वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञाप्तिगत-प्रत्यक्ष-लक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९७
अतिव्याप्त होता है । इस आशंका समाधान 'पर्वतो वह्निमान्' आदि ग्रन्थ से करते हैं । सभी ज्ञानों में अर्थात् 'पर्वतो वह्निमान्' आदि अनुमित्यादि सभी प्रमाओं में तत्तद्-विषयाकार वृत्ति से उपहित चैतन्य को चैतन्यांश में प्रत्यक्षत्व है, क्योंकि 'यत्साक्षात् अपरोक्षात् ( अपरोक्षं ) ब्रह्म' इस श्रुति ने चित्त्व का ही प्रत्यक्षत्व (अपरोक्षत्व) बताया है, और चिद्रूप ज्ञान, स्वप्रकाश है । इसलिए सभी ज्ञानों को ज्ञान अंश में प्रत्यक्षत्व ही है । इससे ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व का 'चित्त्व' रूप लक्षण अतिव्याप्त नहीं हो पाता, क्योंकि चैतन्य सर्वदा प्रत्यक्ष ही रहता है ।
शंका—चैतन्य, स्वप्रकाशत्व के कारण यदि प्रत्यक्ष है और उसके प्रत्यक्ष होने से समस्त ज्ञानों को यदि प्रत्यक्षत्व है तो अनुमिति उपमिति, आदि प्रमाओं में प्रत्यक्षत्व का व्यवहार क्यों नहीं होता ? ( अनुमिति, उपमिति, शाब्द आदि ज्ञानों को 'प्रत्यक्ष' क्यों नहीं कहा जाता ) ।
इस शंका का समाधान 'तत्तद्विषयांश०' आदि ग्रन्थ से किया गया है । अनुमिति आदि ज्ञानों में विषयांशनिरूपित प्रत्यक्षत्व का पूर्वोक्त प्रयोजक नहीं है । इसलिए उन्हें प्रत्यक्षशब्द से नहीं कहा जाता । हमने पहले बताया है कि विषयगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक 'प्रत्यक्ष योग्य विषय के आकार की जो जो अन्तःकरण वृत्ति, उससे उपहित जो प्रमातृचैतन्य की सत्ता, उससे विषय की सत्ता का पृथक् न रहना' ( विषयाकार वृत्त्युपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता का पृथक् न रहना ) ही विषयगत ( प्रमेयगत ) प्रत्यक्षत्व है । अर्थात् अनुमिति प्रभृति ज्ञानों में इसके प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक के ) न होने से अनुमित्यादि प्रमाओं को 'प्रत्यक्षप्रमा' शब्द से नहीं कहा जाता । 'चित्त्व' ( स्वप्रकाशत्व ) रूप ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व का लक्षण प्रत्यक्षादि सब प्रमाओं में है । परन्तु ज्ञेयगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक प्रत्यक्षादि सब प्रमाओं में भिन्न-भिन्न है । इसलिए प्रत्यक्ष से भिन्न प्रमाओं में प्रत्यक्ष शब्द का व्यवहार नहीं होता । अर्थात् विषय के भेद से प्रत्यक्षादि प्रमाओं में भेद होता है ।
शंका—शुक्तिरूप्यादि प्रत्यक्ष ज्ञान में योग्य विषयाकार वृत्त्युपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता से भ्रामक शुक्तिरूप्यादि विषयों की सत्ता भिन्न नहीं होती, इसलिए शुक्तिरूप्यादि-भ्रान्त ज्ञान में 'चित्व'-रूप ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व के लक्षण की अतिव्याप्ति होती है ।
समाधान—'तस्य च' ग्रन्थ से समाधान किया गया है । 'चित्त्व' ( स्वप्रकाशत्व ) रूप लक्षण की भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि भ्रमज्ञान की भी स्वांश ( ज्ञान ) में प्रत्यक्षता सिद्ध है, अतः भ्रमज्ञान में भी ज्ञप्तिगत सामान्य लक्षण की लक्ष्यता रहने से अतिव्याप्ति नहीं हो पाती । अलक्ष्य में लक्षण का घटित होना अतिव्याप्ति कहलाती है । भ्रमज्ञान तो ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व लक्षण ( चित्त्व ) का अलक्ष्य न होकर लक्ष्य , इसलिए 'चित्त्व' लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । भ्रमज्ञान ( अप्रमा-ज्ञान ) और प्रमाज्ञान ( सम्यग्ज्ञान ) इन द्विविधज्ञानों का साधारण लक्षण ( ज्ञप्तिगत