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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 482 में से

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पृष्ठ 142
८४वेदान्तपरिभाषा[ वेदान्तानामखण्डार्थत्वम्

शंका—तत्त्वमस्यादि वाक्यों के प्रसिद्ध अखण्डार्थत्व का त्यागकर उनमें (वाक्यों में) संसर्ग के विषय न होने वाले ज्ञान का विषयत्व किस तरह माना जा सकता है ? संसर्ग का विषय न होने वाले ज्ञान का जनकत्व उन वाक्यों में है—यह कुछ नवीन सा लग रहा है।

'इदमेव तत्त्वम²स्यादि वाक्यानामखण्डार्थत्वम्, यत् संसर्गानवगाहियथार्थज्ञानजनकत्वमिति ॥ तदुक्तम्
संसर्गासङ्गि सम्यग् धी हेतुता या गिरामियम् ।
उक्ताऽखण्डार्थता यद्वा तत्प्रातिपदिकार्थता ॥ १ ॥
प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्वं ³वाऽखण्डार्थत्वमिति चतुर्थपादार्थः ॥

अर्थ—संसर्ग का विषय न होने वाले यथार्थ ज्ञान का जनकत्व (उत्पादकत्व) ही तत्त्वमस्यादि वाक्य का अखण्डार्थत्व है। इस विषय में चित्सुखाचार्य ने इस प्रकार कहा है 'गिराम्' तत्त्वमस्यादि वाक्यों को संसर्ग का विषय न होने वाले सम्यग्ज्ञान का हेतुत्व (उन वाक्यों से तादृश यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होना) ही उन वाक्यों का अखण्डार्थत्व है। अथवा उन वाक्यों का प्रातिपदिकार्थत्व है। परन्तु इस दूसरे 'प्रातिपदिकार्थत्व' लक्षण पर अतिव्याप्ति न हो इसलिए 'प्रातिपदिकार्थत्व' में 'मात्र' पद का निवेश करना चाहिए। अर्थात् 'प्रातिपदिकार्थत्व' से तात्पर्य 'प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्व' है, यही अखण्डार्थत्व है। यह उपर्युक्त कारिका के चौथे पाद का अर्थ है।

विवरण—मूल में 'इदमेव' के 'एव'कार का अर्थ 'अपि' समझना चाहिए। अर्थात् 'यही' अर्थ न कर 'यह भी' अर्थ करना चाहिये। क्योंकि 'यही' अर्थ करने पर दूसरे लक्षण का असंभव होगा। परन्तु चित्सुखाचार्य की कारिका के '(यद्वा) तत्प्रातिपदिकार्थता' इस चौथे पाद में अखण्डार्थत्व का दूसरा लक्षण बताया है, इसलिये तीन पादों के द्वारा कहे गये प्रथम लक्षण से द्वितीय लक्षण का समुच्चय करने के लिये 'इदमेव' के स्थान में 'इदमपि' समझना चाहिये। अब 'संसर्ग का विषय न होने वाले यथार्थ ज्ञान का जनकत्व' रूप लक्षण नवीन न होकर प्राचीन ही है, यह प्रदर्शित करने के लिये उसमें चित्सुखाचार्य की सम्मति दिखाते हैं। तत्त्वमस्यादि वाक्यों का जो संसर्गासंगि-सम्यग्ज्ञानहेतुत्व है वही उनका अखण्डार्थत्व है। महावाक्यों का सम्यग्ज्ञान


१. ननु तत्त्वमस्यादिवाक्यानां प्रसिद्धमखण्डार्थत्वं विहाय कथं संसर्गानवगाहिज्ञानजनकत्वमपूर्वमुक्तमित्याशङ्क्याह—'इदमेवेति' । एवकारः अप्यर्थे, तेन च प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्वमखण्डार्थत्वमित्यस्य समुच्चयः ।
२. तत्त्वमसीत्यादिवाक्य०—इति पाठान्तरम् ।
३. त्वमखण्डार्थत्वम्—इति पाठान्तरम् ।