वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९४ | वेदान्तपरिभाषा | [ मायाविशिष्टस्य जगत्कर्तृत्वम्
इत्यादि शब्दों का वाच्य (अर्थ) होता है। वह ही मायाविशिष्ट चैतन्य, उद्भूत रजोगुणवाली माया से अवच्छिन्न होने पर स्रष्टा, ब्रह्मा, विधाता आदि शब्दों का वाच्य होता है। और वह ही ईश्वरचैतन्य उद्भूत-तमोगुणवाली माया से अवच्छिन्न होने पर संहर्ता, महेश्वर, रुद्र आदि संज्ञाओं को पाता है। मैत्रेयोपनिषद् में ऐसा वर्णन मिलता है—"अथ यो ह खलु वास्य राजसोंऽशः असौ स योऽयं ब्रह्मा, अथ यो ह खलु वास्य तामसोंऽशः असौ स योऽयं रुद्रः, अथ यो ह खलु वास्य सात्त्विकोंऽशः असौ स योऽयं विष्णु" ईश्वर के राजस अंश का नाम ब्रह्मा, तामस अंश का नाम रुद्र, और सात्त्विक अंश का नाम विष्णु है। त्रिगुणमायावच्छिन्न चैतन्य ही विष्णु, महेश, गणेश, दिनेश, दुर्गा रूपों से उपास्य होता है, क्योंकि उन उपास्यों का निरंकुश (निष्प्रतिबन्ध) ऐश्वर्य कहीं श्रुत नहीं।
ईश्वर के सादित्व में शंका—
नन्वीश्वर-साक्षिणोऽनादित्वे तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय, छा० ६।२।१ इत्यादिना सृष्टिपूर्वसमये परमेश्वरस्यागन्तुकमीक्षणमुच्यमानं कथमुपपद्यते ?
अर्थ— ईश्वरसाक्षिचैतन्य यदि अनादि होता तो उसने 'मैं बहुत होऊँ, प्रजा के रूप में उत्पन्न होऊँ' (छां. उ. ६, २, ३) आदि वाक्य से सृष्टि के पूर्व परमेश्वर का आगन्तुक ईक्षण बताया है, वह कैसे उपपन्न होगा ?
विवरण— ईश्वरसाक्षी-ईक्षण में सृष्टिपूर्वकालीनत्व है, ऐसा कहा हुआ होने से उसे (ईश्वरसाक्षीचैतन्य को) अनादि नहीं मान सकते। क्योंकि 'कालिक अवधि से रहित रहना' ही अनादित्व है। जिसमें काल की अवधि रहती है वह अनादि नहीं होता। ईक्षण में सृष्टि का पूर्वकाल रूप अवधि है। इसलिये उसमें अनादित्व नहीं है। किन्तु ईक्षण में सृष्टिपूर्वकालिकत्व होने से सादित्व है। यह सिद्ध होनेपर तद्विशिष्ट ईश्वर में भी सादित्व मानना पड़ता है ('तदैक्षत०' इत्यादि श्रुति, ईक्षण में सृष्टिपूर्वकालीनत्व का प्रतिपादन करती है) अतः ईश्वर साक्षी के ईक्षण में अनादित्व बाधित होता है, और उनके बाधित होनेपर तद्विशिष्ट ईश्वर में भी अनादित्व बाधित होता है।
इस शंका का समाधान 'उच्यते' इत्यादि ग्रन्थ से करते हैं—
उच्यते। यथा विषयेन्द्रिय-सन्निकर्षादि-¹कारणवशेन जीवो-
१. 'सन्निकर्षादि०' अत्रादिशब्देन व्याप्तिज्ञानादिपरिग्रहः । जीवोपाध्यन्तःकरणस्य जीवचैतन्ये विशेषणीभूतस्य अन्तःकरणस्य । अन्तःकरणस्य उपाधित्वदशायामन्तःकरणवृत्त्यभावः ।