वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९६ | वेदान्तपरिभाषा | [ ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षलक्षणम्
में अनुवृत्त हुए साक्षी का ज्ञानत्व होने से प्रत्यक्ष ज्ञान की भी द्विविधता है, एक ईश्वर-साक्षिजन्य और दूसरा जीवसाक्षिजन्य प्रत्यक्ष । परन्तु दीपिकाकार कहते हैं—'जीव-साक्षिजन्य और ईश्वरसाक्षिजन्य कहना उचित नहीं है, क्योंकि 'ज्ञप्तिगत प्रत्यक्ष चित्त्व ही है' इस उत्तर ग्रन्थ से विरोध होगा ।
अब उसी में कुछ विशेष कहने के लिए 'एवं साक्षिद्वैविध्येन०' ग्रन्थ से ज्ञेयगत और ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षत्व के निरूपण का अनुवाद किया गया है ।
अब उस विशेष को बताते हैं--
तत्र ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षत्वस्य सामान्यलक्षणं चित्त्वमेव । पर्वतो वह्निमानित्यादावपि वह्न्याद्याकार-वृत्त्युपहित-चैतन्यस्य स्वात्मांशे स्वप्रकाशतया प्रत्यक्षत्वात् । तत्तद्विषयांश¹प्रत्यक्षत्वं तु पूर्वोक्तमेव । तस्य च भ्रान्तिरूप-प्रत्यक्षे नातिव्याप्तिः, भ्रमःप्रमासाधारण-प्रत्यक्ष²त्वसामान्य-निर्वचनेन तस्यापि लक्ष्यत्वात् ।
अर्थ—उनमें से ज्ञप्तिगत—प्रत्यक्षत्व का सामान्य लक्षण 'चित्त्व' ही है । 'पर्वत वह्निमान् है' आदि अनुमिति-ज्ञानों में भी वह्न्याद्याकारवृत्ति से उपहित ( युक्त ) चैतन्य को 'चित्' अंश में प्रत्यक्षत्व है, क्योंकि उसमें स्वप्रकाशत्व है और स्वप्रकाशत्व के कारण विषयाकारवृत्त्युपहित-चैतन्य को स्वांश में प्रत्यक्षत्व है, इसलिये 'चित्त्व' रूप प्रत्यक्षत्व लक्षण की अनुमित्यादि ज्ञानों में अतिव्याप्ति बताना उचित नहीं है । क्योंकि अनुमित्यादि ज्ञान भी यहाँ लक्ष्य हैं, अलक्ष्य नहीं । तत्तद् विषय के अंश का 'प्रत्यक्षत्व तो पहले ही कह दिया है ( ज्ञेयगत प्रत्यक्षत्व का लक्षण पहले सविस्तर कह ही चुके हैं ) उस लक्षण की भ्रान्तिरूप प्रत्यक्ष में अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि भ्रम ( मिथ्याज्ञान ) और प्रमा ( सम्यक् ज्ञान ) इन दोनों ज्ञानों के लिये साधारण ऐसे प्रत्यक्षत्व सामान्य के निर्वचन से भ्रमज्ञान भी लक्षण कोटि में आ जाता है, अतः अलक्ष्य में लक्षणगमनरूप अतिव्याप्ति नहीं होती ।
विवरण—'तत्रेति' ज्ञेयगत और ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व में से ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व का सामान्य-लक्षण 'चित्त्व' ही है, यह सुनकर वादी कहता है—ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षत्व का 'चित्त्व' रूप लक्षण अनुमिति, उपमिति, आदि ( प्रत्यक्ष प्रमा से भिन्न ) प्रमाओं में अतिव्याप्त होता है । क्योंकि प्रत्यक्षप्रमा के समान उनमें भी चित्त्व है, परन्तु अनुमिति आदि प्रमाएं इसका लक्ष्य तो नहीं हैं केवल प्रत्यक्ष हैं, इस कारण चित्त्वरूप-प्रत्यक्षप्रमा का लक्षण अलक्ष्यभूत ( जो लक्ष्य नहीं है ) अनुमिति आदि प्रमाओं में भी रहने से
१. यांशे—इति पाठान्तरम् ।
२. क्षताः-इति पाठान्तरम् ।