वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
ज्ञाप्तिगत-प्रत्यक्ष-लक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९७
अतिव्याप्त होता है । इस आशंका समाधान 'पर्वतो वह्निमान्' आदि ग्रन्थ से करते हैं । सभी ज्ञानों में अर्थात् 'पर्वतो वह्निमान्' आदि अनुमित्यादि सभी प्रमाओं में तत्तद्-विषयाकार वृत्ति से उपहित चैतन्य को चैतन्यांश में प्रत्यक्षत्व है, क्योंकि 'यत्साक्षात् अपरोक्षात् ( अपरोक्षं ) ब्रह्म' इस श्रुति ने चित्त्व का ही प्रत्यक्षत्व (अपरोक्षत्व) बताया है, और चिद्रूप ज्ञान, स्वप्रकाश है । इसलिए सभी ज्ञानों को ज्ञान अंश में प्रत्यक्षत्व ही है । इससे ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व का 'चित्त्व' रूप लक्षण अतिव्याप्त नहीं हो पाता, क्योंकि चैतन्य सर्वदा प्रत्यक्ष ही रहता है ।
शंका—चैतन्य, स्वप्रकाशत्व के कारण यदि प्रत्यक्ष है और उसके प्रत्यक्ष होने से समस्त ज्ञानों को यदि प्रत्यक्षत्व है तो अनुमिति उपमिति, आदि प्रमाओं में प्रत्यक्षत्व का व्यवहार क्यों नहीं होता ? ( अनुमिति, उपमिति, शाब्द आदि ज्ञानों को 'प्रत्यक्ष' क्यों नहीं कहा जाता ) ।
इस शंका का समाधान 'तत्तद्विषयांश०' आदि ग्रन्थ से किया गया है । अनुमिति आदि ज्ञानों में विषयांशनिरूपित प्रत्यक्षत्व का पूर्वोक्त प्रयोजक नहीं है । इसलिए उन्हें प्रत्यक्षशब्द से नहीं कहा जाता । हमने पहले बताया है कि विषयगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक 'प्रत्यक्ष योग्य विषय के आकार की जो जो अन्तःकरण वृत्ति, उससे उपहित जो प्रमातृचैतन्य की सत्ता, उससे विषय की सत्ता का पृथक् न रहना' ( विषयाकार वृत्त्युपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता का पृथक् न रहना ) ही विषयगत ( प्रमेयगत ) प्रत्यक्षत्व है । अर्थात् अनुमिति प्रभृति ज्ञानों में इसके प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक के ) न होने से अनुमित्यादि प्रमाओं को 'प्रत्यक्षप्रमा' शब्द से नहीं कहा जाता । 'चित्त्व' ( स्वप्रकाशत्व ) रूप ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व का लक्षण प्रत्यक्षादि सब प्रमाओं में है । परन्तु ज्ञेयगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक प्रत्यक्षादि सब प्रमाओं में भिन्न-भिन्न है । इसलिए प्रत्यक्ष से भिन्न प्रमाओं में प्रत्यक्ष शब्द का व्यवहार नहीं होता । अर्थात् विषय के भेद से प्रत्यक्षादि प्रमाओं में भेद होता है ।
शंका—शुक्तिरूप्यादि प्रत्यक्ष ज्ञान में योग्य विषयाकार वृत्त्युपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता से भ्रामक शुक्तिरूप्यादि विषयों की सत्ता भिन्न नहीं होती, इसलिए शुक्तिरूप्यादि-भ्रान्त ज्ञान में 'चित्व'-रूप ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व के लक्षण की अतिव्याप्ति होती है ।
समाधान—'तस्य च' ग्रन्थ से समाधान किया गया है । 'चित्त्व' ( स्वप्रकाशत्व ) रूप लक्षण की भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि भ्रमज्ञान की भी स्वांश ( ज्ञान ) में प्रत्यक्षता सिद्ध है, अतः भ्रमज्ञान में भी ज्ञप्तिगत सामान्य लक्षण की लक्ष्यता रहने से अतिव्याप्ति नहीं हो पाती । अलक्ष्य में लक्षण का घटित होना अतिव्याप्ति कहलाती है । भ्रमज्ञान तो ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व लक्षण ( चित्त्व ) का अलक्ष्य न होकर लक्ष्य , इसलिए 'चित्त्व' लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । भ्रमज्ञान ( अप्रमा-ज्ञान ) और प्रमाज्ञान ( सम्यग्ज्ञान ) इन द्विविधज्ञानों का साधारण लक्षण ( ज्ञप्तिगत
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प्रत्यक्षत्व का बित्त्वरूप सामान्य लक्षण ) बताया है । उस सामान्य लक्षण का लक्ष्य भ्रमज्ञान भी है । ज्ञप्तिगत प्रत्यक्षत्व के विशेष लक्षण की अतिव्याप्ति का निरसन आगे किया जायगा ।
शंका—प्रत्यक्ष-प्रमाण का निरूपण करते समय ( प्रत्यक्ष प्रमाण के प्रकरण में ) भ्रमज्ञान और प्रमाज्ञान ( सम्यग्ज्ञान ) दोनों के लिए साधारण ( प्रत्यक्षत्व के ) लक्षण का कहना ( सामान्य लक्षण का निरूपण करना ) योग्य नहीं है ।
इस शंका का निरसन 'यदा तु०' ग्रन्थ से करते हैं—
यदा तु प्रत्यक्षप्रमाया एव लक्षणं वक्तव्यं, तदा पूर्वोक्तलक्षणे-ऽबाधितत्वं विषयविशेषणं देयम्¹ । शुक्तिरूप्यादिभ्रमस्य संसार-कालीनबाधविषय-प्रातिभासिक-रजतादि-विषयकत्वेनोक्तलक्षणाभावान्ना-तिव्याप्तिः ॥
अर्थ—अब आप यदि "प्रत्यक्ष प्रमा का ही लक्षण बताने के लिये कहें" तो पूर्वोक्त लक्षणगत 'विषय' में 'अबाधितत्व' विशेषण जोड़ दीजिये । जिससे प्रमा के लक्षण की भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि शुक्तिरूप्यादि भ्रम में, संसारकालीन-बाध-विषय-प्रातिभासिकरजतादिविषयकत्व के होने से उसमें उक्त लक्षण का अभाव है । अतः अतिव्याप्ति नहीं होने पाती ।
विवरण—जब कि प्रत्यक्षप्रमाण का निरूपण चल रहा है तो ज्ञेयगत यथार्थ प्रत्यक्ष का ही 'विशेष लक्षण' बताना योग्य है । भ्रमज्ञान और प्रमाज्ञान दोनों के लिये साधारण ( ऐसा ) प्रत्यक्षत्व-सामान्य का लक्षण बताना योग्य नहीं । यह आक्षेप यदि हो तो पूर्वोक्त ज्ञान-साधारण-लक्षणगत 'विषय' शब्द के साथ 'अबाधित' विशेषण जोड़ देना चाहिये, जिससे भ्रमज्ञान का विषय बाधित होने से उसकी निवृत्ति हो जायगी । "योग्य और अबाधित विषय की सत्ता का, विषयाकार वृत्ति से उपहित प्रमातृचैतन्य की सत्ता से पृथक् न होना" ( ऐसा ) लक्षण करने से बाधित होनेवाले शुक्तिरजतादि-विषयों की व्यावृत्ति होती है । जिससे यह लक्षण ज्ञेयगत यथार्थप्रत्यक्षत्व का हो सकता है ।
शंका—'अबाधितत्व' का अर्थ 'पारमार्थिकत्व' है या केवल 'सत्त्व' । 'पारमार्थिक-त्व' यदि कहें तो 'घटज्ञान' में अव्याप्ति होगी । क्योंकि वेदान्तमत में घटादि विषयों में बाधितत्व है । वेदान्त के मत में ब्रह्म से भिन्न यञ्च यावत् सब मिथ्या ( बाधित )
१. 'पूर्वोक्तलक्षणे'—विषयगत-प्रत्यक्षलक्षणे । तथा च—स्वविषयवृत्त्युपहित प्रमातृ-चैतन्यसत्तातिरिक्तसत्ताशून्यत्वे सति अबाधितत्वे सति योग्यत्वं विषयगतप्रत्यक्षत्व-प्रयोजकम् इति विशेषलक्षणम् । अत्र अबाधितपदेन व्यवहारकालाऽबाध्यत्वं विवक्ष्यते ।
अन्यथाख्यातिः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९९
है। किन्तु यह लक्षण, बाधित-घट में रहता नहीं। 'लक्षणका लक्ष्य के एक देश मे न रहना' ही अव्याप्ति है। अब यदि 'सत्त्वमात्र' ही अबाधितत्व का अर्थ बतायें तो शुक्तिरूप्यादिभ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति वैसे ही स्थिर रहती है। वह नहीं हटेगी। क्योंकि 'केवल सत्त्व' भ्रमज्ञान में भी है। परन्तु वह ज्ञान, लक्ष्य नहीं है।
इस शङ्का का निरसन 'शुक्तिरूप्यादिभ्रमस्य० ग्रन्थ से किया है। शुक्ति-रूप्यादि-भ्रमज्ञान का विषय प्रातिभासिक रजत है। वह (शुक्ति में भासित होने वाला वह रजत) संसारकालीन बाध का विषय होता है (व्यवहार काल में शुक्ति का ज्ञान होने पर उसका बाध होता है)। इसलिये 'विषय' में 'अबाधित' विशेषण के देने से शुक्तिरूप्यादिभ्रमज्ञान में लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती।
'अबाधित' विशेषण का 'संसार दशा में व्यावहारिक सत्ता में अबाधित' (यह) अर्थ विवक्षित है। घटादि व्यावहारिक विषय व्यवहार काल में (व्यावहारिक सत्ता में) बाधित नहीं होते। वे तो पारमार्थिक सत्ता में (ब्रह्म ज्ञान होने पर) बाधित होते हैं। इसलिये घटादि ज्ञानों में लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती। इसलिये मूल में "व्यवहार काल में बाधित होनेवाला- बाध का विषय बनने वाला, (जो) प्रातिभासिक रजतादि (वह) भ्रमज्ञान का विषय होता है" कहा है। इससे पूर्वोक्त ज्ञेय-गत प्रत्यक्षत्व का लक्षण, भ्रान्ति ज्ञान के विषय में अतिव्याप्त नहीं होता। प्रतिभासिक का अर्थ है केवल प्रतीति काल में ही रहने वाला अनिर्वचनीय अर्थात् शुक्तिरजतज्ञान के समय अनिर्वचनीय रजतादि उत्पन्न होता है और वह शुक्तिज्ञान के होने पर बाधित होता है। इसलिए संसारकालीन-शुक्तिरजतादिज्ञान में बाधितविषयकत्व है। इसलिये वह पूर्वोक्त लक्षण का लक्ष्य नहीं बन सकता।
परन्तु इस समाधान से सन्तुष्ट न होनेवाला अन्यथा-ख्यातिवादी शंका करता है।
ननु विसंवादिप्रवृत्त्या १ भ्रान्तिज्ञानसिद्धावपि तस्य प्रातिभासिक-तत्कालोत्पन्न रजतादि विषय २ त्वे न प्रमाणम्, देशान्तरीय रजतस्य कॢप्तस्यैव तद्विषयत्वसंभवात् ।
१. नैयायिकः शङ्कते—भ्रमप्रत्यक्षं न तत्कालोत्पन्नरजतादिविषयकं, किन्तु देशान्तरीय सत्यरजतादिविषयकम् । 'विसंवादिप्रवृत्त्या'—तदर्थिनः तदप्राप्तिफलकप्रवृत्त्या अर्थात् निष्फलप्रवृत्त्या । नैयायिकानां मते—ज्ञानं यदा अनुव्यवसायेन गृह्यते, तदा तेन अनुव्यवसायेन तद्गतं भ्रमत्वं प्रमात्वं वा नैव गृह्यते, तयोः परतोग्राह्यत्वात् । किन्तु तज्ज्ञानजन्या प्रवृत्त्या तदनुमीयते । तथा च प्रयोगः—'शुक्तिरजतादिविषयकं ज्ञानं भ्रमः विसंवादिप्रवृत्तिजनकत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा प्रमा।' इत्थं विसंवादिप्रवृत्त्या ज्ञानस्य भ्रमत्वनिश्चयः । २. विषयकत्वे—इति पाठान्तरम् ।
१०० | वेदान्तपरिभाषा | [ ज्ञानलक्षणासन्निकर्षखण्डनम्
**अर्थ—**शुक्ति के कारण होनेवाले रजतज्ञान में की जाने वाली प्रवृत्ति, विसंवादि (मिथ्या) सिद्ध होती है। अर्थात् 'यह चाँदी है' (ऐसा) समझ उसे लेने के लिये प्रवृत्त होने पर हाथ में सीप आती है, इस कारण 'यह चाँदी है' इत्याकारक सीप में 'रजतज्ञान' भ्रम है, प्रमा (यथार्थ ज्ञान) नहीं है। यद्यपि यह सच है तथापि उस ज्ञान का विषय प्रातिभासिक (अनिर्वचनीय, प्रतीति काल में ही उत्पन्न होने वाला) रजतादि है—इस विषय में कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि अन्य स्थान में स्थित पूर्वसिद्ध रजत को ही तद्विषयत्व है (ऐसा) कह सकते हैं। सराफे में दूकान पर पूर्व से ही विद्यमान सत्य रजत उस शुक्तिरजतज्ञान का विषय हो सकता है।
विवरण—'यह चाँदी है' ज्ञान होने पर उसे लेने के लिए स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। उस हाथ में लेते ही सत्य रजत यदि हाथ लगा तो प्रवृत्ति संवादी है—कहा जाता है। उसे हाथ में लेकर देखने से यदि ज्ञात हुआ कि यह रजत न होकर सीप या अन्य कोई पदार्थ है तो प्रवृत्ति को विसंवादी प्रवृत्ति कहते हैं। शुक्ति-रजत ज्ञान से हुई प्रवृत्ति विसंवादी सिद्ध होती है। क्योंकि समीप पहुँचने पर दिखाई देता है कि यह रजत नहीं किन्तु 'शुक्ति' है। अतः इस विसंवादी प्रवृत्ति से शुक्तिरजतज्ञान का भ्रान्ति-ज्ञान होना सिद्ध होता है। परन्तु किसी प्रमाण के न होने से उस (भ्रम) ज्ञान का विषय, अनिर्वचनीय (उसी समय उत्पन्न हुआ =) प्रातिभासिक रजत नहीं है। (भ्रान्तिकाल में वह रजत उत्पन्न होता है इस विषय में प्रत्यक्षादि कोई प्रमाण नहीं है) यदि ऐसा कहें कि—'दूसरे विषय की अनुपपत्ति (असम्भव) ही अनिर्वचनीयरजत के विषय होने में प्रमाण है' तो यह अनुचित है, क्योंकि—अन्य प्रदेश (स्थान) में पहले से ही विद्यमान रजत, उस भ्रान्तिज्ञान का विषय हो सकता है।
'इति चेत्' ग्रन्थ से शंका का अनुवाद कर 'न०' आदि ग्रन्थ में उसका निरसन करते हैं—
इति चेत् न। तस्यासन्निकृष्टतया प्रत्यक्ष-विषयत्वायोगात्। 'न च ज्ञानं तत्र प्रत्यासत्तिः, ज्ञानस्य प्रत्यासत्तित्वे तत एव वह्नयादेः प्रत्यक्षत्वापत्तावनुमानाद्युच्छेदापत्तेः।
अर्थ—-'शुक्तिरजत' आदि भ्रान्तिज्ञान का विषय, 'तत्कालोत्पन्न अनिर्वचनीय रजत न होकर अन्यत्र स्थित सत्यरजत है' यदि कहें तो ठीक नहीं। क्योंकि अन्य प्रदेश में स्थित सत्य रजत, असन्निकृष्ट (दूर) रहता है। सन्निकृष्ट (समीप) न होने से ही 'यह रजत' इत्याकारक प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय नहीं हो सकता। (दूर स्थित सत्य रजत,
१. 'न च ज्ञानं तत्र प्रत्यासत्तिः-ज्ञानं ज्ञानलक्षणा तत्र देशान्तरीयरजतादौ, प्रत्यासत्तिः सन्निकर्षः।
ज्ञानलक्षणासन्निकर्षखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०१
'यह रजत' इत्याकारक प्रत्यक्षज्ञान का विषय नहीं हो सकता ) । यहाँ ज्ञान का ही प्रत्यासत्तित्व ( सामीप्य ) मानने पर वह्नि आदि को प्रत्यक्षत्व प्राप्त होता है, जिससे अनुमान आदिकों का उच्छेद होने का प्रसंग प्राप्त होगा ।
विवरण—'भ्रमज्ञान का विषय अनिर्वचनीय ( तत्कालोत्पन्न ) —पदार्थ न होकर अन्यत्र स्थित सत्य-पदार्थ उसका विषय है' यह कहना भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि भ्रमज्ञान का विषय सन्निकृष्ट ( समीप ) होता है, इसीलिये 'यह रजत' 'यह सर्प' 'यह जल' कहते हुए शुक्तिरजत, रज्जुसर्प, मृगजल आदि का अंगुलि से निर्देश करते हैं । वे रजतादि विषय यदि सन्निकृष्ट न होते तो वैसा अंगुलि-निर्देश न किया जाता । असन्निकृष्ट विषय का भान नहीं हो सकता, क्योंकि विषय का सान्निध्य भी—प्रत्यक्षज्ञान की सामग्री में से एक अंश है । शुक्तिरजत का ज्ञान, प्रत्यक्ष होता है । इसलिये उसका विषय सन्निकृष्ट ही होना चाहिये, बिना उसके वह हो ही नहीं सकता क्योंकि सुदूर प्रदेश में स्थित, वस्तु में प्रत्यक्षज्ञान के विषय होने की योग्यता ही नहीं रहती । इन्द्रियों से सन्निकृष्ट ( सम्बद्ध ) न हुई वस्तु, इन्द्रियों का विषय कैसे होगी, और इन्द्रियों के विषय न होनेवाले पदार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान कैसे होगा ।
शंका—भ्रमज्ञान के विषय का अलौकिक-सन्निकर्ष स्वीकार करने पर यह दोष नहीं होगा । ऐसा यदि कहें तो बताइये कि वह अलौकिक-सन्निकर्ष सामान्यरूप है या ज्ञान रूप है ? उसके सामान्य रूप होने में कोई प्रमाण नहीं । सामान्यलक्षणा-प्रत्यासत्ति माननेवाले तार्किक इस विषय में ऐसा कहते हैं—
महानस ( रसोईघर ) में अग्नि और धूम की व्याप्ति का ग्रहण करते समय धूमत्वेन और वह्नित्वेन—सकल धूम और सकल अग्नि-व्यक्तियों मन में उपस्थित होती हैं ( मन में धूमत्व और अग्नित्व जाति के द्वारा समस्त धूम और समस्त अग्नि की उपस्थिति होती है ) तदनन्तर उनके व्याप्य-व्यापक भाव का ग्रहण होता है । ( उनमें 'धूम' व्याप्य है और 'अग्नि' व्यापक है ऐसा ज्ञान होता है ) क्योंकि धूममात्र ( सकल धूमव्यक्ति ) व्याप्य है और अग्निमात्र ( सकल अग्निव्यक्ति ) व्यापक हैं—( यह ) ज्ञान न होता तो महानस के धूम और वहाँ की अग्नि की व्याप्ति से पर्वतीय धूम के दिखाई देने पर 'पर्वत पर अग्नि है' यह अनुमिति-ज्ञान न हुआ होता । किन्तु पर्वतीय धूम के देखते ही वहाँ पर अग्नि का अनुमिति ज्ञान होता है । उसकी उपपत्ति लगाने के लिये ही महानस में धूम और अग्नि की व्याप्ति के ग्रहण करते समय सकल धूम-अग्निव्यक्तियों की मन में उपस्थिति होने के लिये ही सामान्य लक्षणा ( सामान्यात्मिका ) प्रत्यासत्ति को अवश्य मानना पड़ता है ।
तार्किकों के उपर्युक्त कथन पर वेदान्तियों का कहना है कि—धूमत्व और अग्नित्व ( धूमसामान्य और वह्निसामान्य ) से अर्थात् सामान्यलक्षणा से सकल धूम और वह्नि व्यक्तियों की उपस्थिति होती है । ऐसा यदि माना जाय तो समस्त जीवों
१०२ वेदान्तपरिभाषा [ ज्ञानलक्षण। सन्निकर्षखण्डनम्
को सर्वज्ञत्व अनायास ही प्राप्त होगा। क्योंकि--सामान्यलक्षणा-प्रत्यासत्ति भी एक सन्निकर्ष ही है। वह यदि असन्निहित (दूरस्थ) विषयों से भी होता हो तो भूत, वर्तमान और भविष्य काल की व्याप्तिमात्र से पुरुष को वह संयुक्त कर देगा, तब उसकी असर्वज्ञता में निमित्त ही क्या रहेगा। अर्थात् कोई निमित्त नहीं। अलौकिक-सन्निकर्ष के द्वारा पुरुष का त्रैकालिक पदार्थों से यदि संयोग होने लग जाय तो इसकी सर्वज्ञता अनायास ही सिद्ध है। अर्थात् तार्किक अपने को 'मैं सर्वज्ञ ईश्वर हूँ' मानने लग जाय तो उसे कौन मना कर सकेगा।
समीप स्थित धूमादि पदार्थों से संयुक्त हुए चक्षु मे भूत, भविष्य और दूरस्थित वर्तमान विषय के समर्पण करने का सामर्थ्य हमें तो दिखाई नहीं देता। (चक्षुरादि-इन्द्रिय-सन्निकृष्ट-पदार्थ से भिन्नकालीन तथा असन्निकृष्ट पदार्थ का ज्ञान कराने का सामर्थ्य उन-उन इन्द्रियों में होने का अनुभव हमें नहीं है) इसलिए अनुभव के विरुद्ध कल्पना करना—तुम्हारा साहस ही व्यक्त होता है।
हमारे (वेदान्तियों के) मत में महानस में ज्ञात हुई धूम-अग्नि की व्याप्ति से पर्वतीय अग्नि का अनुमान इस प्रकार होता है—
व्याप्तिज्ञान के समय महानसीय धूम और अग्नि का व्याप्य-व्यापकभाव, गोष्ठगत धूम और अग्नि का व्याप्य-व्यापक भाव, ऐसे ही भिन्न-भिन्न स्थानों में उनकी व्याप्ति देखकर धूम और अग्नि के व्याप्य-व्यापक भाव का निश्चय होता है। इस प्रकार प्रथम पृथक्-पृथक् धूमाग्नि के व्याप्य-व्यापकत्व का ज्ञान होने पर वह व्यक्ति पर्वतीय धूम अग्नि के व्याप्य-व्यापकभाव का अनुमान करता है—१—यह¹ धूम वह्निव्याप्य है। २—क्योंकि महानसादि में वैसा अनुभव आता है। ३—पृथिवीव्याप्य गन्ध के समान।
शंका—महानस आदि स्थानों में धूम से अग्नि के सम्बन्ध का प्रत्यक्षतया ग्रहण किये होने से देशान्तरीय और कालान्तरीय धूमादि का सम्बन्ध उपस्थित न होने से 'धूम' वह्नि-व्याप्य है या नहीं, यह संशय नहीं होगा। परन्तु सामान्य-लक्षणा के द्वारा सकल व्यक्तियों की उपस्थिति होने पर अन्य देशीय तथा भिन्न कालिक वह्नि-निरूपित व्याप्ति में सन्देह होगा।
समाधान—'समानप्रकारनिश्चयस्यैव संशयविरोधित्वात्'—समान-प्रकार-निश्चय में ही संशय-विरोधित्व रहता है—(प्रत्यक्ष हुए धूम-अग्नि के सम्बन्ध का निश्चय होने पर वह निश्चय, प्रत्यक्ष हुए धूम अग्नि की व्याप्ति में संदेह होने नहीं देगा, अर्थात् उसका विरोध करेगा। अप्रत्यक्ष रहने वाले धूमाग्नि की व्याप्ति में होने वाले संशय को वह नहीं रोक सकता। (अप्रत्यक्ष = देशान्तरीय और कालान्तरीय धूमाग्नि की व्याप्ति में अवश्य ही संशय होगा) पहले कह चुके हैं कि—अलौकिक-सन्निकर्ष, सामान्यात्मक है या ज्ञान रूप है? यह विकल्प कर उसमें कोई प्रमाण नहीं है। पहिले पक्ष में सन्निकृष्ट (समीपस्थित) धूमादि ही प्रत्यक्ष का विषय होता है। धूममात्र (सर्वधूम =
१. 'अयं धूमः वह्निव्याप्यः, महानसादौ तथानुभूतत्वात्, पृथिवीव्याप्यगन्धवत्' ।
अनिर्बचनीयरजतोत्पत्तिः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०३
सार्वदेशिक और सार्वकालिक धूम ) प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय नहीं होता । इसलिए सामान्य-प्रत्यासत्ति की कल्पना नहीं की जा सकती ।
अब ज्ञानरूप अलौकिक-सन्निकर्ष के पक्ष में परिहार 'न च ज्ञानं०' आदि ग्रन्थ से किया जाता है ।
( भ्रान्ति ) भ्रम-प्रत्यक्ष-ज्ञान के विषय में ज्ञान ही प्रत्यासत्ति है— यह कथन अनुचित है । शुक्तिरजत में ज्ञान-सन्निकर्ष के होने में कोई प्रमाण नहीं है । भ्रान्तज्ञान के रजतादि विषयों से ज्ञानसन्निकर्ष के ( ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्ति ) मानने में दोष है—तथा च—ज्ञानलक्षणा-प्रत्यासत्ति से ही अनुमिति अग्न्यादि पदार्थों को प्रत्यक्षत्व प्राप्त होगा और ज्ञानरूप-सन्निकर्ष से पदार्थ का प्रत्यक्षज्ञान होने लगने पर अनुमानादि अन्य प्रमाणों का उच्छेद होने का प्रसंग आवेगा, कारण अलौकिक प्रत्यक्ष सामग्री, अनुमिति-ज्ञान की सामग्री से लाघव के कारण बलवती है । इस पर शंका और उसका समाधान—
ननु रजतोत्पादकानां रजतावयवा¹नामभावे शुक्तौ कथं तवापि रजतमुत्पद्यते इति चेत् । उच्यते । न हि लोकसिद्ध सामग्री प्रातिभासिक रजतोत्पादिका, किन्तु विलक्षणैव ।
अर्थ— रजतोत्पादक ( भ्रान्त रजत को उत्पन्न करनेवाले ) रजतावयवों के अभाव होने पर शुक्ति में रजतोत्पत्ति आप के पक्ष में भी कैसे हो सकेगी ? यदि पूछो तो बताते हैं—सत्यरजत की लोकसिद्ध सामग्री, 'प्रातिभासिक' रजत की उत्पादिका नहीं है ( लोकसिद्ध रजत-सामग्री भ्रान्त रजत को भी पैदा नहीं करती ) अपि तु प्रातिभासिक-रजत को उत्पन्न करनेवाली सामग्री लोकसिद्धसामग्री से अत्यन्त विलक्षण है ।
विवरण— 'ज्ञान में प्रत्यासत्तित्व है—मानने पर वह्न्यादिकों के प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त होता है और उससे अनुमानादि अन्य प्रमाणों का उच्छेद होने का प्रसंग आता है' यह दोष आप ( वेदान्ती ) हम पर ( तार्किकों पर ) देते हैं परन्तु 'शुक्ति-रजतस्थल में अपूर्वरजत की उत्पत्ति होती है' यह तुम्हारा ( वेदान्तियों का ) पक्ष भी असंगत है, क्योंकि—रजत के उपादान-कारण लौकिक रजतावयवों का शुक्ति में अभाव होने से वहाँ पर ( शुक्ति में ) रजतोत्पादक अलौकिक अवयवों का ही आप को स्वीकार करना होगा । परन्तु अलौकिक अवयवों को भ्रान्तरजत का उपादान मानने में कोई प्रमाण नहीं है—ऐसी आशंका करने पर सिद्धान्ती कहता है—
शुक्ति में रजत के अलौकिक अवयव यदि न हों तो उसकी उत्पत्ति का ही असम्भव होगा । परन्तु जब कि शुक्ति में रजत का प्रत्यय ( अनुभव ) होता है तब शुक्ति में अनिर्वचनीय रजतोत्पत्ति को 'परिशेष'न्याय से मानना आवश्यक हो जाता है । तन्नि-
१. वादीनां०-इति पाठान्तरम् ।
| १०४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनिर्वचनीयरजतोत्पत्तिः |
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मित्त भ्रान्त-रजत को उत्पन्न करनेवाली सामग्री का भी अवश्य स्वीकार करना चाहिए। सिवाय—'शुक्ति में लौकिक उपादान का अभाव होने से रजत की उत्पत्ति का सम्भव नहीं है—यह आपका कथन ठीक नहीं है। क्योंकि उपादान और उपादेय--दोनों में सादृश्य अवश्य होना चाहिये--यह नियम है। इस कारण अलौकिक रजत के उत्पन्न होने में लौकिक-सामग्री की अपेक्षा नहीं होती, किन्तु अलौकिक-रजत को अलौकिक-सामग्री की ही अपेक्षा होती है। अतः लोकसिद्ध रजत सामग्री, 'प्रातिभासिक' रजत की उत्पादिका नहीं है। 'लौकिक सामग्री से भिन्न सामग्री का अभाव रहने पर 'प्रातिभासिक' रजत की सामग्री कौन-सी ? यदि पूछो तो बताते हैं—
जैसे प्रातिभासिक-रजत, लौकिक-रजत से विलक्षण है, उसी प्रकार उसकी उत्पादिका सामग्री भी लोकप्रसिद्ध सामग्री से विलक्षण ही है। उस अलौकिक सामग्री का स्वरूप इस प्रकार है--
तथा¹ हि का² च कामलादिदोष-दूषित-लोचनस्य पुरोवर्ति द्रव्य संयोगादिदमाकारा चाकचिक्याकारा काचिदन्तःकरणवृत्तिरुदेति । तस्यां च वृत्ताविद³मवच्छिन्नं चैतन्यं प्रतिबिम्बते । तत्र पूर्वोक्तरीत्या ⁴वृत्ते⁵र्निर्गमनेनेदम⁶वच्छिन्नं चैतन्यं वृत्त्यवच्छिन्नं⁷ चैतन्यं प्रमातृ-
१. पारमार्थिक-रजतात् शुक्तिरजतं यदि विलक्षणं चेत् कथं तस्य 'इदं रजत'मिति रजतभावेन व्यवहारः ? न खलु घटविलक्षणः पटः घटभावेन व्यवह्रियते इत्याशंकां निरसितुं कारणवैलक्षण्यं प्रदर्शयति 'तथाहीति ।' प्रातिभासिकोत्पत्तौ काचादिदोषा निमित्तकारणम् । काचो नेत्र-रोगविशेषः । तेन काचः करणगतो दोषः । आदिपदेन विषयगतदोषस्य सादृश्यादेः, प्रमातृगतस्य दोषस्य रागादेः परिग्रहः । दोषस्तावत् अधिष्ठानाध्यस्यमानयोर्भेदग्रहे प्रतिबन्धको भवति । सम्प्रयोगरूपं कारणान्तरं प्रदर्शयितुं 'पुरोवर्तिद्रव्येति ।' सादृश्यं तावत् सोपाधिकाध्यासम्प्रति कारणं न भवति तथापि निरुपाधिकाध्यासम्प्रति ये तस्य कारणत्वं स्वीकुर्वन्ति, तान् प्रति सादृश्यसद्भावम्प्रदर्शयति 'चाकचिक्याकारेति ।' नैयायिकाः सिद्धान्त्येकदेशिनश्च सादृश्यस्य अध्यासहेतुत्वं वदन्ति-किन्तु विवरणकारास्तस्य अध्यासहेतुत्वं न स्वीकुर्वन्ति ।
२. 'काचादिदोष'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'मंशावच्छि'—इति पाठान्तरम् ।
४. वृत्तेर्निर्गमनेन इदमाकारवृत्तेः ।
५. 'तेर्बहिर्नि—इति पाठान्तरम् ।
६. 'दमंशाव—इति पाठान्तरम् ।
७. 'न्निष्ठप्रचै०'—इति पाठान्तरम् ।
अनिर्वचनीयरजतोत्पत्तिः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०५
चैतन्यं चाभिन्नं भवति । ततश्च प्रमातृचैतन्याभिन्न-विषयचैतन्य-निष्ठा शुक्तित्वप्रकारिकाऽविद्या चाकचिक्यादिसादृश्य-सन्दर्शन-समुद्-बोधित रजतसंस्कार-सध्रीचीना काचादिदोषमवहिता रजतरूपार्थाकारेण रजत-ज्ञानाभासाकारेण च परिणमते$^१$ ॥
**अर्थ—**काच, कामला आदि नेत्रदोषों से दूषित नेत्रवाले व्यक्ति के चक्षुरिन्द्रिय का सामने रहने वाले द्रव्य के साथ संयोग-सन्निकर्ष हो जाने से 'इदमाकार' = 'यह' इस आकार की 'चाकचिक्यकार' = चकचकित आकार की कोई सी ( विशिष्ट ) अन्तःकरणवृत्ति उदित होती है, और उस वृत्ति में 'इदम्' = यह ( इस विषय ) से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य-प्रतिबिम्बित होता है। इस प्रकार उस उत्पन्न हुई वृत्ति में चैतन्य के प्रतिबिम्बित होनेपर उपर्युक्त 'तडागोदक न्याय से वृत्ति बाहर पड़ती है जिससे इदमवच्छिन्न-चैतन्य, वृत्यवच्छिन्न-चैतन्य और प्रमातृचैतन्य--यह त्रिविध चैतन्य अभिन्न हो जाता है ( विषयावच्छिन्न = प्रमेयचैतन्य, वृत्यवच्छिन्न = प्रमाणचैतन्य, अन्तःकरणावच्छिन्न = प्रमातृचैतन्य--इनका अभेद होता है )।
इस प्रकार त्रिविध-चैतन्य का अभेद होनेपर प्रमातृचैतन्याभिन्न जो विषयचैतन्य, तन्निष्ठ जो शुक्तित्वप्रकारक-अविद्या, वही रजतरूप अर्थाकार से और रजतज्ञानाकार से परिणत होती है ( परिणाम को प्राप्त होती है ) और चाकचिक्यादि ( चकचकितपना वगैरह ) रूपसादृश्य के दर्शन से जागृत होनेवाले रजत-संस्कार रूप सामग्री का ही उस अविद्या को साहाय्य रहता है और काच-कामलादि दोष भी उस अविद्या में होते हैं, जिससे वह—रजत ( अविद्या ) रूप अर्थाकार से और रजतज्ञानाभासाकार से परिणत होती है।
**विवरण—**प्रातिभासिक रजत को पैदा करनेवाली रजत-सामग्री, लौकिक रजत की सामग्री से विलक्षण ही होती है। वह कौन-सी ? तो अविद्या। परन्तु आकाशादि-भूतों की उपादानभूत-अविद्या से यह 'अविद्या' विलक्षण है। आकाशादिकों की उपादानभूत-'मूला अविद्या' केवल चिन्मात्र के आश्रय से रहती है। चिन्मात्र ही उसका विषय रहता है और वह निर्विकल्पक ज्ञान से निवृत्त हो जाती है। परन्तु यह 'तूला
१. प्रातिभासिकोत्पत्तौ दोष-सम्प्रयोग-संस्कारादीनि निमित्तानि यानि तान्येव उपादानस्याज्ञानस्यापीति समाननिमित्तत्वात् कथमविद्यायाः कदाचित् रजतपरिणामः, कदाचिच्च रङ्गपरिणामः ? तत्रेदं समाधानम्—यत्पुरुषीया या अविद्या यादृशसंस्कार-सहिता भवति, सा तत्पुरुषसन्निधौ तदाकारेण परिणमते, नान्याकारेण। तथाचेष्टसिद्धि-काराः—"यस्याज्ञानं भ्रमस्तस्य भ्रान्तः सम्यक् च वेत्ति सः।" अतएव कस्यचित् एकस्यां शुक्तौ रजतभ्रमः कस्यच्चि रङ्गभ्रमो भवति।
| १०६ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनिर्वचनीयरजतोत्पत्तिः |
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अविद्या' शुक्त्यवच्छिन्न-चैतन्य के आश्रय से रहती है। रजत से भिन्न जो शुक्ति, तन्निष्ठ जो शुक्तित्व वही उसका विषय रहता है, और यह तूला-अविद्या, सविकल्पक-ज्ञान से निवृत्त होती है। तूला-विद्या और मूला-विद्या में यही भेद है।
मूल में 'अविद्या, रजतरूप विषय के आकार से और रजत-ज्ञानाभासाकार से परिणाम को प्राप्त होती है,' यह बताकर तूला-विद्या ही प्रातिभासिकरजत की उत्पादिका है, और उस अविद्या की ही प्रक्रिया इस ढंग से बतायी है—'काच' एक नेत्र रोग है, जिससे दृष्टि मंद होती है। उसी प्रकार कामला या ऐसे ही अन्य दोषों से जिसके नेत्र दूषित हुए हैं ऐसा व्यक्ति जब सामने सीप जैसे चमकते पदार्थ को देखता है तब उससे उसके मन में 'यह' (इस) आकार की अन्तःकरणवृत्ति पैदा होती है। सीप के चमकीलेपन के कारण, 'यह' इस अन्तःकरणवृत्ति में वह चमकीलापन भी प्रतीत होता है। इस प्रकार देखनेवाले व्यक्ति के सदोष चक्षुरिन्द्रिय का सामने स्थित द्रव्य के साथ संयोग होकर 'इदम्' विषय से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य प्रतिबिम्बित होता है। उसके प्रतिबिम्बित होने पर वह वृत्ति बाहर निकलती है। तब प्रमेयचैतन्य, प्रमाणचैतन्य, प्रमातृचैतन्य का अभेद हो जाता है। इस विषय में पहिले—'तडागोदक, नाली के मार्ग से क्षेत्र में पहुंचकर क्षेत्राकार हो जाता है'—दृष्टान्त दिया ही है। उसके बाद प्रमातृचैतन्याभिन्न जो विषयचैतन्य, तन्निष्ठ जो शुक्तित्वप्रकारक अविद्या, वह रजत-रूप विषयाकार में और रजतज्ञानाकार में परिणत होती है।
आपने अविद्या को ही आकाशादि प्रपंच का उपादान माना है, किन्तु अब इस कथन से आपकी प्रतिज्ञा-हानि होती है। यह शंका यदि कोई करे तो उसके निवारणार्थ ही तूलाविद्या में १—प्रमातृचैतन्याभिन्न = विषयचैतन्यनिष्ठ और २ शुक्तित्व-प्रकारक ये दो विशेषण जोड़े गये हैं। उससे चैतन्यमात्राश्रित = चिन्मात्रविषय और निर्विकल्पक-ज्ञान से निवर्त्य ऐसी मूलाविद्या की निवृत्ति होती है।
शंका—यहाँ तूलाविद्या सदैव ही भ्रान्त विषय और भ्रान्तविषयज्ञान के आकार से क्यों परिणत नहीं होती ?
समाधान—निमित्तकारण का अभाव होने से वह सदैव उस आकार से परिणत नहीं होती। पूर्वदृष्ट रजत से उत्पन्न हुआ रजतसंस्कार यद्यपि सर्वदा विद्यमान रहता है तथापि उसका जागृत होना, अविद्या के पूर्वोक्त परिणाम में निमित्त है। चाकचिक्यादि सादृश्य-दर्शन से वह उत्पन्न होता है। सामने पड़े हुए पदार्थ के सादृश्यदर्शन से रजत-संस्कार जागृत हो उठते हैं और वे जागृत हुए रजत-संस्कार ही तूलाविद्या के परिणाम में निमित्त होते हैं अर्थात् उस अविद्या को जब जागृत संस्काररूप सामग्री की सहायता मिलती है तब वह पूर्वोक्त प्रकार से परिणत होती है और जब उसे सामग्री की सहायता नहीं मिलती तब वह परिणत नहीं होती।
परिणामविवर्तलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०७
शंका—शुक्ति में चाकचिक्यादि रजत-सादृश्य का दीखना और नीलपृष्ठ त्रिकोणता आदि का न दीखना इसमें क्या निमित्त है ?
समाधान—उस अविद्या में द्रष्टा के काचादिनेत्रदोषों का सान्निध्य रहना ही नीलपृष्ठादिकों के अदर्शन में निमित्त है।
इस प्रकार नेत्रगत कांचादि दोषों से युक्त हुई तूलाविद्या, प्रातिभासिक रजताकार से और उसके ज्ञानकार से (रजताकार वृत्ति से) परिणत होती है। क्योंकि 'ज्ञान' शब्द का अर्थ वृत्ति है।
अब परिणाम का अर्थ बताते हैं—
'परिणामो नाम उपादान समसत्ताक² कार्यापत्तिः विवर्तो नाम उपादान विषमसत्ताक-कार्यापत्तिः। प्रातिभासिकं रजतं-चाविद्यापेक्षया परिणामः, चैतन्यापेक्षया विवर्त इति चोच्यते। अविद्यापरिणामरूपं च तद्रजतमविद्याधिष्ठाने इदमवच्छिन्न-चैतन्ये वर्तते। अस्मन्मते सर्वस्यापि कार्यस्य स्वोपादानाविद्याधिष्ठानाश्रितत्वनियमात्॥
अर्थ—उपादान की जैसी सत्ता हो ठीक वैसी सत्ता से युक्त कार्य की उसे (उपादान को) प्राप्ति होना—परिणाम कहलाता है। और उसकी (उपादान की) सत्ता की अपेक्षा विषमसत्ता से युक्त कार्य की प्राप्ति होना विवर्त कहलाता है। प्रातिभासिक रजत रूप कार्य, अविद्या की अपेक्षा से (अविद्या का) परिणाम है और वही
१. रजतमविद्या-परिणाम इति मन्यते चेत् रजतं ब्रह्मविवर्तो न स्यात्, ब्रह्मपरिणामस्यैव ब्रह्मविवर्तत्वात् विवर्त-परिणामयोरभेदात्, इत्याशङ्कायामुच्यते—'परिणामो-नामे'-ति। एवञ्च विवर्त-परिणामयोर्भेदात् रजतस्य न ब्रह्मविवर्तत्वहानिः।
२. यदा उपादानोपादेययोः एकरूपैव सत्ता, तदा समसत्ता भवति। एवञ्च 'स्वोपादानसत्तासमसत्ताकत्वे सति कार्यत्वम्परिणामत्वम्। अत्र 'स्व' पदमुपादेयपरम्बोध्यम्। ननु शुक्तिरूप्यस्य अविद्यापरिणामत्वं कथमुपादानस्य व्यावहारिकत्वात् उपादेयस्य च प्रातिभासिकत्वात्। तत्रोच्यते—पारमार्थिकसत्त्वं सत्त्वेन व्यवहारविषयत्वं चेति सत्त्वद्वैविध्यमाश्रित्य समसत्ताकत्वोपपत्तिः। तथाचोक्तमद्वैतसिद्धौ—जगदुपादानत्वोपपत्तौ—'समानसत्ताकत्वञ्च रूप्यस्थले सत्त्वद्वैविध्येन वा ब्रह्माज्ञानेतर-ज्ञानबाध्यत्वरूपप्रातिभासिकत्वमादाय वा उपपद्यते।' तथा च शुक्तिरजतादेः स्वोपादानसत्ता-समानसत्ताकत्वात् परिणामत्वम्। ननु अविद्यायां तादात्म्यसम्बन्धेन वर्तमानस्य अविद्यापरिणामस्य रजतस्य, चैतन्ये तत्सम्बन्धेन अवर्तमानत्वात् चैतन्योपादानकत्वासम्भवात् कथं चैतन्यविवर्तत्वं रजतस्येति चेत् अविद्यापरिणामस्य तदधिष्ठानाश्रितत्वनियमान्न विवर्तत्वहानिः।
१०८ | वेदान्तपरिभाषा | [ परिणामविवर्तलक्षणम्
रजत, चैतन्य की अपेक्षा से (चैतन्य का) विवर्त है—ऐसा कहा जाता है। अविद्या का परिणामरूप वह रजत अविद्याधिष्ठानभूत इदमवच्छिन्न चैतन्य में (विषयावच्छिन्न चैतन्य में) रहता है। क्योकि हमारे मत में सभी कार्य अपनी उपादानभूत अविद्या के अधिष्ठानभूत-चैतन्य के आश्रित होते हैं—यह नियम है (कोई भी कार्य अपने उपादान कारण के अधिष्ठान के आश्रय से रहता है)।
विवरण—जिस कारण से अभिन्नतया (भिन्न न होकर) कार्य उत्पन्न होता है, वह, उसका (कार्य का) उपादान कारण कहा जाता है। घटरूपकार्य, मृत्तिका से अभिन्न रहकर ही उत्पन्न होता है, इसलिये मृत्तिका, घट की उपादान-कारण है। जिस कार्य की सत्ता, अपने उपादान-कारण की सत्ता जैसी ही होती है, ऐसे कार्य की प्राप्ति होना (कारण का, समसत्ताक कार्य के आकार से पैदा होना) परिणाम है। सत्ता त्रिविध (तीन प्रकार की) होती है, पारमार्थिकी, व्यावहारिकी, और प्रातिभासिकी। ब्रह्म की सत्ता पारमार्थिकी होती है। आकाशादि प्रपंच की सत्ता व्यावहारिकी है। और शुक्तिरजतादि भ्रान्त पदार्थों की सत्ता, प्रातिभासिकी है। पारमार्थिकी-सत्ता नित्य (काल से अनवच्छिन्न) होती है। व्यावहारिकी-सत्ता केवल स्थितिकाल में (पदार्थ की उत्पत्ति से पूर्व और नाश के अनन्तर नहीं होती) होती है। कल्प के आरम्भ से उसके अन्त तक जो काल उसे व्यवहारकाल कहते हैं, और उस काल में जो सत्ता, उसे व्यवहारिकी सत्ता कहते हैं। शुक्ति पर भासित होने वाला रजत, रज्जु पर भासित होने-वाला सर्प, (ये) प्रातिभासिक पदार्थ हैं, इनकी सत्ता उस प्रतिभासकाल में ही रहती है। अधिष्ठान के ज्ञान से उसका बाध होता है, इसलिये वह प्रातिभासिकी सत्ता है।
दूध, व्यावहारिक पदार्थ है, वह व्यावहारिकी सत्ता से युक्त है, उसे दही रूप कार्य का आकार प्राप्त होता है। उस दही रूप कार्य की सत्ता भी व्यावहारिकी ही होती है, इसलिए दूध रूप उपादान कारण से 'दही' रूप समसत्ताक कार्य उत्पन्न होता है। इसलिये वह दूध का परिणाम है। इस लक्षण में कार्य को 'समसत्ताक' विशेषण जोड़-कर विवर्त में अतिव्याप्ति का वारण किया जाता है। अथवा व्यावहारिकी सत्ता से युक्त तन्तुओं को व्यावहारिकी सत्ता से युक्त पटभाव की प्राप्ति होना—परिणाम है। इस परिणाम से विवर्त पृथक् है। परिणाम के समान विवर्त भी कार्य है। इसलिये परिणाम का लक्षण कहने के अनन्तर प्रसंग प्राप्त विवर्त का भी लक्षण यहीं पर बताया है। विवर्त उसे कहते हैं—उपादान की सत्ता से जिसकी सत्ता विषम है, ऐसे कार्य की उत्पत्ति।
विवर्त में अतिव्याप्ति के वारणार्थ परिणाम के लक्षण में जैसे 'समसत्ताक' विशेषण दिया है वैसे ही परिणाम में अतिव्याप्ति के वारणार्थ विवर्त के लक्षण में 'विषम सत्ताक' विशेषण दिया है। परन्तु प्रातिभासिक-रजतादिकों में परिणामत्व और विवर्तत्व दोनों धर्म रहते हैं—यह सूचित करने के लिये ही प्रातिभासिक रजत, अविद्या का परिणाम और चैतन्य का विवर्त है—ऐसा मूल में कहा है। जैसे तन्तु के परिणामरूप पट
रजतस्य साक्षिणि अध्यासः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०९
को तन्तुदेशत्व (जहाँ तन्तु रहते हैं वहीं पर पट रहता है) है, वैसे ही अविद्या के परिणाम-रूप शुक्तिरूप्य को अविद्यादेशत्व ( जहाँ अविद्या रहती है वहीं वह शुक्तिरजत रहता है) है । अविद्या, चैतन्यनिष्ठ होती है इसलिये शुक्तिरूप्य भी चैतन्यनिष्ठ होता है । इस आशय से मूल में अविद्यापरिणामरूप शुक्तिरजत, अविद्या के अधिष्ठानरूप इदम-वच्छिन्न चैतन्य में रहता है--कहा है । इस वाक्य से निम्नलिखित आशंका का निरसन किया गया है--
शंका--अविद्यापरिणामरूपरजत, अविद्या में तादात्म्य सम्बन्ध से रहता है, तब अविद्या में तादात्म्य सम्बन्ध से रहनेवाले रजत को चैतन्योपादानत्व ( चैतन्य, उसका उपादान है ) नहीं बनता । जब कि चैतन्य में, रजत, अविद्यासम्बन्ध से रहता है तब 'उसे उपादान-विषमसत्ताक कार्यापत्तिरूप विवर्तत्व' कैसे ?
समाधान--अविद्यापरिणामरूप रजत, अविद्याधिष्ठान के आश्रय से रहने के कारण उसे विवर्तत्व हो जाता है क्योंकि 'अविद्यापरिणामरूप रजत, अविद्या के अधिष्ठानभूत चैतन्य के आश्रय से रहता है' यह नियम है । क्योंकि हमारे मत में सभी कार्यों में, उन कार्यों के उपादानभूत अविद्या के अधिष्ठान का आश्रितत्व नियम से रहता है । कोई भी कार्य अपने उपादान कारण के अधिष्ठान के आश्रय से रहता है । इसलिये प्रातिभासिक रजत, अविद्या का परिणाम है और चैतन्य का विवर्त है । अब कोई दोष नहीं है इस समाधान पर पुनः शंका और उसका समाधान—
'ननु चैतन्यनिष्ठ¹स्य रजतस्य कथमिदं रजतमिति पुरोवर्ति-तादात्म्यम् ? उच्यते । यथा न्यायमते आत्मनिष्ठस्य सुखादेः शरीर-निष्ठत्वेनोपालम्भः, शरीरस्य सुखाद्यधिकरणतावच्छेदकत्वात् । तथा चैतन्यमात्रस्य रजतं प्रत्यधिष्ठानतया इदमवच्छिन्नचैतन्यस्य तदधिष्ठा-नत्वेन इदमॊऽवच्छेदकतया रजतस्य पुरोवर्ति संसर्गप्रत्यय³ उपपद्यते ।
१. चैतन्यनिष्ठस्य चैतन्याश्रितस्य चैतन्ये तादात्म्येन उत्पन्नस्येत्यर्थः । 'यत् यत्र तादात्म्येन उत्पद्यते तत् तदभिन्नतया तदाश्रिततया च प्रतीयते' इति नियमः । प्राति-भासिकं रजतं चैतन्ये तादात्म्येन उत्पद्यते चेत् चैतन्याऽभिन्नतया चैतन्याश्रिततया च 'चैतन्यं रजतमिति प्रतीयेत । किन्तु न तथा प्रतीयते, अपि तु 'इदं रजतमिति इदन्तादात्म्य-प्रतीतिर्भवति । अन्योपादेयस्य अन्यतादात्म्याऽयोगः । अतः प्रातिभासिकस्य रजतस्य चैतन्यतादात्म्यमेवोचितं, न इदन्तादात्म्यमिति शङ्काकर्तुराशयः ।
२. 'ष्ठरजः' इति पाठान्तरम् ।
३. पुरोवर्तिसंसर्ग-प्रत्ययः इदं तादात्म्यप्रत्ययः । यथा सुखाधिकरणस्य आत्मनः अवच्छेदके शरीरे सुखस्य संसर्गप्रत्ययो भवति, तथैव रजताधिकरणस्य अवच्छेदके इद-मिति रजतस्य तादात्म्यप्रत्ययो भवितुमर्हति ।
११० वेदान्तपरिभाषा [ रजतस्य साक्षिणि अध्यासः
**अर्थ—शंका—**चैतन्यनिष्ठ रजत का 'यह रजत' इस प्रकार आगे पड़ी हुई शुक्ति (सीप) से तादात्म्य कैसे हो सकता है ? इस शंका का समाधान कहा जाता है—जैसे न्याय के मत में आत्मनिष्ठ सुख-दुःखादि गुणों का शरीरनिष्ठत्व से ( वे शरीर में स्थित हैं ) प्रत्यय होता है, क्योंकि शरीर सुखादिकों की अधिष्ठानता का अवच्छेदक होता है। वैसे ही चैतन्यमात्र ( शुद्ध = निरुपाधिक चैतन्य ) रजत का अधिष्ठान नहीं होता ( शुद्ध चैतन्य उसका अधिष्ठान नहीं बन सकता ), तथापि इदमवच्छिन्न (विषयावच्छिन्न) चैतन्य, प्रातिभासिक रजत का अधिष्ठान हो सकता है। इसलिये वह इदमवच्छिन्न चैतन्य 'इदम्' विषय का अवच्छेदक है जिससे उस प्रतिभासिक रजत का पुरोवर्ति ( आगे पड़ी हुई ) शुक्ति से संसर्ग होकर वैसा संसर्ग प्रत्यय ( तादात्म्य का अनुभव ) आ सकता है।
**विवरण—**सभी कार्य, अविद्याधिष्ठान चैतन्याश्रित होता है—माना जाय तो प्रातिभासिक रजत का सामने पड़ी हुई शुक्ति से तादात्म्यप्रत्यय होना अनुपपन्न होगा ( भ्रान्त रजत का शुक्ति में 'यह रजत' इत्याकारक जो तादात्म्यप्रत्यय होता है वह नहीं बनेगा ) इस आशय से यहाँ 'ननु' ग्रन्थ से शंका की है।
इस शंका का आशय यह है—द्रष्टा व्यक्ति के सामने भूतल पर स्थित तन्तुओं में विद्यमान पट का प्रत्यक्षज्ञान जब होता है तब 'अब यहाँ यह पट है' यह प्रत्यय जैसे होता है वैसे ही चैतन्यनिष्ठ अविद्या में स्थित शुक्ति-रजत का 'चैतन्य में रजत' यह प्रत्यय होना चाहिए था, परन्तु 'यहाँ यह रजत है' ऐसा देह के बाहर प्रत्यय होता है,—वह ठीक नहीं है। क्योंकि चैतन्य के सर्वव्यापी होने से उसका 'इह' यहाँ ( पुरोवर्ती प्रदेश में ) प्रत्यय होना उचित नहीं है।
'उच्यते' इत्यादि ग्रन्थ से शंका का समाधान किया जाता है—अविद्या का परिणाम अविद्या के अधिष्ठानभूत चैतन्य के आश्रय से जैसे रहता है ( अविद्यापरिणाम को अविद्याधिष्ठानाश्रितत्व = अविद्या का अधिष्ठान चैतन्य आश्रय है और अविद्या का परिणाम आश्रित है इस प्रकार चैतन्य और परिणाम में आश्रयाश्रयिभाव = आश्रय भाव, जैसे रहता है ) वैसे ही चैतन्याध्यस्त ( चैतन्य पर आरोपित ) रजतादिकों की तदवच्छेदक पुरोवर्ति पदार्थ से तादात्म्य-प्रतीति हो सकती है। इस विषय में न्यायशास्त्र का एक दृष्टान्त दिया गया है—
नैयायिक सुखादि धर्मों को आत्मनिष्ठ मानते हैं। उनके कथनानुसार सुख, दुःख, कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्म आत्मा के हैं। परन्तु वे सुखादि आत्मनिष्ठ धर्म भी, शरीरनिष्ठ से लगते हैं ( शरीरनिष्ठत्वेन ) उनका अनुभव होता है। मेरा शरीर सुखी, इस प्रकार शरीरनिष्ठत्व के कारण देह को आत्मगत-सुखाद्युपलब्धि का अवच्छेदकत्व जैसे होता है, वैसे ही 'इदम्' इस पुरोवर्ती विषय को आत्मगत रजताध्यास का अवच्छेदकत्व है। उससे चैतन्याध्यस्त रजत का पुरोवर्ती शुक्ति में 'यह रजत' ऐसा प्रत्यय
रजतस्य साक्षिणि अध्यासः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १११
आ सकता है । क्योकि शुद्ध चैतन्य, आरोपित रजत का अधिष्ठान बन नहीं सकता (उस शुद्ध-चैतन्य में रजत का अधिष्ठान बनने की योग्यता ही नहीं है) इसलिए 'इदमवच्छिन्न' चैतन्य रजत का अधिष्ठान होने से शुक्ति के इदमंश को उसका अवच्छेदकत्व है, जिससे आरोपित रजत का पुरोवर्ती सीप से संसर्ग हुआ है ऐसा प्रत्यय हो सकता है ।
शंका—इदमवच्छिन्न चैतन्य में अध्यस्त रजतादि, साक्षी में अध्यस्त नहीं होता, और उसके, साक्षी में अध्यस्तत्व न होने से उस आरोपित रजतादि को केवल साक्षिवेद्यत्व और सुखादिकों के समान अनन्यवेद्यत्व है—यह साम्प्रदायिकों का कथन कैसे उपपन्न होगा ? 'तस्य च' आदि ग्रन्थ से इस शंका का समाधान कहते हैं—
तस्य च विषयचैतन्यस्य तदन्तःकर¹णोपहितचैतन्याभिन्नतया विषयचैतन्याध्यस्तमपि रजतं साक्षिण्यध्यस्तं केवलसाक्षिवेद्यं सुखादिवदनन्यवेद्यमिति चोच्यते² ।
अर्थ— और उस विषयचैतन्य का तद्विषय—अन्तःकरणोपहित चैतन्य से अभिन्नत्व होने से ( वे दोनों चैतन्य अभिन्न = एकरूप होने से ) विषय चैतन्य में अध्यस्त होता हुआ भी रजत 'साक्षी' में अध्यस्त है । वह केवल साक्षिवेद्य है और सुखादिकों के समान अनन्यवेद्य है—ऐसा कहा जाता है ।
विवरण— यहाँ पर शङ्का का आशय इस प्रकार है—पुरोवर्ती शुक्तिकादि विषय का 'इदम्' आकार वाले (शुक्ति के) अंश से अवच्छिन्न हुए विषयचैतन्य में रजतादिकों का अध्यास होता है । साक्षिचैतन्य में रजतादिकों का अध्यास नहीं होता । अर्थात् विषयचैतन्य में अध्यस्त हुए रजत को साक्षी में अध्यस्तत्व न होने से उसे केवल साक्षिवेद्यत्व है (केवल साक्षिचैतन्य ही उसे जानता है) और सुखादिकों के समान उस अध्यस्त रजतादि को भी अन्यवेद्यत्व नहीं (जैसे सुखादि, साक्षिचैतन्य से अन्य वृत्त्यादि-चैतन्य से वेद्य नहीं रहते वैसे ही अध्यस्त-रजतादि भी अन्यवेद्य नहीं) होते—यह पञ्चपादिकाचार्य का कथन कैसे उपपन्न होता है ?
१. 'णचैत ०'-इति पाठान्तरम् ।
२. अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यस्य अन्तःकरणोपहित चैतन्यस्य च अभेदात् इदमवच्छिन्नचैतन्यस्य अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यस्य च अभेदे इदमवच्छिन्नचैतन्यान्तःकरणोपहितचैतन्यरूपयोर्विषयसाक्षिणोरपि अभेदो भवति । तेन इदमवच्छिन्नचैतन्याध्यस्तं रजतं साक्षिणि अपि अध्यस्तं तादात्म्येन सम्बद्धं भवति, इदमवच्छिन्न-चैतन्यं साक्षिचैतन्यस्य चाभेदात् । तदा च इदमवच्छिन्नचैतन्याश्रितस्य रजतस्य साक्षात् साक्षिसम्बन्धात् प्रत्यक्षत्वमस्त्येव ।
| ११२ | वेदान्तपरिभाषा | [ विविधाध्यासिकप्रत्ययः |
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समाधान का आशय-'इदमवच्छिन्न-चैतन्य' ही विषयचैतन्य है। वह तद्विषयक अन्तःकरणोपहित-चैतन्य से भिन्न नहीं है (अभिन्न = तद्रूप ही है)। इस कारण विषय-चैतन्य में अध्यस्त होता हुआ भी रजत, साक्षी, में अध्यस्त है। उसी तरह वह साक्षिवेद्य और सुखादि के समान अनन्यवेद्य भी है—यह साम्प्रदायिकों का कथन सर्वथा उचित है।
ननु साक्षिण्यध्यस्तत्वेऽहं रजतमिति¹ प्रत्ययः स्यात्, अहं सुखीतिवदिति चेत्। ²उच्यते। न हि सुखादीनामन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्यनिष्ठाऽविद्याकार्यत्वप्रयुक्तम् अहं सुखीति ज्ञानम्, सुखादीनां घटादिवच्छुद्धचैतन्य एवाध्यासात्। किन्तु यस्य यदाकारानुभवाहित-संस्कारसहकृता विद्याकार्यत्वं तस्य तदाकारानुभवविषयत्वमित्येवानुगतं नियामकम्³।
**अर्थ—**भ्रान्त रजत, साक्षी में यदि अध्यस्त है तो 'मैं रजत' यह प्रत्यय होगा 'यह रजत' ऐसा प्रत्यय नहीं होगा। क्योंकि 'अहं सुखी = मैं सुखी' यह सुखविषयक प्रत्यय हुआ करता है। 'यह सुख' ऐसा प्रत्यय नहीं होता—यह शंका हो तो उत्तर देते हैं—'मैं सुखी' यह ज्ञान, सुखादिकों को अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यनिष्ठ अविद्या-कार्यत्व होने से होता हो सो नहीं, क्योंकि घटादिकों की तरह सुखादिकों का भी शुद्ध चैतन्य में ही अध्यास हुआ है तो 'मैं सुखी' यह प्रत्यय किस कारण से होता है ? उत्तर—जिसे जिस आकार के अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कारों के साथ अविद्याकार्यत्व होता है उसे तदाकार अनुभवविषयत्व होता है यही इसमें अनुगत नियामक है।
**विवरण—**सुखादिकों का अवच्छेदक जो शरीर तन्निष्ठत्वेन सर्वदा उनका अनुभव नहीं होता, क्योंकि 'मैं सुखी' यह आत्मनिष्ठत्वेन भी सुखादिकों का अनुभव होता दिखाई देता है। उसी प्रकार रजतादिकों का भी अन्तःकरण-साक्षी में अध्यस्तत्व स्वीकृत किये होने से 'अहं मनुष्यः' मैं मनुष्य--इस प्रत्यय के समान 'मैं रजत' या 'मैं सुखी' प्रत्यय के समान 'मैं रजतवान् हूँ' यह प्रत्यय होना चाहिए, परन्तु ऐसा प्रत्यय कभी भी क्यों नहीं होता ? यह उपर्युक्त शंका का आशय है।
उत्तर—'जिसमें जिसका अध्यास होता है उसका भान, तन्निष्ठ अविद्याकार्यत्व के कारण तन्निष्ठत्वेनैव हो' यह नियम नहीं हो सकता क्योंकि सुखादिकों को घटादिकों
१. 'मित्यहं रजतवानिति वा०'—इति पाठान्तरम्।
२. 'यत्र यदध्यासः तस्य तन्निष्ठाविद्याकार्यत्वप्रयुक्तं तन्निष्ठतायैव भानमि'ति नियमः न सम्भवति। सुखादेर्घटादिवत् शुद्धचैतन्याध्यस्तत्वेऽपि अहं सुखीतिप्रत्ययो भवति इत्याशयः।
३. नाना नियामकाभ्युपगमे गौरवात् अनुगतैकनियामकस्वीकार उचित इत्याशयः।
रजतस्य साक्षिणि अध्यासः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११३
के समान ही शुद्ध चैतन्याऽध्यस्तत्व होने पर भी 'मैं सुखी' यह प्रत्यय होता है। ग्रंथकार ने भी इसी आशय से उपर्युक्त शंका का समाधान किया है। सुखादिकों का 'मैं सुखी' इत्याकारक जो जो ज्ञान होता है, वह, अन्तःकरणावच्छिन्न जो चैतन्य और उसमें रहने वाली (तन्निष्ठ) जो अविद्या उसका कार्यत्व सुखादिकों को होने से नहीं होता है। क्योंकि घटादि व्यावहारिक पदार्थ जैसे शुद्ध चैतन्य में अध्यस्त हैं उसी तरह सुखादिक भी शुद्ध चैतन्य में ही अध्यस्त हैं, इस कारण सुखादिकों को अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यनिष्ठ अविद्याकार्यत्व है। परन्तु इसके होने से 'मैं सुखी' ज्ञान होता है—यह नहीं कहा जा सकता।
शंका—यदि ऐसा है तो घटादि, सुखादि और शुक्तिरूप्यादि इनमें से प्रत्येक को प्रतीतिविषयत्व होने के लिये पृथक्-पृथक् नियामक माने गये हैं या एक ही? इस प्रकार वादी के प्रश्न करने पर सिद्धान्ती कहता है घटादिकों को प्रतीति का विषयत्व प्राप्त होने के लिए पृथक् नियामक और सुखादिकों की प्रतीतिविषयत्व में पृथक् तथा शुक्तिरूप्यादिकों की प्रतीतिविषयत्व में भिन्न नियामक मानने में गौरव होता है, इसलिए घटादि, सुखादि और शुक्तिरूप्यादिकों में प्रतीतिविषयत्व प्राप्त होने के लिये सर्वानुगत एक नियामक ही मानना उचित है। इसी आशय का समाधान मूल में 'यस्य यदाकारा०' इत्यादि ग्रंथ से किया गया है। जिस विषय का जिस आकार से अनुभव होता है वह अनुभव, अन्तःकरण में वैसा ही संस्कार उत्पन्न करता है और उस संस्कार से युक्त हुई अविद्या का कार्यत्व जिसमें होता है, उसमें तदाकार अनुभवविषयत्व होता है—यही सर्वत्र अनुगत एक नियामक है। अब 'तथा च०' इत्यादि ग्रन्थ से उक्त नियामक की सर्वत्र योजना करते हैं—
तथा च इदमाकारानुभवाहित संस्कार-सहकृताऽविद्याकार्यत्वात् घटादेरिदमाकारानुभव-विषयत्वम् । अहमाकारानुभवाहित-संस्कारसहिताऽविद्याकार्यत्वादन्तःकरणादेरहं¹माकारानुभवविषयत्वम् । शरीरेन्द्रियादेरुभयविधानुभव²संस्कार³सहिताविद्याकार्यत्वादुभयविधानुभवविषयत्वम् । तथा चोभयविधो ऽनुभवः इदं शरीरमहं देहोऽहं मनुष्योऽहं ब्राह्मण इदं चक्षुरहं काण इदं श्रोत्रमहं बधिर इति ॥
१. 'मनुभवः'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'वाहितसं०'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'सहकृतावि०'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'द्यानुभ०'-इति पाठान्तरम् ।
८ वे० प०
११४ | वेदान्तपरिभाषा | [ विविधाध्यासिकप्रत्ययः
अर्थ—इस रीति से तीनों प्रकार के प्रतीतिविषयों में एक ही अनुगत नियामक होने से घटादिकों को 'इदम्' = यह, इस आकार के अनुभव से उत्पन्न हुई अविद्या का कार्यत्व है, इस कारण उन घटादिकों को इदमाकार के अनुभव का विषयत्व है। अन्तःकरणादिकों को अहमाकार के अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कारों से युक्त अविद्या का कार्यत्व होने से उन अन्तःकरणादिकों को अहमाकार अनुभव का विषयत्व है। शरीर इन्द्रियादिकों को दोनों प्रकार के अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कारों से युक्त अविद्या का कार्यत्व होने से उन शरीरेन्द्रियादिकों को दोनों प्रकार के अनुभव का विषयत्व है। उनका दो प्रकार से अनुभव कैसे आता है? यह पूछो तो बताते हैं—'यह शरीर' 'मैं देह' 'मैं मनुष्य' 'मैं ब्राह्मण' 'यह चक्षुरिन्द्रिय' 'मैं काना' 'यह श्रोत्रेन्द्रिय' 'मैं बहिरा' इस प्रकार शरीरेन्द्रियादिकों का दोनों प्रकार से अनुभव आता है—यह प्रसिद्ध है।
विवरण—घटादि बाह्य पदार्थ अविद्या के कार्य हैं। परन्तु उनका पहले जो अनुभव हुआ, वह 'यह घट, यह पट' इस प्रकार से हुआ। उस अनुभव से वैसे ही संस्कार हुए। उन्हीं संस्कारों से युक्त हुई अविद्या से घटादि पदार्थ रूप कार्य हुए। इस कारण इन बाह्य पदार्थों को इदमाकार अनुभव का विषयत्व है। अन्तःकरणादि भी अविद्या के कार्य हैं, परन्तु उनकी कारणभूत अविद्या, अहमाकारानुभव के उत्पन्न संस्कार से युक्त होती है इसलिए अन्तःकरणादि पदार्थ अहमाकारानुभव के विषय होते हैं। शरीर और इन्द्रियाँ भी अविद्या कार्य हैं परन्तु वे (कार्य) 'यह' और 'मैं' इन दोनों प्रकार के अनुभव से उत्पन्न संस्कारों से युक्त हुई अविद्या से उत्पन्न हुए हैं, इसलिये उनका दोनों प्रकार से अनुभव आता है। 'अहम्' अनुभव आत्मा को विषय करता है। और 'यह' अनुभव आत्मभिन्न पदार्थों को विषय करता है। इन अनुभवों से वैसे ही संस्कार होते हैं। उन संस्कारों से युक्त हुई अविद्या से पैदा होने वाले कार्य भी वैसे ही अनुभवों के विषय होते हैं। जैसे—यह घट, यह वृक्ष, यह पुष्प, यह मैं इत्यादि। परन्तु शरीर, इन्द्रियाँ इत्यादि देह और देहसम्बन्धी पदार्थ 'इदम्' और 'अहम्' इन दोनों प्रकार के संस्कारों से युक्त हुई अविद्या से पैदा होने के कारण उनका दोनों प्रकार से अनुभव होता है। जैसे यह शरीर, यह चक्षुरिन्द्रिय, यह श्रोत्रेन्द्रिय इत्यादि, और 'मैं देह, मैं मनुष्य, मैं ब्राह्मण, मैं काना, मैं बहिरा इत्यादि।
अब इसी उक्त नियामक की 'यह रजत' इस प्रकृत विषय में योजना कर के दिखाते हैं—
प्रकृते च प्रातिभासिक-रजतस्य प्रमातृचैतन्याभिन्नेद¹मंशावच्छिन्न-चैतन्य-निष्ठाऽविद्याकार्यत्वेऽपि इदं रजतमिति सत्यस्थली-
१. 'दमव०'—इति पाठान्तरम् ।
वृत्तिव्याप्तेरावश्यकता ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११५
येद¹मंशाकारानुभवाहित-संस्कारजन्यत्वादिदमाकारानुभव-विषयता, न त्वहं रजतमित्यहमाकारानुभव-विषयतेत्यनुसन्धेयम् ।।
**अर्थ—**प्रकृत में (शुक्ति रजत–इस उदाहरण में) प्रातिभासिक रजत, यद्यपि प्रमातृचैतन्य से अभिन्न जो इदमंशावच्छिन्न-चैतन्य, तन्निष्ठ अविद्या का कार्य है, तथापि व्यावहारिक सत्यरजत का 'यह रजत' इत्याकारक जो इदमंशाकार अनुभव, उससे उत्पन्न हुए जो संस्कार, उन संस्कारों से उत्पन्न होने के कारण (उसे) 'यह रजत' इस इदमाकार अनुभव का विषयत्व होता है। क्योंकि उस प्रातिभासिक रजत की उपादान जो अविद्या है, वह 'यह रजत' इस व्यावहारिक सत्य रजत के अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कार से युक्त रहती है। इसलिए उस प्रातिभासिक रजत का 'यह रजत' ऐसा अनुभव आता है। व्यावहारिक रजत का 'मैं रजत' ऐसा अनुभव आता है। व्यावहारिक रजत का 'मैं रजत' ऐसा अनुभव न आने से प्रातिभासिक रजत का भी 'मैं रजत' यह अनुभव नहीं होता—समझना चाहिये।
**विवरण—**प्रातिभासिक रजत, इदमंशावच्छिन्न-चैतन्यनिष्ठ अविद्या का कार्य है, और वह चैतन्य, प्रमातृचैतन्य से अभिन्न है। इस कारण वह, चैतन्यनिष्ठ अविद्या का कार्य है—यह सच है। तथापि उसके सहकारी कारण जो पूर्वसंस्कार हैं, वे 'अहं रजतम्' मैं रजत—इस अहमाकार अनुभव से उत्पन्न हुए नहीं हैं, क्योंकि व्यवहार में सत्य रजत का जो अनुभव आता है वह 'यह रजत' इस प्रकार आता है, 'मैं रजत' ऐसा नहीं। इसलिये 'यह रजत' इस अनुभव से उत्पन्न संस्कारों से युक्त अविद्या के कार्यरूप प्रातिभासिक रजत को नियमेन इदमाकारानुभव-विषयत्व ही रहता है। अहमाकारानुभव-विषयत्व नहीं।
इस पर सिद्धान्त्येकदेशी की शंका और सिद्धान्ती के द्वारा उसका निरसन—
नन्वेवमपि मिथ्यारजतस्य साक्षात्साक्षि-सम्ब²न्धितया भानसम्भवे रजतगोचर-ज्ञानाभासरूपाया³ अविद्यावृत्तेरभ्युपगमः किमर्थः ? इति चेत् । न⁴। स्वगोचर-वृत्त्युपहित-चैतन्यभिन्न-सत्ताकत्वाभावस्य विषयापरोक्ष⁵रूपतया रजतस्यापरोक्षत्वसिद्धये तदभ्युपगमात् ।
१. 'दमाका०'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'म्बद्धत०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'पाऽविद्या०'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'उच्यते०'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'त्वरूप०'—इति पाठान्तरम् ।
११६ वेदान्तपरिभाषा [ रजतज्ञाने गुरुमतप्रवेशशंका
अर्थ—ऐसा प्रतिपादित करने पर भी मिथ्या रजत का साक्षात् साक्षि-सम्बन्धित्वेन भान हो सकता है, तब रजत-विषयक अज्ञानाभासरूप अविद्या-वृत्ति का स्वीकार किस लिए ? उत्तर—अविद्यावृत्ति का स्वीकार बिना किये मिथ्या रजत का भान संभव ही नहीं, क्योंकि स्वविषय जो वृत्ति उसमें उपहित जो चैतन्य, उससे रजत की भिन्न सत्ता का न होना इसी को विषयापरोक्षरूपत्व होने से रजत का अपरोक्षत्व सिद्ध होने के लिए उस वृत्ति का स्वीकार करना पड़ता है ।
विवरण—यहाँ पर अद्वैत सिद्धान्तियों में से ही एकदेशी शंका करता है—आपके कथनानुसार शुक्तिरूप्य को इदमाकारानुभवविषयत्व भले ही रहे ( प्रातिभासिक रजत 'यह' आकार से अनुभव में भले ही आवे ) परन्तु तन्निमित्त उस रजत को विषय करने वाली अविद्या-वृत्ति का आश्रय करने का क्या प्रयोजन ? क्योंकि उस शुक्तिरूप्य का साक्षात् अनावृत साक्षी से सम्बन्ध हुआ होने से उसका अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ज्ञान ) होना शक्य है ।
समाधान—साक्षी पर आरोपित रजत की सत्ता, यद्यपि साक्षिचैतन्य से भिन्न नहीं है तथापि उस रजत का अपरोक्षत्व संभव नहीं होता । क्योंकि साक्षिचैतन्य में रजताकार वृत्त्युपहितत्व नहीं होता ( साक्षिचैतन्य, रजत विषयवृत्तिरूप उपाधि से युक्त नहीं रहता ) इसलिये रजत का अपरोक्षज्ञान होने के लिए अविद्यावृत्ति को अवश्य मानना चाहिए । 'न०' इत्यादि समाधान ग्रंथ का यही आशय है । विषयाकारवृत्त्युपहित चैतन्य से विषयचैतन्य की अभिन्न सत्ता का होना ही विषय का अपरोक्षत्व है । इसलिए प्रातिभासिक रजत का अपरोक्षत्व ( प्रत्यक्षत्व ) सिद्ध होने के लिए अविद्यावृत्ति को अवश्य ही मानना चाहिये—यह भाव है ।
शंका—आपके इस समाधान पर "एक ओर ध्यान दें तो दूसरी ओर का अनुसंधान छूट जाता है" अथवा 'एक को सम्हालने जायें तो दूसरा निकल जाता है' यह न्याय प्राप्त होता है, इस आशय से वादी की शंका और उसका सिद्धान्ती के द्वारा समाधान—
नन्विदंवृत्ते रजताकारवृत्तेश्च प्रत्येकमेकैक-विषय^१त्वे ^२गुरुमतवद्-विशिष्टज्ञानानभ्युपगमे कुतो भ्रमज्ञानसिद्धिरिति चेत् । न । वृत्ति-
१. 'यकत्वे०'-इति पाठान्तरम् ।
२. गुरुमतवत् प्रभाकरमतवत् । प्रभाकरमते 'इदं रजतम्' इति नैकं ज्ञानम् । अपितु इदमिति पुरोवर्तिद्रव्यमात्रविषयकं प्रत्यक्षम्, रजतमिति रजतविषयकं स्मरणम् । इति ग्रहण-स्मरणे एवं अगृहीत भेदे प्रवृत्तिप्रयोजयतः । इयांस्तु विशेषः—प्राभाकरमते ग्रहण-स्मरणात्मकमितिज्ञानद्वयम् । युष्मन्मते अन्तःकरणवृत्तिः आविद्यकवृत्तिश्चेति । एव चाख्यातिमतप्रवेशापत्तिः । अविद्यातत्परिणामादिकल्पनापेक्षया क्लृप्तसंस्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वकल्पनस्यैव युक्तत्वादिति शंकाकर्तुराशयः ।