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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 482 में से

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पृष्ठ 153

मायाविशिष्टस्य जगत्कर्तृत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९५

पाद्यन्तःकरणस्य वृत्तिभेदा जायन्ते, तथा सृज्यमान-प्राणिकर्मवशेन परमेश्वरोपाधिभूत-मायाया वृत्तिविशेषा 'इदमिदानीं स्रष्टव्यमिदमिदानीं पालयितव्यमिदमिदानीं संहर्तव्य'मित्याद्याकारा जायन्ते। तासां च वृत्तीनां सादित्वात्तत्प्रतिबिम्बितं चैतन्यमपि सादीत्युच्यते। एवं साक्षिद्वैविध्येन प्रत्यक्षज्ञानद्वैविध्यम्। प्रत्यक्षत्वं च ज्ञेयगतं ज्ञप्तिगतं ^१चेति निरूपितम् ॥

अर्थ—उपर्युक्त शंका का समाधान बताया जाता है—जैसे-विषयेन्द्रियसन्निकर्षादि कारणों से जीव के उपाधिरूप अन्तःकरण के वृत्तिविशेष (अनेक विषयाकार वृत्तियां) माने जाते हैं, वैसे ही जिन्हें उत्पन्न करना है उन प्राणियों के कर्मवशात् परमेश्वरोपाधिभूत माया के वृत्तिविशेष (यह अब स्रष्टव्य = उत्पाद्य अर्थात् उत्पन्न करने योग्य है, यह अब पालन करने योग्य है, यह अब संहार करने योग्य है—इत्यादि आकारों के वृत्तिविशेष) उत्पन्न होते हैं। उन वृत्तियों में सादित्व (वे वृत्तियां उत्पन्न होती हैं इस कारण) होने से, उनमें (वृत्तियों में) प्रतिबिम्बित हुआ चैतन्य भी सादि (उत्पन्न) कहा जाता है। इस प्रकार साक्षी की द्विविधता से प्रत्यक्ष ज्ञान की भी द्विविधता है। इस कारण प्रत्यक्षत्व के (प्रत्यक्ष के) ज्ञेयगत और ज्ञप्तिगत भेद से दो प्रकार बताये गये हैं।

विवरण—जैसे चैतन्य को अभिव्यक्त करनेवाली अन्तःकरण वृत्ति के सादि^२ होनेसे उसमें प्रतिबिम्बित हुए जीवसाक्षिरूप ज्ञान में भी सादित्व है, वैसे ही ईक्षणादिकों को अभिव्यक्त करनेवाली मायावृत्ति में भी सादित्व होने से उसमें प्रतिबिम्बित हुए ईश्वर-साक्षीचैतन्य (ईक्षणादि ज्ञानस्वरूप) में भी सादित्व है। तथापि उनमें स्वरूपतः अनादित्व ही है (साक्षीचैतन्य में उपाधि के कारण पैदा होनेवाला सादित्व स्वाभाविक न होकर औपाधिक है) वृत्तिरूप उपाधि के कारण वह सादि-सा (उत्पन्न-सा) भासता है। उस औपाधिक सादित्व से चैतन्य का स्वाभाविक अनादित्व बाधित नहीं हो सकता।

इस प्रकार साक्षी की द्विविधता का प्रतिपादन किया। इस कारण तत्तद्वृत्तियों


परमेश्वरोपाधिभूतमायायाः = परमेश्वरचैतन्ये विशेषणीभूतमायाया उपाधिभूतमायायाश्चेति।

१. च निरू० इति पाठान्तरम्।
२. विशिष्टस्य विशेष्य-विशेषणोभयानतिरिक्तत्वात् विशेषणीभूताया मायावृत्तः सादित्वात् विशिष्टस्य तद्वृत्यभिव्यक्त-चैतन्यस्यापि सादित्वम्।