भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 482 में से

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वृत्तिव्याप्तेरावश्यकता ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८१

दो पदार्थों की एकता होना अशक्य है । परन्तु उस 'तत्' और 'त्वम्' पदों के लक्ष्य ( चैतन्य ) तो सन्निकृष्ट ही हैं । इसलिये 'तत्त्वमसि' वाक्य से उत्पन्न हुई अन्तःकरण-वृत्ति के स्वीकार करने में कोई बाधक नहीं है । इसी कारण लक्ष्यचैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य को एकदेशस्थित दो उपाधियों से अवच्छिन्नत्व है । इस प्रकार उन दो चैतन्यों का अभेद होने से 'तत्त्वमसि' इस वाक्यजन्य ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है । इस ज्ञान में प्रमाता ही विषय होने से ( उस वाक्यजन्य ज्ञान में प्रमातृ पद को—'तत्त्वं' पद से लक्ष्यभूत चैतन्य को—ही विषयत्व होने से ) विषय चैतन्य और वृत्ति चैतन्य का ऐक्य ( एकता ) हो पाता है ।

शंका—'तत्त्वम्' पद से लक्ष्यभूत ब्रह्म शास्त्रजन्यज्ञान का विषय है—यह कहने पर 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' आदि श्रुतियों की क्या गति है ?

समाधान—यह श्रुति विज्ञाता के 'फलव्याप्यत्व' का निराकरण करती है । वह उसके 'वृत्तिव्याप्यत्व' का निराकरण नहीं करती । पंचदशीकार कहते हैं—'फलव्याप्यत्वमेवास्य शास्त्रकृद्भिर्निवारितम् । ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता ॥'

इन्द्रियसन्निकर्ष के कारण अन्तःकरण की घटादिविषयाकार वृत्ति के उत्पन्न होने पर उसमें चैतन्य प्रतिबिम्बित होता है । उस 'चैतन्य' को 'फल' कहते हैं । चैतन्य-प्रतिबिम्ब से युक्त हुई वृत्ति, विषय को व्याप्त करती है । इस कारण उस वृत्ति के साथ फलरूप चैतन्य की व्याप्ति भी सिद्ध ही है । ऐसा होने से घटादि जड़ विषयों को फलव्याप्यत्व है । परन्तु वह फलव्याप्यत्व 'ब्रह्म' में नहीं बन पाता । कारण—ब्रह्म, साक्षात् चैतन्यात्मक है । इस कारण वृत्ति के साथ रहनेवाला चैतन्य भी चिद्रूप ब्रह्म में किसी प्रकार का अतिशय पैदा नहीं कर सकता । दूसरी बात यह भी है कि ब्रह्म में फलव्याप्ति के मानने पर वह ब्रह्म जड़ हो जायगा । कारण जड़ में ही फलव्याप्ति का सम्भव होता है और जड़ के साक्षात्कार के लिए उसकी आवश्यकता भी होती है इससे 'तत्त्वमसि' सुनने पर पैदा हुई वृत्ति के द्वारा ब्रह्म के व्याप्त होने में किसी प्रकार का दोष नहीं है । प्रत्युत, किसी पदार्थ के अज्ञान की निवृत्ति हुए बिना उसका भान (ज्ञान) नहीं होता और अज्ञान की निवृत्ति, अन्तःकरण की वृत्ति के द्वारा ही होती है । इसलिये ब्रह्मविषयक अज्ञान की निवृत्ति के लिए अन्तःकरण-वृत्ति को स्वीकार करना ही चाहिये, यह कारिका का आशय है ।

इस पर शंका—

ननु वाक्यजन्य-ज्ञानस्य पदार्थ-संसर्गावगाहितया कथं निर्विकल्पकत्वम् ?

अर्थ—वाक्यजन्यज्ञान को पदार्थसंसर्गविषयत्व होने से निर्विकल्पकत्व कैसे ?


१. 'सोऽयं देवदत्तः इत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानं संसर्गावगाहि वाक्यजन्यज्ञानत्वात्, गामा-नयेति-वाक्यजन्यज्ञानवत् ।'

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