वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८ वेदान्तपरिभाषा [ प्रत्यक्षविचारः
'ज्ञानम्' इतना ही लक्षण करें तो वह निर्विकल्पक ज्ञान में अतिव्याप्त होगा, इसलिये 'वैशिष्ट्यावगाहि' यह विशेषण भी आवश्यक है।
'मैं घट को जानता हूँ' यह सविकल्पक-ज्ञान का उदाहरण है। क्योंकि वह घटरूप-विशेषण से विशिष्ट घटज्ञान को विषय कर रहा है, अतः 'मैं घट को जानता हूँ' यह ज्ञान वैशिष्ट्यावगाहि है।
इस प्रकार सविकल्पक ज्ञान का निर्दोष लक्षण बताकर 'निर्विकल्पकं तु०' ग्रन्थ से दूसरे प्रकार के ज्ञान का लक्षण बताते हैं। जिससे विकल्प (वैशिष्ट्य) निवृत्त हुआ हो वह निर्विकल्पक ज्ञान है। यहाँ 'निर्विकल्पकम्' लक्ष्य है और 'संसर्गाविगाहि ज्ञानम्' लक्षण है। संसर्ग का अर्थ है—विशेषण-विशेष्य-सम्बन्ध, इसी को 'वैशिष्ट्य' कहते हैं। एवं च संसर्ग (वैशिष्ट्य) को विषय न करनेवाले ज्ञान को 'निर्विकल्पक ज्ञान' कहते हैं 'सोऽयं देवदत्तः', 'तत् त्वमसि' आदि वाक्यों से उत्पन्न हुआ ज्ञान, निर्विकल्पक ज्ञान का उदाहरण है। 'सोऽयं देवदत्तः' इस ऐक्य प्रत्यभिज्ञा से ही 'सोऽयं देवदत्तः' ऐसे वाक्य का प्रयोग होता है। इस कारण देश और काल से उपलक्षित देवदत्त रूप अभेद को विषय करनेवाला इन्द्रियजन्य ज्ञान भी निर्विकल्प प्रत्यक्ष है। तब इन्द्रियजन्य निर्विकल्पक प्रत्यक्ष को उदाहरण रूप से न बताकर शाब्दज्ञान को ही उदाहरणरूप से क्यों बताया गया है ?
उत्तर :—देश और काल से उपलक्षित (जो) देवदत्त (तद्) रूप अभेद को विषय करनेवाले (वह यह देवदत्त) इस इन्द्रियजन्यप्रत्यक्षज्ञान में सन्निकर्ष के बल से, 'उपलक्षक देश-काल' का भी भान होता है, परन्तु शाब्दज्ञान में नियम से 'तात्पर्य-विषय' का ही भान होता है। इसलिए शाब्दज्ञान को अभेदमात्र विषयत्व होने से यहाँ पर शाब्द उदाहरण ही दिया है। मूल में 'तत्त्वमसि' इत्यादि के शब्द से 'प्रकृष्ट प्रकाश-श्चन्द्रः।' 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' आदि अवान्तर वाक्यों को समझना चाहिए। इस पर वादी शंका करता है—
ननु शाब्दमिदं ज्ञानं न प्रत्यक्षमिन्द्रियाजन्यत्वात् ।
अर्थ—यह जो शाब्द (शब्दजन्य) ज्ञान है। प्रत्यक्ष नहीं है, क्योंकि वह इन्द्रिय से पैदा नहीं है।
विवरण—निर्विकल्पक ज्ञान के उदाहरण में 'वाक्यजन्य ज्ञान' बताया देखकर वादी कहता है कि यह (निर्विकल्पक प्रत्यक्ष का तो लक्षण और उसका लक्ष्य वाक्य-जन्य ज्ञान) कथन अत्यन्त असंगत है। 'वह यह देवदत्त' इस वाक्य से होनेवाला ज्ञान, शाब्दज्ञान है, प्रत्यक्षज्ञान नहीं है। कारण इन्द्रियजन्य ज्ञान को ही प्रत्यक्षज्ञान कहते हैं। तब वाक्यजन्य ज्ञान को निर्विकल्पक प्रत्यक्ष कैसे कह सकते हैं? 'इति चेत्' आदि ग्रन्थ से उपर्युक्त शंका का अनुवाद कर उसका निरसन करते हैं।