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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 482 में से

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मायाविशिष्टस्य जगत्कर्तृत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९३

अर्थ—मायावच्छिन्न चैतन्य ही परमेश्वर है। माया जब चैतन्य में विशेषण हो तब उस चैतन्य में ईश्वरत्व होता है और माया जब उसमें उपाधि हो तब उस चैतन्य में साक्षित्व होता है। अर्थात् मायाविशिष्ट-चैतन्य को ईश्वरत्व और मायोपहित चैतन्य को ईश्वरसाक्षित्व, इस प्रकार ईश्वरत्व और ईश्वरसाक्षित्व में भेद है। परन्तु ईश्वर और उसके साक्षी इन धर्मियों में भेद नहीं। और उस ईश्वर के वस्तुतः एक होने पर भी उसकी उपाधिभूत माया में रहनेवाले सत्त्व, रज और तम इन गुणों के भेद से ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर आदि शब्दों की वाच्यता ( अर्थ ) को वह ( ईश्वर ) पाता है।

विवरण—अन्तःकरणविशिष्ट चैतन्य—जीव, और अन्तःकरणोपहित चैतन्य—जीवसाक्षी इस पूर्वोक्त भेद के समान ही यहाँ भी माया के विशेषणत्व और उपाधित्व के कारण ईश्वरत्व और ईश्वरसाक्षित्व का भेद है। जैसे जो पाचक ( स्वयं पाक करनेवाला ) हो, वही पाठक ( पाठ करनेवाला ) जब रहता है, तब पाचक व्यक्ति से पाठक व्यक्ति भिन्न नहीं होता, परन्तु उस व्यक्ति में रहनेवाले 'पाचकत्व और पाठकत्व' ( ये ) धर्म भिन्न होते हैं यह प्रसिद्ध ही है। उसी तरह ईश्वर और उसका साक्षी इन धर्मियों का भेद नहीं, अपितु ईश्वरसाक्षित्व इन धर्मों का भेद है।

शंका—माया के एकत्व के कारण ईश्वरसाक्षी में जैसे एकत्व है, उसी तरह मायावच्छिन्न ( मायाविशिष्ट ) चैतन्य ( ईश्वर ) में भी एकत्व अवश्य होना ही चाहिये। ऐसा होते हुए उसका ब्रह्मादि रूप से भेद कैसे स्वीकार किया गया है ? उसी तरह वह ब्रह्मादिभेद, विशेषण-भेद मूलक होने से और उस विशेषणभेद की उपाधि माया के होने से तदुपहित चैतन्य में भी एकत्व होना उचित है। ऐसी स्थिति में उसे अनेकत्व कैसे ? इस शंका का उत्तर 'स च' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है, जिसका तात्पर्य इस प्रकार है—जिस प्रकार 'माया' रूप उपाधि ( विशेषण ) के सत्त्वादि गुणों के अभिप्राय से अनेकत्व का व्यपदेश होता है, उसी तरह उसके गुणों के अवच्छेद से ईश्वर का भेद होता है, वास्तव में नहीं। ऐसा होने से मायावच्छिन्न ईश्वरचैतन्य ही उद्भूत सत्त्व-गुणवाली माया से अवच्छिन्न होने पर पालन करनेवाला नारायण, विष्णु


व्यवह्रियते। गुणत्रयकार्यविशेषनिबन्धनोऽयमीश्वरस्य रूपभेदः, न स्वरूपभेदनिबन्धनः। तथा च मैत्रेयोपनिषदि—"अथ यो ही खलु वाऽस्य राजसोंऽशोऽसौ स योऽयं ब्रह्मा। अथ यो ह खलु वाऽस्य तामसोंऽशो स योऽयं रुद्रः। अथ यो ह खलु वाऽस्य सात्विकोंऽशोऽसौ स योऽयं विष्णुरिति" तथा विष्णुपुराणेऽपि—"सर्गस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मिकाम्। स संज्ञा याति भगवानेक एव जनार्दनः॥" इति।

१. रादि-इति पाठान्तरम्।
२. भजते-इति पाठान्तरम्।