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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 482 में से

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८६ वेदान्तपरिभाषा [प्रत्यक्षद्वैविध्यम्

'जीव' है। और अन्तःकरणोपहित चैतन्य 'जीवसाक्षि' है। अन्तःकरण के विशेषणत्व और उपाधित्व के कारण जीव और जीवसाक्षी का भेद है, अर्थात् अन्तःकरण-विशिष्ट-चैतन्य-जीव है, और अन्तःकरणोपहित-चैतन्य-जीवसाक्षि है। विशेषण उसे कहते हैं—जो कार्यान्वयि तथा व्यावर्तक और वर्तमान हो। और उपाधि उसे कहते हैं जो कार्य से अन्वय (सम्बन्ध) न रखते हुए व्यावर्तक और वर्तमान हो। 'रूप (इस) विशेषण से विशिष्ट हुआ घट अनित्य है' इस उदाहरण में 'रूप' यह विशेषण है। 'कर्ण-शष्कुलि से अवच्छिन्न (पृथक्) हुआ आकाश-श्रोत्र है।' इस उदाहरण में 'कर्ण-शष्कुलि' (यह) उपाधि है। नैयायिक इस उपाधि को ही 'परिचायक' कहते हैं।

**विवरण—**पहले सविकल्पक और निर्विकल्पक भेद से प्रत्यक्षज्ञान दो प्रकार का होता है, यह बताया। परन्तु संसर्ग का विषयत्व और अविषयत्व रूप दो निमित्तों से उसकी द्विविधता का सम्भव होने पर भी वह दोनों प्रकार का ज्ञान, चैतन्य रूप होने से एक ही है। चैतन्य रूप से उस एक ही ज्ञान के पुनः जीव-साक्षि-चैतन्य और ईश्वर-साक्षि-चैतन्य, अर्थात् 'शिखामणि' टीकाकार के कथनानुसार जीवसाक्षि-जन्य चैतन्य और ईश्वरसाक्षि-जन्य चैतन्य (ये) दो प्रकार हैं।

इस पर 'अर्थदीपिकाकार ने यह आक्षेप किया है कि शिखामणिकार ने जो 'साक्षि-जन्य' कहा है वह हमें मान्य नहीं है क्योंकि ज्ञान के चैतन्य रूप होने से उसमें (चैतन्य में) जन्यत्व का सम्भव नहीं।

परन्तु चैतन्य रूप ज्ञान, स्वरूपतः अजन्य (उत्पन्न न होनेवाला) होने पर भी वृत्तिरूपज्ञान अथवा वृत्तिविशिष्ट ज्ञान तो जन्य है ही, यह वेदान्त-सिद्धान्त है। इसलिए केवल जीवसाक्षि और ईश्वरसाक्षि चैतन्य का भेद मानने की अपेक्षा, जीवसाक्षिजन्य और ईश्वरसाक्षिजन्य चैतन्य का भेद मानना अधिक उचित प्रतीत होता है। अतः जीव का (जो) साक्षी, उससे उत्पन्न होनेवाला और ईश्वर का (जो) साक्षी, उससे उत्पन्न होनेवाला चैतन्य—ऐसा शिखामणिकार की व्याख्यानुसार ही व्याख्यान करना उचित है। इस प्रकार व्याख्यान करने से ही 'एवं साक्षिद्वैविध्येन प्रत्यक्षज्ञानद्वैविध्यम्' इस तरह साक्षिद्वैविध्य से प्रत्यक्षज्ञान का द्विविधत्व है—इस उत्तर ग्रन्थ की सङ्गति लगती है। सिवाय 'साक्षि' शब्द का 'साक्षिजन्य' व्याख्यान न कर 'जीवसाक्षि ईश्वरसाक्षि च' वाक्य से केवल साक्षी के द्विविधत्व को यदि बताया जाय तो 'प्रत्यक्षज्ञानद्वैविध्यं निरूपितम्' इस अग्रिम ग्रन्थ की असंगति स्पष्ट ही है। क्योंकि "वह प्रत्यक्ष पुनः दो प्रकार का है", ऐसा उपक्रम कर बीच में ही जीवेश्वर-साक्षी का निरूपण करना सर्वथा अयुक्त है। इस प्रकार साम्प्रदायिक विद्वान् कहते हैं।

इस (जीवसाक्षिजन्य प्रत्यक्ष और ईश्वरसाक्षिजन्य प्रत्यक्ष) प्रत्यक्ष चैतन्य के द्विविधत्व को दूसरे प्रकार से बताकर जीव का निरूपण किये बिना जीवसाक्षिजन्य