वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनिर्वचनीयरजतोत्पत्तिः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०५
चैतन्यं चाभिन्नं भवति । ततश्च प्रमातृचैतन्याभिन्न-विषयचैतन्य-निष्ठा शुक्तित्वप्रकारिकाऽविद्या चाकचिक्यादिसादृश्य-सन्दर्शन-समुद्-बोधित रजतसंस्कार-सध्रीचीना काचादिदोषमवहिता रजतरूपार्थाकारेण रजत-ज्ञानाभासाकारेण च परिणमते$^१$ ॥
**अर्थ—**काच, कामला आदि नेत्रदोषों से दूषित नेत्रवाले व्यक्ति के चक्षुरिन्द्रिय का सामने रहने वाले द्रव्य के साथ संयोग-सन्निकर्ष हो जाने से 'इदमाकार' = 'यह' इस आकार की 'चाकचिक्यकार' = चकचकित आकार की कोई सी ( विशिष्ट ) अन्तःकरणवृत्ति उदित होती है, और उस वृत्ति में 'इदम्' = यह ( इस विषय ) से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य-प्रतिबिम्बित होता है। इस प्रकार उस उत्पन्न हुई वृत्ति में चैतन्य के प्रतिबिम्बित होनेपर उपर्युक्त 'तडागोदक न्याय से वृत्ति बाहर पड़ती है जिससे इदमवच्छिन्न-चैतन्य, वृत्यवच्छिन्न-चैतन्य और प्रमातृचैतन्य--यह त्रिविध चैतन्य अभिन्न हो जाता है ( विषयावच्छिन्न = प्रमेयचैतन्य, वृत्यवच्छिन्न = प्रमाणचैतन्य, अन्तःकरणावच्छिन्न = प्रमातृचैतन्य--इनका अभेद होता है )।
इस प्रकार त्रिविध-चैतन्य का अभेद होनेपर प्रमातृचैतन्याभिन्न जो विषयचैतन्य, तन्निष्ठ जो शुक्तित्वप्रकारक-अविद्या, वही रजतरूप अर्थाकार से और रजतज्ञानाकार से परिणत होती है ( परिणाम को प्राप्त होती है ) और चाकचिक्यादि ( चकचकितपना वगैरह ) रूपसादृश्य के दर्शन से जागृत होनेवाले रजत-संस्कार रूप सामग्री का ही उस अविद्या को साहाय्य रहता है और काच-कामलादि दोष भी उस अविद्या में होते हैं, जिससे वह—रजत ( अविद्या ) रूप अर्थाकार से और रजतज्ञानाभासाकार से परिणत होती है।
**विवरण—**प्रातिभासिक रजत को पैदा करनेवाली रजत-सामग्री, लौकिक रजत की सामग्री से विलक्षण ही होती है। वह कौन-सी ? तो अविद्या। परन्तु आकाशादि-भूतों की उपादानभूत-अविद्या से यह 'अविद्या' विलक्षण है। आकाशादिकों की उपादानभूत-'मूला अविद्या' केवल चिन्मात्र के आश्रय से रहती है। चिन्मात्र ही उसका विषय रहता है और वह निर्विकल्पक ज्ञान से निवृत्त हो जाती है। परन्तु यह 'तूला
१. प्रातिभासिकोत्पत्तौ दोष-सम्प्रयोग-संस्कारादीनि निमित्तानि यानि तान्येव उपादानस्याज्ञानस्यापीति समाननिमित्तत्वात् कथमविद्यायाः कदाचित् रजतपरिणामः, कदाचिच्च रङ्गपरिणामः ? तत्रेदं समाधानम्—यत्पुरुषीया या अविद्या यादृशसंस्कार-सहिता भवति, सा तत्पुरुषसन्निधौ तदाकारेण परिणमते, नान्याकारेण। तथाचेष्टसिद्धि-काराः—"यस्याज्ञानं भ्रमस्तस्य भ्रान्तः सम्यक् च वेत्ति सः।" अतएव कस्यचित् एकस्यां शुक्तौ रजतभ्रमः कस्यच्चि रङ्गभ्रमो भवति।