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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 482 में से

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९२वेदान्तपरिभाषा[ विषयप्रत्यक्षविचारः

उल्लंघन करता है उस ज्ञानस्वरूप अमेय (वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य का विषय न होनेवाले) परमात्मा को प्रणाम हो। उसी अविद्यामें 'वितताम्' (प्रपंच के आकार में परिणत होने से सर्वत्र व्याप्त हुई) विशेषण दिया है।

**शंका—**परमेश्वर की हृदय में स्थापना करने से अविद्या की निवृति होने पर भी अनर्थ की निवृत्ति नहीं होगी। क्योंकि सर्वानर्थभूत माया तो अवशिष्ट ही रहती है। अतः अविद्या की निवृत्ति से माया की निवृत्ति नहीं हो सकती।

**उत्तर—**परमेश्वर की शक्तिरूप माया और अविद्या एक ही है। इसी आशय से मूल में 'अविद्यां माया' कहा है। अविद्या अपने आश्रय (जीव) को मोहित करती है किन्तु माया अपने आश्रय (ईश्वर) को मोहित नहीं करती, इस प्रकार उनमें भेद होने पर भी वस्तुतः उसमें भेद नहीं है। अर्थात् अविद्या और माया पृथक् पदार्थ नहीं है।

**शंका—**स्मृति में भी जाति के अर्थ में एकवचन और 'अजामेकाम्' यहां 'एक' शब्द अमुख्य अर्थ में कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में श्रुतिस्मृति से एकत्व का निश्चय कैसे किया जा सकता है ?

**उत्तर—**श्रुतिस्मृति में एकवचन, लाघव से अनुगृहीत है। 'मयाभिः' इस बहुवचन से परमेश्वर की अनेक मायाओं की कल्पना करने की अपेक्षा एक ही माया-शक्ति की कल्पना करने में लाघव है, इस लाघव से अनुगृहीत श्रुतिस्मृति के एक वचन से माया का एकत्व निश्चित होता है। मूलस्थ 'इत्यादि, पदसे 'अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः' (का. १, २, ५) 'मम माया दुरत्यया' (गी. ७, १४) आदि श्रुति-स्मृति वचनों को समझना चाहिये। जैसे उपाधिभूत माया के एक होने से ईश्वरसाक्षिचैतन्य एक है, वैसे ही उसके अनादि होने से वह अनादि भी है। अब ईश्वरसाक्षिज्ञान को ईश्वर के स्वरूपज्ञान की अपेक्षा होने से उसका स्वरूप बताते हैं—

मायावच्छिन्नं चैतन्यं परमेश्वरः, मायाया विशेषणत्वे ईश्वरत्वम्, उपाधित्वे साक्षित्वमिति ईश्वरत्व-साक्षित्वयोर्भेदः, न तु धर्मिणोरीश्वर¹-तत्‌साक्षिणोः²।

स च परमेश्वर एकोपि ³स्वोपाधिभूत-माया-निष्ठ-सत्त्व-रजस्त


१. 'रसाक्षि०' इति पाठान्तरम् ।
२. गोर्भेदः-इति पाठान्तरम् ।
३. 'स्वोपाधिभूत-माया-निष्ठ-सत्त्वरजस्तमोगुणाभेदेन'—परमेश्वरचैतन्योपाधिभूता या माया, तद्घटका ये सत्त्वरजस्तमोगुणाः तेषां भेदेन। एवञ्च एकमेवेश्वरचैतन्यं यदा सत्त्वप्रधानमायावच्छिन्नं भवति, तदा विष्णुनाम्ना, यदा च रजः प्रधानमायावच्छिन्नं, तदा तदेव ब्रह्मनाम्ना, यदा च तमःप्रधानमायावच्छिन्नं, तदा तदेव महेश्वरनाम्ना