वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८२ | वेदान्तपरिभाषा | [ वेदान्तानामखण्डार्थत्वम् |
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विवरण—( १ ) 'वह^१ यह देवदत्त' आदि वाक्यजन्यज्ञान संसर्गावगाहि है—( संसर्ग को विषय करनेवाला है ), ( २ ) क्योंकि उसमें वाक्यजन्यज्ञानत्व है, ( ३ ) 'गो को लाओ' इत्यादि वाक्यजन्य ज्ञान की तरह । अथवा^१—( १ ) 'वह यह देवदत्त' वाक्य से पैदा हुआ ज्ञान निर्विकल्पक नहीं है, ( २ ) क्योंकि उसमें संसर्गावगाहित्व है, ( ३ ) 'गो को लाओ' आदि वाक्यजन्य ज्ञान की तरह । इस आशय से यहाँ पर यह शङ्का की गई है । वाक्य से होने वाला ज्ञान उस वाक्यगत प्रत्येक पद के अर्थ के परस्पर सम्बन्ध को विषय करता है । जैसे—'गो को लाओ' इस वाक्य में 'तू' पद 'लाओ' क्रिया के साथ 'कर्तृत्व' रूप से सम्बन्धित होता है । और 'गो' पद, उस क्रिया के साथ 'कर्मत्व' रूप से सम्बन्धित होता है । और 'त्वत्कर्तृक-गोकर्मक-आनयन' इत्याकारक शाब्द बोध होता है । इसलिये यह संसृष्ट वाक्यार्थ है ।
वाक्यजन्य सभी ज्ञान, प्रत्येक पद के अर्थ में स्थित परस्पर कर्तृत्वादि संसर्ग को विषय करते हैं । ऐसी स्थिति में उसे निर्विकल्पकज्ञान कैसे कहा जा सकता है ? जो ज्ञान, विशिष्ट का ग्रहण करे वह 'सविकल्पक' होता है, जैसे—यह डित्थ है, यह ब्राह्मण है, यह श्याम है, यह पाचक है आदि ज्ञान । इस आकार का जो नहीं हो वह 'निर्विकल्पक' ज्ञान कहा जाता है । वाक्यजन्यज्ञान को संसर्गावगाहि होने से उसमें निर्विकल्पकत्व कैसे ?
उच्यते। वाक्यजन्य-ज्ञानविषयत्वे हि न पदार्थसंसर्गत्वं तन्त्रम्, अनभिमतसंसर्गस्यापि वाक्यजन्य ज्ञानविषयत्वापत्तेः, किन्तु तात्पर्यविषयत्वम् ॥
अर्थ—उपर्युक्त शङ्का का समाधान बताया जाता है—वाक्यजन्यज्ञान के विषयत्व में पदार्थों का संसर्गत्व, तन्त्र ( प्रयोजक-निमित्त ) नहीं है । कारण यह है कि वाक्यजन्य-ज्ञानविषयत्व में पदार्थसंसर्गत्व को ही प्रयोजक मानने से वक्ता के द्वारा अनभिप्सित संसर्ग को भी वाक्यजन्यज्ञानविषयत्व होने का प्रसंग आवेगा । अतः वक्ता के तात्पर्य का जो विषय हो वही वाक्यजन्यज्ञान का विषय है, अर्थात् तात्पर्यविषयत्व को वाक्यजन्यज्ञानविषय में प्रयोजकता है ।
विवरण—वाक्यजन्यज्ञान के विषय-निर्धारण में पदार्थसंसर्ग यदि निमित्त रहता तो वाक्यजन्यज्ञान को निर्विकल्पक नहीं कहा जाता । वस्तुतः पदार्थसंसर्ग में वाक्यजन्यज्ञान की विषयता है ही नहीं ( पदार्थसंसर्गविषयत्व, वाक्यजन्यज्ञान में प्रयोजक नहीं है ) क्योंकि पदार्थसंसर्ग को ही यदि वाक्यजन्यज्ञान में प्रयोजक मानें तो वक्ता को अनभिमत ऐसे अश्वादिसंसर्ग को भी वाक्यजन्यज्ञानविषयत्व प्राप्त होगा । भोजन
१. 'सोऽयं देवदत्तः इत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानं, निर्विकल्पकं नास्ति, संसर्गावगाहित्वात्. गामानयेतिवाक्यजन्यज्ञानवत् ।'