वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यक्षद्वैविध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८५
में निमित्त-कारण होना ही उनका अखण्डार्थत्व है। परन्तु वह सम्यग्ज्ञान संसर्ग से सम्बन्ध रखनेवाला नहीं होना चाहिए। अर्थात् 'गाय को लाओ' आदि वाक्य, जैसे संसर्ग को अपना विषय बनाकर वाक्यार्थज्ञान में कारण होता है। वैसे 'तत्त्वमसि' वाक्य 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थों के संसर्ग को अपना विषय बनाकर संसर्गसम्बन्धी सम्यक् ज्ञान ( वाक्यार्थज्ञान ) में कारण नहीं होता। अपितु संसर्ग से सम्बद्ध न होने वाले सम्यग्ज्ञान में कारण होता है। वाक्य का संसर्गासंसिगसम्यग्ज्ञान में कारण होना ही उसका अखण्डार्थत्व है। यह अखण्डार्थत्व का एक लक्षण हुआ। उसी का 'यद्वा तत्प्रातिपदिकार्थता' दूसरा लक्षण है। 'सोऽयं देवदत्तः', 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों की प्रातिपतिकार्थता ही अखण्डार्थत्व है। मूल में 'प्रातिपदिकार्थता' इतना ही लक्षण है। परन्तु वह लक्षण संसर्ग-परक वाक्यों में अतिव्याप्त होता है, कारण संसर्गपरक वाक्य में भी प्रातिपदिकार्थ का प्रतिपादकत्व रहता है, संसर्गपरक वाक्यगत पद भी प्रातिपदिकार्थ का प्रतिपादन करते ही हैं। इसलिए उसमें 'मात्र' पद का निवेश करना चाहिए जिससे ऐसे वाक्यों का 'प्रातिपदिकार्थमात्रपरत्व' ही अखण्डार्थत्व है। इस लक्षण से उपर्युक्त अतिव्याप्ति का भी निवारण होगा।
क्योंकि संसर्ग-परक वाक्य, प्रातिपदिकार्थ का प्रतिपादन भले ही करते हों तथापि प्रातिपदिकार्थ मात्र का प्रतिपादन नहीं करते। इसलिए उनमें इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती।
अब साक्षिचैतन्य की द्विविधता से पूर्वोक्त प्रत्यक्ष के द्विविधत्व को बताते हैं—
तच्च प्रत्यक्षं पुनर्द्विविधं—जीवसाक्षि ईश्वरसाक्षि चेति। तत्र जीवो नामान्तःकरणावच्छिन्नं¹ चैतन्यम्। तत्साक्षि तु अन्तःकरणोपहितं चैतन्यम्। अन्तःकरणस्य विशेषणत्वोपाधित्वाभ्यामनयोर्भेदः। विशेषणं च कार्यान्वयि व्यावर्तकम्²। उपाधिश्च कार्यानन्वयी व्यावर्तको वर्तमानश्च। ³रूपविशिष्टो घटोऽनित्य इत्यत्र रूपं विशेषणम्। कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नभः श्रोत्रमित्यत्र कर्णशष्कुल्युपाधिः। अयमेवोपाधिर्नैयायिकैः परिचायक इत्युच्यते ॥
अर्थ—और वह सविकल्पक-निर्विकल्पक रूप प्रत्यक्ष पुनश्च दो प्रकार का है। एक जीवसाक्षि-प्रत्यक्ष और दूसरा ईश्वरसाक्षि-प्रत्यक्ष। इनमें अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य
१. च्छिन्नं चैत०—इति पाठान्तरम्।
२. व्यावर्तकं वर्तमानम्—इति पाठान्तरम्।
३. यथारूप०—इति पाठान्तरम्।