वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमायाया एकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८७
प्रत्यक्ष का निरूपण करना आवश्यक जानकर ग्रन्थकार प्रथमतः जीव के स्वरूप का निरूपण करके जीव-साक्षी के स्वरूप-लक्षण को कहते हैं।
'तत्र ०' ईश्वर और जीव में से जीव किसे कहते हैं—अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्य—जीव है। और अन्तःकरणोपहित चैतन्य—उसका ( जीव का ) साक्षी है। अन्तःकरण जब चैतन्य का विशेषण रहता है तब ( चैतन्य ) 'जीव' कहलाता है और अन्तःकरण जब उसकी ( चैतन्य की ) उपाधि रहता है तब उसे जीव का साक्षित्व प्राप्त होता है। अर्थात् अन्तःकरण के विशेषणत्व और उपाधित्व के कारण 'जीव' और 'जीवसाक्षी' ऐसा भेद होता है।
विशेषण और उपाधि में क्या अन्तर है?—विशेषण और उपाधि दोनों व्यावर्तक और वर्तमान होते हैं, अर्थात् वर्तमानत्व और व्यावर्तकत्व ( ये ) दोनों धर्म, विशेषण, और उपाधि में समानतया रहते हैं, परन्तु विशेषण कार्यान्वयी होता है और उपाधि, कार्यान्वयी नहीं होता । जैसे—'रूपविशिष्ट ( रूप विशेषण से युक्त ) घट अनित्य है' इसमें रूप विशेषण है क्योंकि 'घट' उससे युक्त है । परन्तु 'कर्णशष्कुलि से अवच्छिन्न ( महाकाश से पृथक् हुआ ) आकाश—श्रोत्र है यहाँ 'कर्णशष्कुलि' उपाधि है। 'रूप' घट से सम्बन्ध रहने के कारण विशेषण है, परन्तु आकाश कर्णशष्कुलि से सम्बद्ध नहीं है, क्योंकि निरवयव आकाश और सावयव कर्णशष्कुलि दोनों के सम्बन्ध का सम्भव नहीं है। इसलिए 'कर्णशष्कुलि' उपाधि है, विशेषण नहीं। घट जैसा रूप से विशिष्ट रहता है वैसे कर्णछिद्र कान से विशिष्ट नहीं है। मूल में 'कार्यान्वयी' और 'कार्यानन्वयी' शब्द हैं। इसमें से 'कार्य' पद का अर्थ अवच्छेद्य ( अन्वय योग्य ) है। अवच्छेद्य से सम्बन्ध होने योग्य-घटादि पदार्थ । 'रूपविशिष्ट घट' यहाँ 'रूप' को 'घट' पदार्थ से अन्वयित्व, व्यावर्तकत्व और वर्तमानत्व होने से विशेषणत्व है। और 'कर्णशष्कुल्यवच्छिन्न आकाश' यहाँ कर्णशष्कुलि पद को कार्य से अनन्वयित्व, व्यावर्तकत्व और वर्तमानत्व होने से उपाधित्व है। वेदान्ती के इस उपाधि को ही नैयायिक परिचायक कहते हैं। यह कह कर उपाधि पदार्थ, अन्यान्य शास्त्रों में भी प्रसिद्ध है यह सूचित किया है। अब जीव-साक्षी के प्रसंग में अन्तःकरण में उपाधित्व कैसे बनता है, उसे कहते हैं—
प्रकृते¹ चान्तःकरणस्य जडतया विषयभासकत्वायोगेन विषय-
१. जीवपक्षे अन्तःकरणं विशेषणम्, साक्षिपक्षे तु उपाधिः, अत्र किं कारणम् ? शुद्धचैतन्यं निर्विकारं भवति, चेतनानधिष्ठितं केवलमन्तःकरणं जडं भवति, तस्मात् कर्तृत्वलक्षणजीवत्वान्वयासम्भवेऽपि अन्योन्य-तादात्म्यापन्नयोस्तयोः जीवत्वान्वये बाधकाभावात् अन्तःकरणस्य स्वान्वितचैतन्यांशे विधेयेन जीवत्वेन अन्वयाद् वर्तमानत्वाद् व्यावर्तकत्वाच्च विशेषणत्वं युक्तम् । किन्तु साक्षिपक्षे अन्तःकरणस्य विशेषणत्वं नैव युक्तम् । विषयभा-