वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ९८ | वेदान्तपरिभाषा | [ शुक्ति-रजत-प्रत्यक्षविचारः |
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प्रत्यक्षत्व का बित्त्वरूप सामान्य लक्षण ) बताया है । उस सामान्य लक्षण का लक्ष्य भ्रमज्ञान भी है । ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व के विशेष लक्षण की अतिव्याप्ति का निरसन आगे किया जायगा ।
शंका—प्रत्यक्ष-प्रमाण का निरूपण करते समय ( प्रत्यक्ष प्रमाण के प्रकरण में ) भ्रमज्ञान और प्रमाज्ञान ( सम्यग्ज्ञान ) दोनों के लिए साधारण ( प्रत्यक्षत्व के ) लक्षण का कहना ( सामान्य लक्षण का निरूपण करना ) योग्य नहीं है ।
इस शंका का निरसन 'यदा तु०' ग्रन्थ से करते हैं—
यदा तु प्रत्यक्षप्रमाया एव लक्षणं वक्तव्यं, तदा पूर्वोक्तलक्षणे-ऽबाधितत्वं विषयविशेषणं देयम्¹ । शुक्तिरूप्यादिभ्रमस्य संसार-कालीनबाधविषय-प्रातिभासिक-रजतादि-विषयकत्वेनोक्तलक्षणाभावान्ना-तिव्याप्तिः ॥
अर्थ—अब आप यदि "प्रत्यक्ष प्रमा का ही लक्षण बताने के लिये कहें" तो पूर्वोक्त लक्षणगत 'विषय' में 'अबाधितत्व' विशेषण जोड़ दीजिये । जिससे प्रमा के लक्षण की भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि शुक्तिरूप्यादि भ्रम में, संसारकालीन-बाध-विषय-प्रातिभासिकरजतादिविषयकत्व के होने से उसमें उक्त लक्षण का अभाव है । अतः अतिव्याप्ति नहीं होने पाती ।
विवरण—जब कि प्रत्यक्षप्रमाण का निरूपण चल रहा है तो ज्ञेयगत यथार्थ प्रत्यक्ष का ही 'विशेष लक्षण' बताना योग्य है । भ्रमज्ञान और प्रमाज्ञान दोनों के लिये साधारण ( ऐसा ) प्रत्यक्षत्व-सामान्य का लक्षण बताना योग्य नहीं । यह आक्षेप यदि हो तो पूर्वोक्त ज्ञान-साधारण-लक्षणगत 'विषय' शब्द के साथ 'अबाधित' विशेषण जोड़ देना चाहिये, जिससे भ्रमज्ञान का विषय बाधित होने से उसकी निवृत्ति हो जायगी । "योग्य और अबाधित विषय की सत्ता का, विषयाकार वृत्ति से उपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता से पृथक् न होना" ( ऐसा ) लक्षण करने से बाधित होनेवाले शुक्तिरजतादि-विषयों की व्यावृत्ति होती है । जिससे यह लक्षण ज्ञेयगत यथार्थप्रत्यक्षत्व का हो सकता है ।
शंका—'अबाधितत्व' का अर्थ 'पारमार्थिकत्व' है या केवल 'सत्त्व' । 'पारमार्थिक-त्व' यदि कहें तो 'घटज्ञान' में अव्याप्ति होगी । क्योंकि वेदान्तमत में घटादि विषयों में बाधितत्व है । वेदान्त के मत में ब्रह्म से भिन्न यञ्च यावत् सब मिथ्या ( बाधित )
१. 'पूर्वोक्तलक्षणे'—विषयगत-प्रत्यक्षलक्षणे । तथा च—स्वविषयवृत्त्युपहित प्रमातृ-चैतन्यसत्तातिरिक्तसत्ताशून्यत्वे सति अबाधितत्वे सति योग्यत्वं विषयगतप्रत्यक्षत्व-प्रयोजकम् इति विशेषलक्षणम् । अत्र अबाधितपदेन व्यवहारकालाऽबाध्यत्वं विवक्ष्यते ।