वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमायाया एकत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९१
"तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते । योगी मायामभेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः ॥ १ ॥' इत्यादिश्रुति-स्मृतिषु एकवचन-बलेन लाघवानुगृहीतेन मायाया एकत्वं निश्चीयते । ततश्च तदुपहितं चैतन्यम् ईश्वरसाक्षि । तच्चानादिः, तदुपाधेर्मायाया अनादित्वात् ॥
अर्थ—'तु' चिद्रूप महेश्वर से विलक्षण जड़भूत 'मायां' ईश्वर शक्ति (माया) 'प्रकृतिम्' प्रकृति है और 'तु' उस माया से विलक्षण (चिद्रूप) 'मायावी' माया शक्ति-मान् चिद्रूप आत्मा-महेश्वर है 'विद्यात्' समझना चाहिये । ( श्वे० उ० ४।१० ) ।
अजा—उत्पन्न न होनेवाली, एक, लोहित, शुक्ल, कृष्ण रूप (तेज, अप्, अन्नात्मक) 'सरूपाः बह्वीः प्रजाः सृजमानां' अपने आकार की विविध प्रजा को पैदा करनेवाली, अजा (अविद्यात्मक प्रकृति) का, 'एकः अजः हि जुषमाणः अनुशेते' एक, अज (अनादि), अविद्यात्मक वासनाओं से बद्ध हुआ जीवात्मा सेवन करता रहता है, और दूसरा अज (ईश्वर) भुक्त भोगा (जिसका भोग लिया गया है) प्रकृति को छोड़ता है । अविद्यावान् जीवात्मा की तरह विद्यावान् ईश्वर उसके तादात्म्य को प्राप्त नहीं होता । (श्वे. उ. ४।५) । 'यस्मिन् परात्मनि हृदि निवेशिते सति' जिस परमात्मा की हृदय में स्थिर स्थापना करने पर (वृत्त्यारूढ = वृत्तिविषय करने पर 'योगी विततां अविद्यां तरति' योगी कार्यरूप से विस्तार को प्राप्त हुई अविद्या (माया) को तर जाता है । 'तस्मै अमेयाय विद्यात्मने नमः' उस अप्रमेय (प्रमाणों के विषय न होने-वाले) विद्यात्मा को प्रणाम । इत्यादि श्रुति-स्मृतिगत लाघव से उपकृत हुए एकवचन के बल से माया के एकत्व का निश्चय किया जाता है । इस कारण मायोपहितचैतन्य 'ईश्वरसाक्षि' है और वह अनादि है । क्योंकि उसकी उपाधिरूप माया का अनादित्व है ।
**विवरण—**प्रथम श्रुतिवचन में 'मायां' ऐसा एकवचन जाति के अभिप्राय से है ऐसा कोई कदाचित् कह दे, इसलिये प्रत्यक्ष 'एकाम्' इस एकत्वबोधक शब्दावली की एक दूसरी 'अजामेकाम्' इत्यादि श्रुति का निर्देश किया है । इसके देखने से 'मायां' एक-वचन जाति के अभिप्राय से उपयुक्त किया है यह कहने का अवकाश नहीं मिलता । तथापि माया का एकत्व श्रुतितात्पर्य से सिद्ध है—आपने कैसे जाना ? क्योंकि श्रुति का तात्पर्य अमुक अर्थ में ही है—ऐसा निश्चय करना बहुत कठिन है । ऐसा कदाचित् कोई कह दे इसलिये स्मृतिकार के वचन का अनुसरण कर हम श्रुतितात्पर्य का निश्चय करते हैं । इस आशय से 'तरत्यविद्याम्' आदि पराशरस्मृति का उल्लेख किया है । 'योगी जिस परमात्मा को वृत्त्यारूढ करके (वृत्ति का विषय करके) अविद्याख्य माया का
१. अत्र 'अजामेका'मिति क्वचित् पाठः ।
२. 'तिष्वेकव०' इति पाठान्तरम् ।