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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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८८ | वेदान्तपरिभाषा | [ मायाया एकत्वम्

भासक-चैतन्योपाधित्वम् । अयं च जीवसाक्षी प्रत्यात्मं नाना । एकत्वे मैत्रावगते चैत्रस्याप्यनुसन्धानप्रसंगः ।

**अर्थ—**प्रकृत प्रसंग में अन्तःकरण के जड़ होने से उसमें विषयावभासकत्व नहीं बन पाता, इसलिए उसे ( अन्तःकरण में ) विषयावभासक-चैतन्य का उपाधित्व है । यह जीवसाक्षिचैतन्य, प्रत्येक आत्मा में भिन्न-भिन्न है । प्रत्येक प्रमाता का साक्षि-चैतन्य यदि भिन्न-भिन्न न माना जाय ( समस्त जीवों में साक्षिचैतन्य एक ही है ) तो मैत्र को अवगत हुए अर्थ का चैत्र को भी अनुसन्धान होने लगेगा ।

**विवरण—शंका—**कर्णशष्कुली को उपाधि कहना तो उचित है परन्तु अन्तःकरण को जीवसाक्षिचैतन्योपाधित्व कहना प्रयोजनशून्य ( व्यर्थ ) है । कारण यह है कि प्रमाता ने ( अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्य = जीव ने ) विषय प्रकाशनार्थ अपने साक्षी की यदि अपेक्षा की होती तो उसे साक्षिचैतन्य का उपाधि मानना योग्य हुआ होता । परन्तु प्रमाता विषय-प्रकाशनार्थ स्वसाक्षी की अपेक्षा ही नहीं रखता । वह साक्षी की सहायता के बिना चक्षुरादि इन्द्रियजन्य-वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य से ही विषय को प्रकाशित कर लेगा ।

**समाधान—**ऐसी शंका करना उचित नहीं । क्योंकि 'अन्तःकरण' अविद्या का कार्य होने से जड़ है । इसलिए वह विषय को प्रकाशित करने में असमर्थ है । क्षण-प्रतिक्षण उत्पन्न होनेवाली वृत्तियों के अनेक होने के कारण, उन वृत्तियों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य भी अनेक हैं । उस कारण अनेकसंख्यक हुई वृत्तियों को समस्त विषयों का अनुसन्धातृत्व सम्भव नहीं । ( क्षण-प्रतिक्षण उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाली वृत्तियाँ सम्पूर्ण विषयों का अनुसंधान करने में समर्थ नहीं हैं ।) प्रमाता, अन्तःकरण से अवच्छिन्न हुआ होने से उसे भूत, भविष्यत्, वर्तमान विषयों का अनुसंधान करने के लिये दूसरे के साहाय्य की अपेक्षा है । बिना सहायता लिए उसे त्रैकालिक विषयों का अनुसंधान करना शक्य नहीं है । इसलिए प्रमाता से सम्बद्ध और ब्रह्माभिन्न ऐसे साक्षी की अत्यन्त आवश्यकता है । इसलिये अन्तःकरण में साक्षी का उपाधित्व अवश्य स्वीकार करना चाहिये ।

**शंका—**जीवसाक्षी का ब्रह्म के साथ अभेद होने से उसमें स्वयं प्रकाशत्व है । इसलिए साक्षी में सर्वविषयानुसंधातृत्व है यह मानने पर उसमें एकत्व प्राप्त होता है । क्योंकि ब्रह्म एक है इसलिये ब्रह्माभिन्न साक्षी में भी एकत्व ही है और सब जीवों का


भासकत्वं हि साक्षित्वम् । न चान्तःकरणस्य तद्युज्यते, जडत्वाद् विकारित्वाच्च तस्य । तथा च विवरणकाराः—"सर्वं वस्तु ज्ञाततया अज्ञाततया वा साक्षिचैतन्यस्य विषय एव । तस्मात् स्वान्वित-चैतन्यांशे विधेयेन साक्षित्वेन अन्तःकरणस्य अन्वयाभावात् तस्योपाधित्वं युक्तम् ।