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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 482 में से

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वेदान्तानामखण्डार्थत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८३

के समय 'सैन्धवमानय' वाक्य में वक्ता को असंमत अश्वादि-पदार्थसंसर्ग भी वाक्यज्ञान का विषय है, मानना पड़ेगा। 'सैन्धव' का अर्थ है सेंधा नमक और सिंधु देश का 'घोड़ा। भोजन करते समय 'सैन्धव लाओ' कहने वाले वक्ता का तात्पर्य 'सेंधा नमक' रूप अर्थ में होता है, इसलिये उसके वाक्य का तात्पर्यविषय 'सेंधा नमक' है। उस समय 'सैन्धव ( अश्व ) लाओ' इस वाक्य में 'अश्वकर्मक आनयन क्रिया' रूप संसर्ग, वक्ता को अभिमत नहीं रहता। इस कारण वह संसर्ग वाक्यज्ञान के विषय-निर्धारण में प्रयोजक नहीं बन सकता। इसलिये केवल पदार्थसंसर्ग को वाक्यज्ञान का विषय नहीं माना जा सकता। तो फिर वाक्यजन्यज्ञान-विषयत्व में क्या निमित्त है ? उत्तर—वक्ता के तात्पर्य का जो विषय हो वही वाक्यजन्यज्ञान का विषय होता है। फिर वह तात्पर्य-विषय पदार्थों का संसर्ग हो या न हो, यह विचार आवश्यक नहीं है। अब प्रकृत के 'सोऽयं देवदत्तः' लौकिक वाक्य में वक्ता का तात्पर्य देवदत्त के देह में ( उसका देह, इस अर्थ में ) होने से तात्पर्य का विषय न बने हुए पदार्थसंसर्ग की वाक्यजन्यज्ञान-विषय में प्रयोजकता नहीं होती।

इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' वैदिक महावाक्य का तात्पर्य, अद्वितीय विशुद्ध ब्रह्म में है। यह निश्चय 'उपक्रमोपसंहारादि' तात्पर्य-लिंगों से होता है। इसलिए तात्पर्य-विषय न हुआ वाक्यगत पदार्थों का संसर्ग, तात्पर्य का अविषय है। क्योंकि ऐसे वाक्यों में पदार्थों का असंसर्ग ही तात्पर्य का विषय है, इस आशय से ग्रन्थकार कहते हैं—

प्रकृते च 'सदेव सौम्येदमग्र आसीत्' छां०-६-२-१ इत्युपक्रम्य 'तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' छां० ६-८-७ इत्युपसंहारेण विशुद्धे ब्रह्मणि वेदान्तानां तात्पर्यमवसितमिति कथं ¹तात्पर्याविषय संसर्गमवबोधयेत् ।

अर्थ— प्रकृत 'तत्त्वमसि' उदाहरण में "हे सौम्य प्रियदर्शन पुत्र ! यह जगत् उत्पत्ति से पूर्व 'सत्' ही था"। यह उपक्रम ( प्रारम्भ ) कर "वह सत् ही सत्य है, वह आत्मा है, और वह सत् ही तू है" ऐसा उपसंहार किया होने से विशुद्ध ब्रह्म में वेदान्त का तात्पर्य निश्चित हुआ है। ऐसी स्थिति में यह वाक्य, तात्पर्य का विषय न बने हुए पदार्थसंसर्ग को कैसे बतावेगा ?

विवरण— 'पहले यह सब सत् ही था' इस उपक्रम और 'वह सत्य है, वही आत्मा है, वह तू है' इस उपसंहार से 'तत्त्वमसि' वाक्य का तात्पर्य अद्वितीय विशुद्ध ब्रह्म में है—निश्चय होता है। इसके वाक्यगत-पदार्थों के 'संसर्ग' में तात्पर्यविषयता न 'असंसर्ग' में ही तात्पर्य-विषयत्व है। इसलिये 'सोऽयं देवदत्तः', 'तत्त्वमसि' ऐसे वाक्यों के तात्पर्य का विषय न होने वाले संसर्गविषयत्व का बाध होता है।


१. तात्पर्याविषयसंसर्गं० —इति पाठान्तरम् ।