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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 482 में से

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पृष्ठ 137

प्रत्यक्षे इन्द्रियजन्यत्वस्याप्रयोजकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७१

इति चेत् । न । न हि इन्द्रियजन्यत्वं प्रत्यक्षत्वे तन्त्र, दूषितत्वात् । किन्तु योग्य-वर्तमान-विषयकत्वे सति प्रमाणचैतन्यस्य विषयचैतन्याभिन्नत्वमित्युक्तम् । तथा च सोऽयं देवदत्त इति वाक्यजन्य-ज्ञानस्य सन्निकृष्ट-विषयतया बहिर्निःसृतान्तःकरणवृत्त्यभ्युपगमेन ^१देवदत्तावच्छिन्न ^२वृत्त्यवच्छिन्नचैतनयोरभेदेन सोऽयं देवदत्त इति वाक्यजन्य-ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् । एवं तत्त्वमसि इत्यादिवाक्यजन्यज्ञानस्यापि । तत्र प्रमातुरेव^३ विषयतया तदुभयाभेदस्य^४ सत्त्वात् ।

अर्थ—'वाक्यजन्यज्ञान, इन्द्रियजन्य न होने से शाब्द है, प्रत्यक्ष नहीं है' ऐसा यदि कहें तो उचित नहीं। क्योंकि प्रत्यक्षत्व ( प्रत्यक्ष ) में 'इन्द्रियजन्यत्व' प्रयोजक नहीं है। हमने नैयायिकों के द्वारा स्वीकृत प्रयोजक को दूषित सिद्ध कर विषय में योग्यता तथा वर्तमानता ( विद्यमानता ) होते हुए प्रमाणचैतन्य का विषयचैतन्याभिन्नत्व होना प्रत्यक्ष में प्रयोजक है—ऊपर बताया है। 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय सन्निकृष्ट है, अतः हम ( वेदान्ती ) ने उस ज्ञान में बाहर निकली अन्तःकरण-वृत्ति को स्वीकार किया है। इस तरह इस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय समीप होने से सन्निकृष्ट विषय को उद्देश्य कर अन्तःकरण-वृत्ति बाहर निकलती है, हमारे इस सिद्धान्त के कारण देवदत्तावच्छिन्न चैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्य का अभेद होता है, ( विषयावच्छिन्न चैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य का अभेद होने से ) जिससे 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है। इसी न्याय से 'तत्त्वमसि' इस वाक्यजन्य ज्ञान का भी प्रत्यक्षत्व है। कारण उस ज्ञान में प्रमाता ही विषय होने से विषय-चैतन्य और वृत्तिचैतन्य का अभेद है।

विवरण—'वह यह देवदत्त' इत्यादि वाक्यजन्य-ज्ञान शब्दजन्य होने से (इन्द्रियजन्य-ज्ञान न होने से ) निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष ज्ञान का उदाहरण हो नहीं सकता, यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि शाब्दज्ञान को इन्द्रियजन्यत्व न होने पर भी उपर्युक्त प्रत्यक्षत्व-प्रयोजकत्व 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य ज्ञान में है। इस कारण यहाँ लक्षण और लक्ष्य की असंगति नहीं होती। नैयायिक 'इन्द्रियजन्य' ज्ञान को प्रत्यक्षज्ञान कहते हैं, परन्तु वह अतिव्याप्त होता है, क्योंकि इन्द्रियजन्यत्व को प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक मानने पर नैयायिकों


१. देवदत्तावच्छिन्नचैतन्यस्य वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्याभेदेन—इति पाठान्तरम् ।
२. तद्वृत्यवच्छिन्नचैतन्याभिन्नतया-इति पाठान्तरम् ।
३. प्रमातृत्वोपलक्षित-स्वरूपचैतन्यस्यैव ।
४. तदुभयाभेदस्य स्वरूपाकारवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्वरूपचैतन्ययोरभेदस्य ।