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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 482 में से

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पृष्ठ 147

मायाया एकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ८९

साक्षी एक है ऐसा मानने पर एक जीव से अनुभूयमान विषय का अनुसंधान दूसरे को भी होने लगेगा। इस शंका का निरसन करने के लिये ग्रंथकार कहते हैं—प्रत्येक जीवात्मा का यह साक्षिचैतन्य भिन्न-भिन्न है, क्योंकि उसे एक मानने पर, मैत्र को ज्ञात हुए विषय का अनुसंधान (स्मरण) चैत्रादि अन्य व्यक्तियों को भी होने लगेगा। परन्तु ऐसी अनवस्था न हो इसलिये हमने अन्तःकरण रूप उपाधि के भेद के कारण जीवसाक्षी में नानात्व स्वीकार किया है। अतः उपर्युक्त दोष नहीं आता। इस तरह जीवसाक्षी का निरूपण कर अब ईश्वरसाक्षी का निरूपण करते हैं—

ईश्वरसाक्षी तु ¹मायोपहितं चैतन्यम्। तच्चैकम्। तदुपाधिभूत ²मायाया एकत्वात्। 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' इत्यादिश्रुतौ मायाभिरिति बहुवचनस्य मायागत-शक्तिविशेषाभिप्राय³तया मायागतसत्त्वरजस्तमो⁴रूपगुणाभिप्राय⁵तया वोप⁶पत्तेः॥

**अर्थ—**परन्तु इसके विपरीत मायोपहितचैतन्य ही ईश्वरसाक्षिचैतन्य है। और वह एक है। क्योंकि उस चैतन्य की उपाधिभूत माया एक है। 'इन्द्र (परमेश्वर) माया के कारण बहुरूपत्व को प्राप्त होता है।' आदि श्रुति में 'मायाभिः' इस बहुवचन का आशय 'माया के शक्ति-विशेष से' है। अर्थात् 'मायाभिः'—मायाओं से—इस प्रयुक्त बहुवचन का अभिप्राय एक महामाया की असंख्य विचित्र अवान्तरण शक्तियाँ—होने से मुख्य माया के एकत्व के साथ विरोध नहीं है। अथवा मायागत सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणों के अभिप्राय से वह बहुवचन है—इस प्रकार उस बहुवचन की उपपत्ति लगानी चाहिये।

**विवरण—**पहले जीवसाक्षी का निरूपण करते समय अन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्य 'जीव' और अन्तःकरणोपहित-चैतन्य 'जीवसाक्षी' बताया गया है। अब ईश्वर और ईश्वरसाक्षिचैतन्य को बताने के लिए 'मायोपहित-चैतन्य' ही ईश्वरसाक्षिचैतन्य है (माया-


१. मायोपहितमविद्योपहितम्। मायाऽविद्ययोरभेद इति विवरणसिद्धान्तः। माया-विद्ययोर्भेदपक्षे तु मायोपहितमिति विशुद्धसत्त्वप्रधानोपहितमित्यर्थः। विशुद्धसत्त्वप्रधाना माया, मलिनसत्त्वप्रधानात्वविद्येति तयोर्भेदः। तथा च पञ्चदशीकाराः—"तमोरजः-सत्त्वगुणा प्रकृतिर्द्विविधा च सा। सत्त्वशुद्धयविशुद्धिभ्यां मायाऽविद्ये च ते मते।"
२. ताया-इति पाठान्तरम्।
३. यक-इति पाठान्तरम्।
४. मोगुणा-इति पाठान्तरम्।
५. यक-इति पाठान्तरम्।
६. चोप-इति पाठान्तरम्।