्त्रों में भी प्रसिद्ध है यह सूचित किया है। अब जीव-साक्षी के प्रसंग में अन्तःकरण में उपाधित्व कैसे बनता है, उसे कहते हैं—

प्रकृते¹ चान्तःकरणस्य जडतया विषयभासकत्वायोगेन विषय-


१. जीवपक्षे अन्तःकरणं विशेषणम्, साक्षिपक्षे तु उपाधिः, अत्र किं कारणम् ? शुद्धचैतन्यं निर्विकारं भवति, चेतनानधिष्ठितं केवलमन्तःकरणं जडं भवति, तस्मात् कर्तृत्वलक्षणजीवत्वान्वयासम्भवेऽपि अन्योन्य-तादात्म्यापन्नयोस्तयोः जीवत्वान्वये बाधकाभावात् अन्तःकरणस्य स्वान्वितचैतन्यांशे विधेयेन जीवत्वेन अन्वयाद् वर्तमानत्वाद् व्यावर्तकत्वाच्च विशेषणत्वं युक्तम् । किन्तु साक्षिपक्षे अन्तःकरणस्य विशेषणत्वं नैव युक्तम् । विषयभा-

८८ | वेदान्तपरिभाषा | [ मायाया एकत्वम्

भासक-चैतन्योपाधित्वम् । अयं च जीवसाक्षी प्रत्यात्मं नाना । एकत्वे मैत्रावगते चैत्रस्याप्यनुसन्धानप्रसंगः ।

**अर्थ—**प्रकृत प्रसंग में अन्तःकरण के जड़ होने से उसमें विषयावभासकत्व नहीं बन पाता, इसलिए उसे ( अन्तःकरण में ) विषयावभासक-चैतन्य का उपाधित्व है । यह जीवसाक्षिचैतन्य, प्रत्येक आत्मा में भिन्न-भिन्न है । प्रत्येक प्रमाता का साक्षि-चैतन्य यदि भिन्न-भिन्न न माना जाय ( समस्त जीवों में साक्षिचैतन्य एक ही है ) तो मैत्र को अवगत हुए अर्थ का चैत्र को भी अनुसन्धान होने लगेगा ।

**विवरण—शंका—**कर्णशष्कुली को उपाधि कहना तो उचित है परन्तु अन्तःकरण को जीवसाक्षिचैतन्योपाधित्व कहना प्रयोजनशून्य ( व्यर्थ ) है । कारण यह है कि प्रमाता ने ( अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्य = जीव ने ) विषय प्रकाशनार्थ अपने साक्षी की यदि अपेक्षा की होती तो उसे साक्षिचैतन्य का उपाधि मानना योग्य हुआ होता । परन्तु प्रमाता विषय-प्रकाशनार्थ स्वसाक्षी की अपेक्षा ही नहीं रखता । वह साक्षी की सहायता के बिना चक्षुरादि इन्द्रियजन्य-वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य से ही विषय को प्रकाशित कर लेगा ।

**समाधान—**ऐसी शंका करना उचित नहीं । क्योंकि 'अन्तःकरण' अविद्या का कार्य होने से जड़ है । इसलिए वह विषय को प्रकाशित करने में असमर्थ है । क्षण-प्रतिक्षण उत्पन्न होनेवाली वृत्तियों के अनेक होने के कारण, उन वृत्तियों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य भी अनेक हैं । उस कारण अनेकसंख्यक हुई वृत्तियों को समस्त विषयों का अनुसन्धातृत्व सम्भव नहीं । ( क्षण-प्रतिक्षण उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाली वृत्तियाँ सम्पूर्ण विषयों का अनुसंधान करने में समर्थ नहीं हैं ।) प्रमाता, अन्तःकरण से अवच्छिन्न हुआ होने से उसे भूत, भविष्यत्, वर्तमान विषयों का अनुसंधान करने के लिये दूसरे के साहाय्य की अपेक्षा है । बिना सहायता लिए उसे त्रैकालिक विषयों का अनुसंधान करना शक्य नहीं है । इसलिए प्रमाता से सम्बद्ध और ब्रह्माभिन्न ऐसे साक्षी की अत्यन्त आवश्यकता है । इसलिये अन्तःकरण में साक्षी का उपाधित्व अवश्य स्वीकार करना चाहिये ।

**शंका—**जीवसाक्षी का ब्रह्म के साथ अभेद होने से उसमें स्वयं प्रकाशत्व है । इसलिए साक्षी में सर्वविषयानुसंधातृत्व है यह मानने पर उसमें एकत्व प्राप्त होता है । क्योंकि ब्रह्म एक है इसलिये ब्रह्माभिन्न साक्षी में भी एकत्व ही है और सब जीवों का


भासकत्वं हि साक्षित्वम् । न चान्तःकरणस्य तद्युज्यते, जडत्वाद् विकारित्वाच्च तस्य । तथा च विवरणकाराः—"सर्वं वस्तु ज्ञाततया अज्ञाततया वा साक्षिचैतन्यस्य विषय एव । तस्मात् स्वान्वित-चैतन्यांशे विधेयेन साक्षित्वेन अन्तःकरणस्य अन्वयाभावात् तस्योपाधित्वं युक्तम् ।

मायाया एकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८९

साक्षी एक है ऐसा मानने पर एक जीव से अनुभूयमान विषय का अनुसंधान दूसरे को भी होने लगेगा। इस शंका का निरसन करने के लिये ग्रंथकार कहते हैं—प्रत्येक जीवात्मा का यह साक्षिचैतन्य भिन्न-भिन्न है, क्योंकि उसे एक मानने पर, मैत्र को ज्ञात हुए विषय का अनुसंधान (स्मरण) चैत्रादि अन्य व्यक्तियों को भी होने लगेगा। परन्तु ऐसी अनवस्था न हो इसलिये हमने अन्तःकरण रूप उपाधि के भेद के कारण जीवसाक्षी में नानात्व स्वीकार किया है। अतः उपर्युक्त दोष नहीं आता। इस तरह जीवसाक्षी का निरूपण कर अब ईश्वरसाक्षी का निरूपण करते हैं—

ईश्वरसाक्षी तु ¹मायोपहितं चैतन्यम्। तच्चैकम्। तदुपाधिभूत ²मायाया एकत्वात्। 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' इत्यादिश्रुतौ मायाभिरिति बहुवचनस्य मायागत-शक्तिविशेषाभिप्राय³तया मायागतसत्त्वरजस्तमो⁴रूपगुणाभिप्राय⁵तया वोप⁶पत्तेः॥

**अर्थ—**परन्तु इसके विपरीत मायोपहितचैतन्य ही ईश्वरसाक्षिचैतन्य है। और वह एक है। क्योंकि उस चैतन्य की उपाधिभूत माया एक है। 'इन्द्र (परमेश्वर) माया के कारण बहुरूपत्व को प्राप्त होता है।' आदि श्रुति में 'मायाभिः' इस बहुवचन का आशय 'माया के शक्ति-विशेष से' है। अर्थात् 'मायाभिः'—मायाओं से—इस प्रयुक्त बहुवचन का अभिप्राय एक महामाया की असंख्य विचित्र अवान्तरण शक्तियाँ—होने से मुख्य माया के एकत्व के साथ विरोध नहीं है। अथवा मायागत सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणों के अभिप्राय से वह बहुवचन है—इस प्रकार उस बहुवचन की उपपत्ति लगानी चाहिये।

**विवरण—**पहले जीवसाक्षी का निरूपण करते समय अन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्य 'जीव' और अन्तःकरणोपहित-चैतन्य 'जीवसाक्षी' बताया गया है। अब ईश्वर और ईश्वरसाक्षिचैतन्य को बताने के लिए 'मायोपहित-चैतन्य' ही ईश्वरसाक्षिचैतन्य है (माया-


१. मायोपहितमविद्योपहितम्। मायाऽविद्ययोरभेद इति विवरणसिद्धान्तः। माया-विद्ययोर्भेदपक्षे तु मायोपहितमिति विशुद्धसत्त्वप्रधानोपहितमित्यर्थः। विशुद्धसत्त्वप्रधाना माया, मलिनसत्त्वप्रधानात्वविद्येति तयोर्भेदः। तथा च पञ्चदशीकाराः—"तमोरजः-सत्त्वगुणा प्रकृतिर्द्विविधा च सा। सत्त्वशुद्धयविशुद्धिभ्यां मायाऽविद्ये च ते मते।"
२. ताया-इति पाठान्तरम्।
३. यक-इति पाठान्तरम्।
४. मोगुणा-इति पाठान्तरम्।
५. यक-इति पाठान्तरम्।
६. चोप-इति पाठान्तरम्।

९०वेदान्तपरिभाषा[ मायाया एकत्वम्

वच्छिन्न चैतन्य ही ईश्वरचैतन्य है ) यहाँ बताया है । इस बात को स्वयं ग्रंथकार आगे कहेंगे ही । परन्तु जीवसाक्षिचैतन्य की तरह ईश्वरसाक्षिचैतन्य भी क्या अनेक है ? उत्तर—नहीं । यह ईश्वरसाक्षिचैतन्य एक है, क्योंकि उस साक्षिचैतन्य की उपाधिरूप माया एक है । माया के एक होने से मायोपहित चैतन्य भी एक है और प्रत्येक जीव-चैतन्य का अन्तःकरण भिन्न होने से अन्तःकरणोपहित चैतन्य भी भिन्न ( अनेक ) है । इस प्रकार इन दो साक्षिचैतन्यों में विशेष ( अन्तर ) है, उसी को सूचित करने के लिये मूल में 'ईश्वरसाक्षि तु' वाक्य में 'तु' शब्द का उपयोग किया है । अनादि, अनिर्वाच्य, विपर्यय की उपादान और विक्षेपप्रधान ईश्वरशक्ति ही माया है--इस प्रकार माया का लक्षण किया गया है ।

शंका—माया को एक कहने पर बृहदारण्यक के--'परमेश्वर, मायाओं के योग से अनेक रूप को प्राप्त हुआ है'—श्रुतिवचन से विरोध होता है । इस पर ग्रंथकार धर्म-राजाध्वरीन्द्र कहते हैं—'निष्प्रतिबन्ध ऐश्वर्य से युक्त हुआ परमात्मा मायाओं के योग से अनेकाकार प्रतीत होता है ।' इस वाक्य में 'मायाभिः' ( यह ) बहुवचन का प्रयोग, मायागत शक्तिविशेषों के अभिप्राय से किया गया है । मुख्य माया में जो असंख्य विचित्र शक्तियाँ हैं वे ही शक्तिविशेष हैं । अग्नि प्रभृति पदार्थों में दाहकत्व, प्रकाशकत्व आदि कार्यों को देखकर तत्तद् शक्तियां तत्तत् पदार्थों में जैसी कल्पित की जाती हैं, उसी तरह जगद्रूप विचित्र कार्यों के देखने से तत्तत् असंख्य कार्यों की शक्तियाँ माया में कल्पित करनी पड़ती हैं । उन्हीं को शक्तिविशेष अथवा अवान्तर शक्ति कहते हैं । इन असंख्य शक्तिविशेषों के अभिप्राय से 'मायाभिः' ( ऐसा ) श्रुति में कहा है । मूल माया के अभिप्राय से नहीं । अथवा सत्त्व, रज, और तम—इन तीन गुणों की साम्यावस्था को माया ( प्रकृति ) कहते हैं । उन तीन गुणों के अभिप्राय से श्रुति में 'मायाभिः' बहुवचन का उपयोग किया है । भाव यह है कि ईश्वरसाक्षि की उपाधिभूत माया एक है । वह जीवसाक्षी के उपाधिभूत अन्तःकरण की तरह नाना नहीं है ।

शंका—'मायाभिः' यह बहुवचनान्त प्रयोग श्रुति के करते हुए 'माया का बहुत्व' इस मुख्यार्थ को छोड़कर अमुख्य अर्थ का ग्रहण क्यों किया जाता है । ( अवान्तर विशेषों की अथवा गुणों के बहुत्व की कल्पना करके 'मायाभिः' इस बहुवचन की व्यवस्था क्यों लगाई जा रही है ) 'मायां तु०' आदि ग्रंथ से समाधान किया जाता है—

'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।' श्वे० ४।१०।
"अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजास्सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥' श्वे० ४।५।


१. अत्र 'तरत्यविद्या'मिति क्वचित् पाठः ।

मायाया एकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९१

"तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते । योगी मायामभेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः ॥ १ ॥' इत्यादिश्रुति-स्मृतिषु एकवचन-बलेन लाघवानुगृहीतेन मायाया एकत्वं निश्चीयते । ततश्च तदुपहितं चैतन्यम् ईश्वरसाक्षि । तच्चानादिः, तदुपाधेर्मायाया अनादित्वात् ॥

अर्थ—'तु' चिद्रूप महेश्वर से विलक्षण जड़भूत 'मायां' ईश्वर शक्ति (माया) 'प्रकृतिम्' प्रकृति है और 'तु' उस माया से विलक्षण (चिद्रूप) 'मायावी' माया शक्ति-मान् चिद्रूप आत्मा-महेश्वर है 'विद्यात्' समझना चाहिये । ( श्वे० उ० ४।१० ) ।

अजा—उत्पन्न न होनेवाली, एक, लोहित, शुक्ल, कृष्ण रूप (तेज, अप्, अन्नात्मक) 'सरूपाः बह्वीः प्रजाः सृजमानां' अपने आकार की विविध प्रजा को पैदा करनेवाली, अजा (अविद्यात्मक प्रकृति) का, 'एकः अजः हि जुषमाणः अनुशेते' एक, अज (अनादि), अविद्यात्मक वासनाओं से बद्ध हुआ जीवात्मा सेवन करता रहता है, और दूसरा अज (ईश्वर) भुक्त भोगा (जिसका भोग लिया गया है) प्रकृति को छोड़ता है । अविद्यावान् जीवात्मा की तरह विद्यावान् ईश्वर उसके तादात्म्य को प्राप्त नहीं होता । (श्वे. उ. ४।५) । 'यस्मिन् परात्मनि हृदि निवेशिते सति' जिस परमात्मा की हृदय में स्थिर स्थापना करने पर (वृत्त्यारूढ = वृत्तिविषय करने पर 'योगी विततां अविद्यां तरति' योगी कार्यरूप से विस्तार को प्राप्त हुई अविद्या (माया) को तर जाता है । 'तस्मै अमेयाय विद्यात्मने नमः' उस अप्रमेय (प्रमाणों के विषय न होने-वाले) विद्यात्मा को प्रणाम । इत्यादि श्रुति-स्मृतिगत लाघव से उपकृत हुए एकवचन के बल से माया के एकत्व का निश्चय किया जाता है । इस कारण मायोपहितचैतन्य 'ईश्वरसाक्षि' है और वह अनादि है । क्योंकि उसकी उपाधिरूप माया का अनादित्व है ।

**विवरण—**प्रथम श्रुतिवचन में 'मायां' ऐसा एकवचन जाति के अभिप्राय से है ऐसा कोई कदाचित् कह दे, इसलिये प्रत्यक्ष 'एकाम्' इस एकत्वबोधक शब्दावली की एक दूसरी 'अजामेकाम्' इत्यादि श्रुति का निर्देश किया है । इसके देखने से 'मायां' एक-वचन जाति के अभिप्राय से उपयुक्त किया है यह कहने का अवकाश नहीं मिलता । तथापि माया का एकत्व श्रुतितात्पर्य से सिद्ध है—आपने कैसे जाना ? क्योंकि श्रुति का तात्पर्य अमुक अर्थ में ही है—ऐसा निश्चय करना बहुत कठिन है । ऐसा कदाचित् कोई कह दे इसलिये स्मृतिकार के वचन का अनुसरण कर हम श्रुतितात्पर्य का निश्चय करते हैं । इस आशय से 'तरत्यविद्याम्' आदि पराशरस्मृति का उल्लेख किया है । 'योगी जिस परमात्मा को वृत्त्यारूढ करके (वृत्ति का विषय करके) अविद्याख्य माया का


१. अत्र 'अजामेका'मिति क्वचित् पाठः ।
२. 'तिष्वेकव०' इति पाठान्तरम् ।

९२वेदान्तपरिभाषा[ विषयप्रत्यक्षविचारः

उल्लंघन करता है उस ज्ञानस्वरूप अमेय (वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य का विषय न होनेवाले) परमात्मा को प्रणाम हो। उसी अविद्यामें 'वितताम्' (प्रपंच के आकार में परिणत होने से सर्वत्र व्याप्त हुई) विशेषण दिया है।

**शंका—**परमेश्वर की हृदय में स्थापना करने से अविद्या की निवृति होने पर भी अनर्थ की निवृत्ति नहीं होगी। क्योंकि सर्वानर्थभूत माया तो अवशिष्ट ही रहती है। अतः अविद्या की निवृत्ति से माया की निवृत्ति नहीं हो सकती।

**उत्तर—**परमेश्वर की शक्तिरूप माया और अविद्या एक ही है। इसी आशय से मूल में 'अविद्यां माया' कहा है। अविद्या अपने आश्रय (जीव) को मोहित करती है किन्तु माया अपने आश्रय (ईश्वर) को मोहित नहीं करती, इस प्रकार उनमें भेद होने पर भी वस्तुतः उसमें भेद नहीं है। अर्थात् अविद्या और माया पृथक् पदार्थ नहीं है।

**शंका—**स्मृति में भी जाति के अर्थ में एकवचन और 'अजामेकाम्' यहां 'एक' शब्द अमुख्य अर्थ में कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में श्रुतिस्मृति से एकत्व का निश्चय कैसे किया जा सकता है ?

**उत्तर—**श्रुतिस्मृति में एकवचन, लाघव से अनुगृहीत है। 'मयाभिः' इस बहुवचन से परमेश्वर की अनेक मायाओं की कल्पना करने की अपेक्षा एक ही माया-शक्ति की कल्पना करने में लाघव है, इस लाघव से अनुगृहीत श्रुतिस्मृति के एक वचन से माया का एकत्व निश्चित होता है। मूलस्थ 'इत्यादि, पदसे 'अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः' (का. १, २, ५) 'मम माया दुरत्यया' (गी. ७, १४) आदि श्रुति-स्मृति वचनों को समझना चाहिये। जैसे उपाधिभूत माया के एक होने से ईश्वरसाक्षिचैतन्य एक है, वैसे ही उसके अनादि होने से वह अनादि भी है। अब ईश्वरसाक्षिज्ञान को ईश्वर के स्वरूपज्ञान की अपेक्षा होने से उसका स्वरूप बताते हैं—

मायावच्छिन्नं चैतन्यं परमेश्वरः, मायाया विशेषणत्वे ईश्वरत्वम्, उपाधित्वे साक्षित्वमिति ईश्वरत्व-साक्षित्वयोर्भेदः, न तु धर्मिणोरीश्वर¹-तत्‌साक्षिणोः²।

स च परमेश्वर एकोपि ³स्वोपाधिभूत-माया-निष्ठ-सत्त्व-रजस्त


१. 'रसाक्षि०' इति पाठान्तरम् ।
२. गोर्भेदः-इति पाठान्तरम् ।
३. 'स्वोपाधिभूत-माया-निष्ठ-सत्त्वरजस्तमोगुणाभेदेन'—परमेश्वरचैतन्योपाधिभूता या माया, तद्घटका ये सत्त्वरजस्तमोगुणाः तेषां भेदेन। एवञ्च एकमेवेश्वरचैतन्यं यदा सत्त्वप्रधानमायावच्छिन्नं भवति, तदा विष्णुनाम्ना, यदा च रजः प्रधानमायावच्छिन्नं, तदा तदेव ब्रह्मनाम्ना, यदा च तमःप्रधानमायावच्छिन्नं, तदा तदेव महेश्वरनाम्ना

मायाविशिष्टस्य जगत्कर्तृत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९३

अर्थ—मायावच्छिन्न चैतन्य ही परमेश्वर है। माया जब चैतन्य में विशेषण हो तब उस चैतन्य में ईश्वरत्व होता है और माया जब उसमें उपाधि हो तब उस चैतन्य में साक्षित्व होता है। अर्थात् मायाविशिष्ट-चैतन्य को ईश्वरत्व और मायोपहित चैतन्य को ईश्वरसाक्षित्व, इस प्रकार ईश्वरत्व और ईश्वरसाक्षित्व में भेद है। परन्तु ईश्वर और उसके साक्षी इन धर्मियों में भेद नहीं। और उस ईश्वर के वस्तुतः एक होने पर भी उसकी उपाधिभूत माया में रहनेवाले सत्त्व, रज और तम इन गुणों के भेद से ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर आदि शब्दों की वाच्यता ( अर्थ ) को वह ( ईश्वर ) पाता है।

विवरण—अन्तःकरणविशिष्ट चैतन्य—जीव, और अन्तःकरणोपहित चैतन्य—जीवसाक्षी इस पूर्वोक्त भेद के समान ही यहाँ भी माया के विशेषणत्व और उपाधित्व के कारण ईश्वरत्व और ईश्वरसाक्षित्व का भेद है। जैसे जो पाचक ( स्वयं पाक करनेवाला ) हो, वही पाठक ( पाठ करनेवाला ) जब रहता है, तब पाचक व्यक्ति से पाठक व्यक्ति भिन्न नहीं होता, परन्तु उस व्यक्ति में रहनेवाले 'पाचकत्व और पाठकत्व' ( ये ) धर्म भिन्न होते हैं यह प्रसिद्ध ही है। उसी तरह ईश्वर और उसका साक्षी इन धर्मियों का भेद नहीं, अपितु ईश्वरसाक्षित्व इन धर्मों का भेद है।

शंका—माया के एकत्व के कारण ईश्वरसाक्षी में जैसे एकत्व है, उसी तरह मायावच्छिन्न ( मायाविशिष्ट ) चैतन्य ( ईश्वर ) में भी एकत्व अवश्य होना ही चाहिये। ऐसा होते हुए उसका ब्रह्मादि रूप से भेद कैसे स्वीकार किया गया है ? उसी तरह वह ब्रह्मादिभेद, विशेषण-भेद मूलक होने से और उस विशेषणभेद की उपाधि माया के होने से तदुपहित चैतन्य में भी एकत्व होना उचित है। ऐसी स्थिति में उसे अनेकत्व कैसे ? इस शंका का उत्तर 'स च' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है, जिसका तात्पर्य इस प्रकार है—जिस प्रकार 'माया' रूप उपाधि ( विशेषण ) के सत्त्वादि गुणों के अभिप्राय से अनेकत्व का व्यपदेश होता है, उसी तरह उसके गुणों के अवच्छेद से ईश्वर का भेद होता है, वास्तव में नहीं। ऐसा होने से मायावच्छिन्न ईश्वरचैतन्य ही उद्भूत सत्त्व-गुणवाली माया से अवच्छिन्न होने पर पालन करनेवाला नारायण, विष्णु


व्यवह्रियते। गुणत्रयकार्यविशेषनिबन्धनोऽयमीश्वरस्य रूपभेदः, न स्वरूपभेदनिबन्धनः। तथा च मैत्रेयोपनिषदि—"अथ यो ही खलु वाऽस्य राजसोंऽशोऽसौ स योऽयं ब्रह्मा। अथ यो ह खलु वाऽस्य तामसोंऽशो स योऽयं रुद्रः। अथ यो ह खलु वाऽस्य सात्विकोंऽशोऽसौ स योऽयं विष्णुरिति" तथा विष्णुपुराणेऽपि—"सर्गस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मिकाम्। स संज्ञा याति भगवानेक एव जनार्दनः॥" इति।

१. रादि-इति पाठान्तरम्।
२. भजते-इति पाठान्तरम्।

९४ | वेदान्तपरिभाषा | [ मायाविशिष्टस्य जगत्कर्तृत्वम्

इत्यादि शब्दों का वाच्य (अर्थ) होता है। वह ही मायाविशिष्ट चैतन्य, उद्भूत रजोगुणवाली माया से अवच्छिन्न होने पर स्रष्टा, ब्रह्मा, विधाता आदि शब्दों का वाच्य होता है। और वह ही ईश्वरचैतन्य उद्भूत-तमोगुणवाली माया से अवच्छिन्न होने पर संहर्ता, महेश्वर, रुद्र आदि संज्ञाओं को पाता है। मैत्रेयोपनिषद् में ऐसा वर्णन मिलता है—"अथ यो ह खलु वास्य राजसोंऽशः असौ स योऽयं ब्रह्मा, अथ यो ह खलु वास्य तामसोंऽशः असौ स योऽयं रुद्रः, अथ यो ह खलु वास्य सात्त्विकोंऽशः असौ स योऽयं विष्णु" ईश्वर के राजस अंश का नाम ब्रह्मा, तामस अंश का नाम रुद्र, और सात्त्विक अंश का नाम विष्णु है। त्रिगुणमायावच्छिन्न चैतन्य ही विष्णु, महेश, गणेश, दिनेश, दुर्गा रूपों से उपास्य होता है, क्योंकि उन उपास्यों का निरंकुश (निष्प्रतिबन्ध) ऐश्वर्य कहीं श्रुत नहीं।

ईश्वर के सादित्व में शंका—

नन्वीश्वर-साक्षिणोऽनादित्वे तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय, छा० ६।२।१ इत्यादिना सृष्टिपूर्वसमये परमेश्वरस्यागन्तुकमीक्षणमुच्यमानं कथमुपपद्यते ?

अर्थ— ईश्वरसाक्षिचैतन्य यदि अनादि होता तो उसने 'मैं बहुत होऊँ, प्रजा के रूप में उत्पन्न होऊँ' (छां. उ. ६, २, ३) आदि वाक्य से सृष्टि के पूर्व परमेश्वर का आगन्तुक ईक्षण बताया है, वह कैसे उपपन्न होगा ?

विवरण— ईश्वरसाक्षी-ईक्षण में सृष्टिपूर्वकालीनत्व है, ऐसा कहा हुआ होने से उसे (ईश्वरसाक्षीचैतन्य को) अनादि नहीं मान सकते। क्योंकि 'कालिक अवधि से रहित रहना' ही अनादित्व है। जिसमें काल की अवधि रहती है वह अनादि नहीं होता। ईक्षण में सृष्टि का पूर्वकाल रूप अवधि है। इसलिये उसमें अनादित्व नहीं है। किन्तु ईक्षण में सृष्टिपूर्वकालिकत्व होने से सादित्व है। यह सिद्ध होनेपर तद्विशिष्ट ईश्वर में भी सादित्व मानना पड़ता है ('तदैक्षत०' इत्यादि श्रुति, ईक्षण में सृष्टिपूर्वकालीनत्व का प्रतिपादन करती है) अतः ईश्वर साक्षी के ईक्षण में अनादित्व बाधित होता है, और उनके बाधित होनेपर तद्विशिष्ट ईश्वर में भी अनादित्व बाधित होता है।

इस शंका का समाधान 'उच्यते' इत्यादि ग्रन्थ से करते हैं—

उच्यते। यथा विषयेन्द्रिय-सन्निकर्षादि-¹कारणवशेन जीवो-


१. 'सन्निकर्षादि०' अत्रादिशब्देन व्याप्तिज्ञानादिपरिग्रहः । जीवोपाध्यन्तःकरणस्य जीवचैतन्ये विशेषणीभूतस्य अन्तःकरणस्य । अन्तःकरणस्य उपाधित्वदशायामन्तःकरणवृत्त्यभावः ।