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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 482 में से

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पृष्ठ 148
९०वेदान्तपरिभाषा[ मायाया एकत्वम्

वच्छिन्न चैतन्य ही ईश्वरचैतन्य है ) यहाँ बताया है । इस बात को स्वयं ग्रंथकार आगे कहेंगे ही । परन्तु जीवसाक्षिचैतन्य की तरह ईश्वरसाक्षिचैतन्य भी क्या अनेक है ? उत्तर—नहीं । यह ईश्वरसाक्षिचैतन्य एक है, क्योंकि उस साक्षिचैतन्य की उपाधिरूप माया एक है । माया के एक होने से मायोपहित चैतन्य भी एक है और प्रत्येक जीव-चैतन्य का अन्तःकरण भिन्न होने से अन्तःकरणोपहित चैतन्य भी भिन्न ( अनेक ) है । इस प्रकार इन दो साक्षिचैतन्यों में विशेष ( अन्तर ) है, उसी को सूचित करने के लिये मूल में 'ईश्वरसाक्षि तु' वाक्य में 'तु' शब्द का उपयोग किया है । अनादि, अनिर्वाच्य, विपर्यय की उपादान और विक्षेपप्रधान ईश्वरशक्ति ही माया है--इस प्रकार माया का लक्षण किया गया है ।

शंका—माया को एक कहने पर बृहदारण्यक के--'परमेश्वर, मायाओं के योग से अनेक रूप को प्राप्त हुआ है'—श्रुतिवचन से विरोध होता है । इस पर ग्रंथकार धर्म-राजाध्वरीन्द्र कहते हैं—'निष्प्रतिबन्ध ऐश्वर्य से युक्त हुआ परमात्मा मायाओं के योग से अनेकाकार प्रतीत होता है ।' इस वाक्य में 'मायाभिः' ( यह ) बहुवचन का प्रयोग, मायागत शक्तिविशेषों के अभिप्राय से किया गया है । मुख्य माया में जो असंख्य विचित्र शक्तियाँ हैं वे ही शक्तिविशेष हैं । अग्नि प्रभृति पदार्थों में दाहकत्व, प्रकाशकत्व आदि कार्यों को देखकर तत्तद् शक्तियां तत्तत् पदार्थों में जैसी कल्पित की जाती हैं, उसी तरह जगद्रूप विचित्र कार्यों के देखने से तत्तत् असंख्य कार्यों की शक्तियाँ माया में कल्पित करनी पड़ती हैं । उन्हीं को शक्तिविशेष अथवा अवान्तर शक्ति कहते हैं । इन असंख्य शक्तिविशेषों के अभिप्राय से 'मायाभिः' ( ऐसा ) श्रुति में कहा है । मूल माया के अभिप्राय से नहीं । अथवा सत्त्व, रज, और तम—इन तीन गुणों की साम्यावस्था को माया ( प्रकृति ) कहते हैं । उन तीन गुणों के अभिप्राय से श्रुति में 'मायाभिः' बहुवचन का उपयोग किया है । भाव यह है कि ईश्वरसाक्षि की उपाधिभूत माया एक है । वह जीवसाक्षी के उपाधिभूत अन्तःकरण की तरह नाना नहीं है ।

शंका—'मायाभिः' यह बहुवचनान्त प्रयोग श्रुति के करते हुए 'माया का बहुत्व' इस मुख्यार्थ को छोड़कर अमुख्य अर्थ का ग्रहण क्यों किया जाता है । ( अवान्तर विशेषों की अथवा गुणों के बहुत्व की कल्पना करके 'मायाभिः' इस बहुवचन की व्यवस्था क्यों लगाई जा रही है ) 'मायां तु०' आदि ग्रंथ से समाधान किया जाता है—

'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।' श्वे० ४।१०।
"अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजास्सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥' श्वे० ४।५।


१. अत्र 'तरत्यविद्या'मिति क्वचित् पाठः ।