वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८० वेदान्तपरिभाषा [ प्रत्यक्षे इन्द्रियजन्यत्वस्याविचारः
के मत में 'मन भी इन्द्रिय होने से उससे होनेवाला अनुमितिज्ञान भी प्रत्यक्ष कहा जायगा', यह बताकर उसका निरसन भी कर दिया गया। इसलिए इन्द्रियजन्यत्व, प्रत्यक्ष में प्रयोजक हो नहीं सकता।
शंका—इससे पूर्व आपने 'प्रमाणचैतन्य का, योग्य वर्तमान-विषयावच्छिन्न चैतन्य से अभिन्नत्व' प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक बताया, और अब 'योग्य वर्तमान विषयकत्व होते हुए प्रमाणचैतन्य का विषय-चैतन्य से अभिन्नत्व, प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक बता रहे हैं। अतः दोनों की संगति कैसे हो ?
समाधान—दोनों लक्षणों का अर्थ एक ही है। 'वृत्तिरूप प्रमाण से अवच्छिन्न चतन्य' और योग्य, वर्तमान, अबाधित विषय से अवच्छिन्न चैतन्य दोनों का अभेद' यह अर्थ दोनों लक्षणों से समान ही निकलता है।
इस प्रकार प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक इन्द्रियजन्यत्व के न होने से, अर्थात् पूर्वोक्त उभय- विधचैतन्य का अभेद ही प्रत्यक्ष में प्रयोजक होने से 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्य से उत्पन्न ज्ञान 'प्रत्यक्ष' कहलाता है। क्योंकि उस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय (देवदत्त) समीप है। विषय के सन्निकृष्ट होने से अन्तःकरण की वृत्ति, इन्द्रिय के द्वारा बाहर निकलकर 'देव- दत्त' रूप विषय के आकार की बन जाती है—हमारा सिद्धान्त है। इसकारण 'देवदत्त' (रूप) विषय से अवच्छिन्न चैतन्य और विषयाकार वृत्ति से अवच्छिन्न चैतन्य, इन दानों का अभेद होकर 'सोऽयं देवदत्तः' इस वाक्यजन्य-ज्ञान को प्रत्यक्षत्व सिद्ध होता है।
शंका—वाक्यजन्य ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है—इस विषय में लौकिक उदाहरण के होने पर भी वैदिक उदाहरण का होना असम्भव प्रतीत होता है। कारण—'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' हे मैत्रेयि ! विज्ञाता को किस साधन से जानना चाहिए ? इत्यादि श्रुति से प्रमाता के विषयत्व का निराकरण किया गया है। इससे तत्पदार्थाभिन्न त्वंपदार्थ प्रमातृ- चैतन्य को विषयावच्छिन्न-चैतन्यत्व का अभाव होने से 'तत् त्वमसि' इस वाक्यजन्यज्ञान में पूर्वोक्त प्रयोजक का अभाव है।
समाधान—'तत्त्वमसि' वह सत् तू है—इस वैदिक वाक्यजन्य ज्ञान को भी प्रत्यक्षत्व है, क्योंकि उसमें पूर्वोक्त प्रत्यक्षत्व प्रयोजक है—यथा—'तत्त्वमसि' इस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय सन्निकृष्ट है। 'तत्' और 'त्वम्' पदों का लक्ष्य अर्थ 'चैतन्य', उस ज्ञान का विषय है। उस वाक्य से अन्तःकरण-वृत्ति पैदा होती है—यह हमारा सिद्धान्त है। इस कारण लक्ष्य-चैतन्य और वृत्यवच्छिन्न चैतन्य का अभेद होता है। इस अभेद के कारण ही 'तत्त्वमसि' इस वाक्यजन्य ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है। ('तत्वमसि' के सुनने पर सर्वज्ञत्व, किञ्चिज्ज्ञत्व—अकर्तृत्व, कर्तृत्व इत्यादि से विशिष्ट वस्तु का अभेद है—यह ज्ञान नहीं होता। किन्तु 'तत्' और त्वम्' इन दो पदों के लक्ष्य स्वरूप के ऐक्य का ज्ञान होता है। कारण यह है कि सर्वज्ञत्व—अकर्तृत्व आदि धर्मों से युक्त 'तत्पदार्थ' और किञ्चिज्ज्ञत्व- कर्तृत्व आदि धर्मों से युक्त 'त्वं पदार्थ' के ऐक्य का असम्भव है, क्योंकि विरुद्ध धर्म के