वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
अनिर्वचनीयरजतोत्पत्तिः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०५
चैतन्यं चाभिन्नं भवति । ततश्च प्रमातृचैतन्याभिन्न-विषयचैतन्य-निष्ठा शुक्तित्वप्रकारिकाऽविद्या चाकचिक्यादिसादृश्य-सन्दर्शन-समुद्-बोधित रजतसंस्कार-सध्रीचीना काचादिदोषमवहिता रजतरूपार्थाकारेण रजत-ज्ञानाभासाकारेण च परिणमते$^१$ ॥
**अर्थ—**काच, कामला आदि नेत्रदोषों से दूषित नेत्रवाले व्यक्ति के चक्षुरिन्द्रिय का सामने रहने वाले द्रव्य के साथ संयोग-सन्निकर्ष हो जाने से 'इदमाकार' = 'यह' इस आकार की 'चाकचिक्यकार' = चकचकित आकार की कोई सी ( विशिष्ट ) अन्तःकरणवृत्ति उदित होती है, और उस वृत्ति में 'इदम्' = यह ( इस विषय ) से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य-प्रतिबिम्बित होता है। इस प्रकार उस उत्पन्न हुई वृत्ति में चैतन्य के प्रतिबिम्बित होनेपर उपर्युक्त 'तडागोदक न्याय से वृत्ति बाहर पड़ती है जिससे इदमवच्छिन्न-चैतन्य, वृत्यवच्छिन्न-चैतन्य और प्रमातृचैतन्य--यह त्रिविध चैतन्य अभिन्न हो जाता है ( विषयावच्छिन्न = प्रमेयचैतन्य, वृत्यवच्छिन्न = प्रमाणचैतन्य, अन्तःकरणावच्छिन्न = प्रमातृचैतन्य--इनका अभेद होता है )।
इस प्रकार त्रिविध-चैतन्य का अभेद होनेपर प्रमातृचैतन्याभिन्न जो विषयचैतन्य, तन्निष्ठ जो शुक्तित्वप्रकारक-अविद्या, वही रजतरूप अर्थाकार से और रजतज्ञानाकार से परिणत होती है ( परिणाम को प्राप्त होती है ) और चाकचिक्यादि ( चकचकितपना वगैरह ) रूपसादृश्य के दर्शन से जागृत होनेवाले रजत-संस्कार रूप सामग्री का ही उस अविद्या को साहाय्य रहता है और काच-कामलादि दोष भी उस अविद्या में होते हैं, जिससे वह—रजत ( अविद्या ) रूप अर्थाकार से और रजतज्ञानाभासाकार से परिणत होती है।
**विवरण—**प्रातिभासिक रजत को पैदा करनेवाली रजत-सामग्री, लौकिक रजत की सामग्री से विलक्षण ही होती है। वह कौन-सी ? तो अविद्या। परन्तु आकाशादि-भूतों की उपादानभूत-अविद्या से यह 'अविद्या' विलक्षण है। आकाशादिकों की उपादानभूत-'मूला अविद्या' केवल चिन्मात्र के आश्रय से रहती है। चिन्मात्र ही उसका विषय रहता है और वह निर्विकल्पक ज्ञान से निवृत्त हो जाती है। परन्तु यह 'तूला
१. प्रातिभासिकोत्पत्तौ दोष-सम्प्रयोग-संस्कारादीनि निमित्तानि यानि तान्येव उपादानस्याज्ञानस्यापीति समाननिमित्तत्वात् कथमविद्यायाः कदाचित् रजतपरिणामः, कदाचिच्च रङ्गपरिणामः ? तत्रेदं समाधानम्—यत्पुरुषीया या अविद्या यादृशसंस्कार-सहिता भवति, सा तत्पुरुषसन्निधौ तदाकारेण परिणमते, नान्याकारेण। तथाचेष्टसिद्धि-काराः—"यस्याज्ञानं भ्रमस्तस्य भ्रान्तः सम्यक् च वेत्ति सः।" अतएव कस्यचित् एकस्यां शुक्तौ रजतभ्रमः कस्यच्चि रङ्गभ्रमो भवति।
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अविद्या' शुक्त्यवच्छिन्न-चैतन्य के आश्रय से रहती है। रजत से भिन्न जो शुक्ति, तन्निष्ठ जो शुक्तित्व वही उसका विषय रहता है, और यह तूला-अविद्या, सविकल्पक-ज्ञान से निवृत्त होती है। तूला-विद्या और मूला-विद्या में यही भेद है।
मूल में 'अविद्या, रजतरूप विषय के आकार से और रजत-ज्ञानाभासाकार से परिणाम को प्राप्त होती है,' यह बताकर तूला-विद्या ही प्रातिभासिकरजत की उत्पादिका है, और उस अविद्या की ही प्रक्रिया इस ढंग से बतायी है—'काच' एक नेत्र रोग है, जिससे दृष्टि मंद होती है। उसी प्रकार कामला या ऐसे ही अन्य दोषों से जिसके नेत्र दूषित हुए हैं ऐसा व्यक्ति जब सामने सीप जैसे चमकते पदार्थ को देखता है तब उससे उसके मन में 'यह' (इस) आकार की अन्तःकरणवृत्ति पैदा होती है। सीप के चमकीलेपन के कारण, 'यह' इस अन्तःकरणवृत्ति में वह चमकीलापन भी प्रतीत होता है। इस प्रकार देखनेवाले व्यक्ति के सदोष चक्षुरिन्द्रिय का सामने स्थित द्रव्य के साथ संयोग होकर 'इदम्' विषय से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य प्रतिबिम्बित होता है। उसके प्रतिबिम्बित होने पर वह वृत्ति बाहर निकलती है। तब प्रमेयचैतन्य, प्रमाणचैतन्य, प्रमातृचैतन्य का अभेद हो जाता है। इस विषय में पहिले—'तडागोदक, नाली के मार्ग से क्षेत्र में पहुंचकर क्षेत्राकार हो जाता है'—दृष्टान्त दिया ही है। उसके बाद प्रमातृचैतन्याभिन्न जो विषयचैतन्य, तन्निष्ठ जो शुक्तित्वप्रकारक अविद्या, वह रजत-रूप विषयाकार में और रजतज्ञानाकार में परिणत होती है।
आपने अविद्या को ही आकाशादि प्रपंच का उपादान माना है, किन्तु अब इस कथन से आपकी प्रतिज्ञा-हानि होती है। यह शंका यदि कोई करे तो उसके निवारणार्थ ही तूलाविद्या में १—प्रमातृचैतन्याभिन्न = विषयचैतन्यनिष्ठ और २ शुक्तित्व-प्रकारक ये दो विशेषण जोड़े गये हैं। उससे चैतन्यमात्राश्रित = चिन्मात्रविषय और निर्विकल्पक-ज्ञान से निवर्त्य ऐसी मूलाविद्या की निवृत्ति होती है।
शंका—यहाँ तूलाविद्या सदैव ही भ्रान्त विषय और भ्रान्तविषयज्ञान के आकार से क्यों परिणत नहीं होती ?
समाधान—निमित्तकारण का अभाव होने से वह सदैव उस आकार से परिणत नहीं होती। पूर्वदृष्ट रजत से उत्पन्न हुआ रजतसंस्कार यद्यपि सर्वदा विद्यमान रहता है तथापि उसका जागृत होना, अविद्या के पूर्वोक्त परिणाम में निमित्त है। चाकचिक्यादि सादृश्य-दर्शन से वह उत्पन्न होता है। सामने पड़े हुए पदार्थ के सादृश्यदर्शन से रजत-संस्कार जागृत हो उठते हैं और वे जागृत हुए रजत-संस्कार ही तूलाविद्या के परिणाम में निमित्त होते हैं अर्थात् उस अविद्या को जब जागृत संस्काररूप सामग्री की सहायता मिलती है तब वह पूर्वोक्त प्रकार से परिणत होती है और जब उसे सामग्री की सहायता नहीं मिलती तब वह परिणत नहीं होती।
परिणामविवर्तलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०७
शंका—शुक्ति में चाकचिक्यादि रजत-सादृश्य का दीखना और नीलपृष्ठ त्रिकोणता आदि का न दीखना इसमें क्या निमित्त है ?
समाधान—उस अविद्या में द्रष्टा के काचादिनेत्रदोषों का सान्निध्य रहना ही नीलपृष्ठादिकों के अदर्शन में निमित्त है।
इस प्रकार नेत्रगत कांचादि दोषों से युक्त हुई तूलाविद्या, प्रातिभासिक रजताकार से और उसके ज्ञानकार से (रजताकार वृत्ति से) परिणत होती है। क्योंकि 'ज्ञान' शब्द का अर्थ वृत्ति है।
अब परिणाम का अर्थ बताते हैं—
'परिणामो नाम उपादान समसत्ताक² कार्यापत्तिः विवर्तो नाम उपादान विषमसत्ताक-कार्यापत्तिः। प्रातिभासिकं रजतं-चाविद्यापेक्षया परिणामः, चैतन्यापेक्षया विवर्त इति चोच्यते। अविद्यापरिणामरूपं च तद्रजतमविद्याधिष्ठाने इदमवच्छिन्न-चैतन्ये वर्तते। अस्मन्मते सर्वस्यापि कार्यस्य स्वोपादानाविद्याधिष्ठानाश्रितत्वनियमात्॥
अर्थ—उपादान की जैसी सत्ता हो ठीक वैसी सत्ता से युक्त कार्य की उसे (उपादान को) प्राप्ति होना—परिणाम कहलाता है। और उसकी (उपादान की) सत्ता की अपेक्षा विषमसत्ता से युक्त कार्य की प्राप्ति होना विवर्त कहलाता है। प्रातिभासिक रजत रूप कार्य, अविद्या की अपेक्षा से (अविद्या का) परिणाम है और वही
१. रजतमविद्या-परिणाम इति मन्यते चेत् रजतं ब्रह्मविवर्तो न स्यात्, ब्रह्मपरिणामस्यैव ब्रह्मविवर्तत्वात् विवर्त-परिणामयोरभेदात्, इत्याशङ्कायामुच्यते—'परिणामो-नामे'-ति। एवञ्च विवर्त-परिणामयोर्भेदात् रजतस्य न ब्रह्मविवर्तत्वहानिः।
२. यदा उपादानोपादेययोः एकरूपैव सत्ता, तदा समसत्ता भवति। एवञ्च 'स्वोपादानसत्तासमसत्ताकत्वे सति कार्यत्वम्परिणामत्वम्। अत्र 'स्व' पदमुपादेयपरम्बोध्यम्। ननु शुक्तिरूप्यस्य अविद्यापरिणामत्वं कथमुपादानस्य व्यावहारिकत्वात् उपादेयस्य च प्रातिभासिकत्वात्। तत्रोच्यते—पारमार्थिकसत्त्वं सत्त्वेन व्यवहारविषयत्वं चेति सत्त्वद्वैविध्यमाश्रित्य समसत्ताकत्वोपपत्तिः। तथाचोक्तमद्वैतसिद्धौ—जगदुपादानत्वोपपत्तौ—'समानसत्ताकत्वञ्च रूप्यस्थले सत्त्वद्वैविध्येन वा ब्रह्माज्ञानेतर-ज्ञानबाध्यत्वरूपप्रातिभासिकत्वमादाय वा उपपद्यते।' तथा च शुक्तिरजतादेः स्वोपादानसत्ता-समानसत्ताकत्वात् परिणामत्वम्। ननु अविद्यायां तादात्म्यसम्बन्धेन वर्तमानस्य अविद्यापरिणामस्य रजतस्य, चैतन्ये तत्सम्बन्धेन अवर्तमानत्वात् चैतन्योपादानकत्वासम्भवात् कथं चैतन्यविवर्तत्वं रजतस्येति चेत् अविद्यापरिणामस्य तदधिष्ठानाश्रितत्वनियमान्न विवर्तत्वहानिः।
१०८ | वेदान्तपरिभाषा | [ परिणामविवर्तलक्षणम्
रजत, चैतन्य की अपेक्षा से (चैतन्य का) विवर्त है—ऐसा कहा जाता है। अविद्या का परिणामरूप वह रजत अविद्याधिष्ठानभूत इदमवच्छिन्न चैतन्य में (विषयावच्छिन्न चैतन्य में) रहता है। क्योकि हमारे मत में सभी कार्य अपनी उपादानभूत अविद्या के अधिष्ठानभूत-चैतन्य के आश्रित होते हैं—यह नियम है (कोई भी कार्य अपने उपादान कारण के अधिष्ठान के आश्रय से रहता है)।
विवरण—जिस कारण से अभिन्नतया (भिन्न न होकर) कार्य उत्पन्न होता है, वह, उसका (कार्य का) उपादान कारण कहा जाता है। घटरूपकार्य, मृत्तिका से अभिन्न रहकर ही उत्पन्न होता है, इसलिये मृत्तिका, घट की उपादान-कारण है। जिस कार्य की सत्ता, अपने उपादान-कारण की सत्ता जैसी ही होती है, ऐसे कार्य की प्राप्ति होना (कारण का, समसत्ताक कार्य के आकार से पैदा होना) परिणाम है। सत्ता त्रिविध (तीन प्रकार की) होती है, पारमार्थिकी, व्यावहारिकी, और प्रातिभासिकी। ब्रह्म की सत्ता पारमार्थिकी होती है। आकाशादि प्रपंच की सत्ता व्यावहारिकी है। और शुक्तिरजतादि भ्रान्त पदार्थों की सत्ता, प्रातिभासिकी है। पारमार्थिकी-सत्ता नित्य (काल से अनवच्छिन्न) होती है। व्यावहारिकी-सत्ता केवल स्थितिकाल में (पदार्थ की उत्पत्ति से पूर्व और नाश के अनन्तर नहीं होती) होती है। कल्प के आरम्भ से उसके अन्त तक जो काल उसे व्यवहारकाल कहते हैं, और उस काल में जो सत्ता, उसे व्यवहारिकी सत्ता कहते हैं। शुक्ति पर भासित होने वाला रजत, रज्जु पर भासित होने-वाला सर्प, (ये) प्रातिभासिक पदार्थ हैं, इनकी सत्ता उस प्रतिभासकाल में ही रहती है। अधिष्ठान के ज्ञान से उसका बाध होता है, इसलिये वह प्रातिभासिकी सत्ता है।
दूध, व्यावहारिक पदार्थ है, वह व्यावहारिकी सत्ता से युक्त है, उसे दही रूप कार्य का आकार प्राप्त होता है। उस दही रूप कार्य की सत्ता भी व्यावहारिकी ही होती है, इसलिए दूध रूप उपादान कारण से 'दही' रूप समसत्ताक कार्य उत्पन्न होता है। इसलिये वह दूध का परिणाम है। इस लक्षण में कार्य को 'समसत्ताक' विशेषण जोड़-कर विवर्त में अतिव्याप्ति का वारण किया जाता है। अथवा व्यावहारिकी सत्ता से युक्त तन्तुओं को व्यावहारिकी सत्ता से युक्त पटभाव की प्राप्ति होना—परिणाम है। इस परिणाम से विवर्त पृथक् है। परिणाम के समान विवर्त भी कार्य है। इसलिये परिणाम का लक्षण कहने के अनन्तर प्रसंग प्राप्त विवर्त का भी लक्षण यहीं पर बताया है। विवर्त उसे कहते हैं—उपादान की सत्ता से जिसकी सत्ता विषम है, ऐसे कार्य की उत्पत्ति।
विवर्त में अतिव्याप्ति के वारणार्थ परिणाम के लक्षण में जैसे 'समसत्ताक' विशेषण दिया है वैसे ही परिणाम में अतिव्याप्ति के वारणार्थ विवर्त के लक्षण में 'विषम सत्ताक' विशेषण दिया है। परन्तु प्रातिभासिक-रजतादिकों में परिणामत्व और विवर्तत्व दोनों धर्म रहते हैं—यह सूचित करने के लिये ही प्रातिभासिक रजत, अविद्या का परिणाम और चैतन्य का विवर्त है—ऐसा मूल में कहा है। जैसे तन्तु के परिणामरूप पट
रजतस्य साक्षिणि अध्यासः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०९
को तन्तुदेशत्व (जहाँ तन्तु रहते हैं वहीं पर पट रहता है) है, वैसे ही अविद्या के परिणाम-रूप शुक्तिरूप्य को अविद्यादेशत्व ( जहाँ अविद्या रहती है वहीं वह शुक्तिरजत रहता है) है । अविद्या, चैतन्यनिष्ठ होती है इसलिये शुक्तिरूप्य भी चैतन्यनिष्ठ होता है । इस आशय से मूल में अविद्यापरिणामरूप शुक्तिरजत, अविद्या के अधिष्ठानरूप इदम-वच्छिन्न चैतन्य में रहता है--कहा है । इस वाक्य से निम्नलिखित आशंका का निरसन किया गया है--
शंका--अविद्यापरिणामरूपरजत, अविद्या में तादात्म्य सम्बन्ध से रहता है, तब अविद्या में तादात्म्य सम्बन्ध से रहनेवाले रजत को चैतन्योपादानत्व ( चैतन्य, उसका उपादान है ) नहीं बनता । जब कि चैतन्य में, रजत, अविद्यासम्बन्ध से रहता है तब 'उसे उपादान-विषमसत्ताक कार्यापत्तिरूप विवर्तत्व' कैसे ?
समाधान--अविद्यापरिणामरूप रजत, अविद्याधिष्ठान के आश्रय से रहने के कारण उसे विवर्तत्व हो जाता है क्योंकि 'अविद्यापरिणामरूप रजत, अविद्या के अधिष्ठानभूत चैतन्य के आश्रय से रहता है' यह नियम है । क्योंकि हमारे मत में सभी कार्यों में, उन कार्यों के उपादानभूत अविद्या के अधिष्ठान का आश्रितत्व नियम से रहता है । कोई भी कार्य अपने उपादान कारण के अधिष्ठान के आश्रय से रहता है । इसलिये प्रातिभासिक रजत, अविद्या का परिणाम है और चैतन्य का विवर्त है । अब कोई दोष नहीं है इस समाधान पर पुनः शंका और उसका समाधान—
'ननु चैतन्यनिष्ठ¹स्य रजतस्य कथमिदं रजतमिति पुरोवर्ति-तादात्म्यम् ? उच्यते । यथा न्यायमते आत्मनिष्ठस्य सुखादेः शरीर-निष्ठत्वेनोपालम्भः, शरीरस्य सुखाद्यधिकरणतावच्छेदकत्वात् । तथा चैतन्यमात्रस्य रजतं प्रत्यधिष्ठानतया इदमवच्छिन्नचैतन्यस्य तदधिष्ठा-नत्वेन इदमॊऽवच्छेदकतया रजतस्य पुरोवर्ति संसर्गप्रत्यय³ उपपद्यते ।
१. चैतन्यनिष्ठस्य चैतन्याश्रितस्य चैतन्ये तादात्म्येन उत्पन्नस्येत्यर्थः । 'यत् यत्र तादात्म्येन उत्पद्यते तत् तदभिन्नतया तदाश्रिततया च प्रतीयते' इति नियमः । प्राति-भासिकं रजतं चैतन्ये तादात्म्येन उत्पद्यते चेत् चैतन्याऽभिन्नतया चैतन्याश्रिततया च 'चैतन्यं रजतमिति प्रतीयेत । किन्तु न तथा प्रतीयते, अपि तु 'इदं रजतमिति इदन्तादात्म्य-प्रतीतिर्भवति । अन्योपादेयस्य अन्यतादात्म्याऽयोगः । अतः प्रातिभासिकस्य रजतस्य चैतन्यतादात्म्यमेवोचितं, न इदन्तादात्म्यमिति शङ्काकर्तुराशयः ।
२. 'ष्ठरजः' इति पाठान्तरम् ।
३. पुरोवर्तिसंसर्ग-प्रत्ययः इदं तादात्म्यप्रत्ययः । यथा सुखाधिकरणस्य आत्मनः अवच्छेदके शरीरे सुखस्य संसर्गप्रत्ययो भवति, तथैव रजताधिकरणस्य अवच्छेदके इद-मिति रजतस्य तादात्म्यप्रत्ययो भवितुमर्हति ।
११० वेदान्तपरिभाषा [ रजतस्य साक्षिणि अध्यासः
**अर्थ—शंका—**चैतन्यनिष्ठ रजत का 'यह रजत' इस प्रकार आगे पड़ी हुई शुक्ति (सीप) से तादात्म्य कैसे हो सकता है ? इस शंका का समाधान कहा जाता है—जैसे न्याय के मत में आत्मनिष्ठ सुख-दुःखादि गुणों का शरीरनिष्ठत्व से ( वे शरीर में स्थित हैं ) प्रत्यय होता है, क्योंकि शरीर सुखादिकों की अधिष्ठानता का अवच्छेदक होता है। वैसे ही चैतन्यमात्र ( शुद्ध = निरुपाधिक चैतन्य ) रजत का अधिष्ठान नहीं होता ( शुद्ध चैतन्य उसका अधिष्ठान नहीं बन सकता ), तथापि इदमवच्छिन्न (विषयावच्छिन्न) चैतन्य, प्रातिभासिक रजत का अधिष्ठान हो सकता है। इसलिये वह इदमवच्छिन्न चैतन्य 'इदम्' विषय का अवच्छेदक है जिससे उस प्रतिभासिक रजत का पुरोवर्ति ( आगे पड़ी हुई ) शुक्ति से संसर्ग होकर वैसा संसर्ग प्रत्यय ( तादात्म्य का अनुभव ) आ सकता है।
**विवरण—**सभी कार्य, अविद्याधिष्ठान चैतन्याश्रित होता है—माना जाय तो प्रातिभासिक रजत का सामने पड़ी हुई शुक्ति से तादात्म्यप्रत्यय होना अनुपपन्न होगा ( भ्रान्त रजत का शुक्ति में 'यह रजत' इत्याकारक जो तादात्म्यप्रत्यय होता है वह नहीं बनेगा ) इस आशय से यहाँ 'ननु' ग्रन्थ से शंका की है।
इस शंका का आशय यह है—द्रष्टा व्यक्ति के सामने भूतल पर स्थित तन्तुओं में विद्यमान पट का प्रत्यक्षज्ञान जब होता है तब 'अब यहाँ यह पट है' यह प्रत्यय जैसे होता है वैसे ही चैतन्यनिष्ठ अविद्या में स्थित शुक्ति-रजत का 'चैतन्य में रजत' यह प्रत्यय होना चाहिए था, परन्तु 'यहाँ यह रजत है' ऐसा देह के बाहर प्रत्यय होता है,—वह ठीक नहीं है। क्योंकि चैतन्य के सर्वव्यापी होने से उसका 'इह' यहाँ ( पुरोवर्ती प्रदेश में ) प्रत्यय होना उचित नहीं है।
'उच्यते' इत्यादि ग्रन्थ से शंका का समाधान किया जाता है—अविद्या का परिणाम अविद्या के अधिष्ठानभूत चैतन्य के आश्रय से जैसे रहता है ( अविद्यापरिणाम को अविद्याधिष्ठानाश्रितत्व = अविद्या का अधिष्ठान चैतन्य आश्रय है और अविद्या का परिणाम आश्रित है इस प्रकार चैतन्य और परिणाम में आश्रयाश्रयिभाव = आश्रय भाव, जैसे रहता है ) वैसे ही चैतन्याध्यस्त ( चैतन्य पर आरोपित ) रजतादिकों की तदवच्छेदक पुरोवर्ति पदार्थ से तादात्म्य-प्रतीति हो सकती है। इस विषय में न्यायशास्त्र का एक दृष्टान्त दिया गया है—
नैयायिक सुखादि धर्मों को आत्मनिष्ठ मानते हैं। उनके कथनानुसार सुख, दुःख, कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्म आत्मा के हैं। परन्तु वे सुखादि आत्मनिष्ठ धर्म भी, शरीरनिष्ठ से लगते हैं ( शरीरनिष्ठत्वेन ) उनका अनुभव होता है। मेरा शरीर सुखी, इस प्रकार शरीरनिष्ठत्व के कारण देह को आत्मगत-सुखाद्युपलब्धि का अवच्छेदकत्व जैसे होता है, वैसे ही 'इदम्' इस पुरोवर्ती विषय को आत्मगत रजताध्यास का अवच्छेदकत्व है। उससे चैतन्याध्यस्त रजत का पुरोवर्ती शुक्ति में 'यह रजत' ऐसा प्रत्यय
रजतस्य साक्षिणि अध्यासः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १११
आ सकता है । क्योकि शुद्ध चैतन्य, आरोपित रजत का अधिष्ठान बन नहीं सकता (उस शुद्ध-चैतन्य में रजत का अधिष्ठान बनने की योग्यता ही नहीं है) इसलिए 'इदमवच्छिन्न' चैतन्य रजत का अधिष्ठान होने से शुक्ति के इदमंश को उसका अवच्छेदकत्व है, जिससे आरोपित रजत का पुरोवर्ती सीप से संसर्ग हुआ है ऐसा प्रत्यय हो सकता है ।
शंका—इदमवच्छिन्न चैतन्य में अध्यस्त रजतादि, साक्षी में अध्यस्त नहीं होता, और उसके, साक्षी में अध्यस्तत्व न होने से उस आरोपित रजतादि को केवल साक्षिवेद्यत्व और सुखादिकों के समान अनन्यवेद्यत्व है—यह साम्प्रदायिकों का कथन कैसे उपपन्न होगा ? 'तस्य च' आदि ग्रन्थ से इस शंका का समाधान कहते हैं—
तस्य च विषयचैतन्यस्य तदन्तःकर¹णोपहितचैतन्याभिन्नतया विषयचैतन्याध्यस्तमपि रजतं साक्षिण्यध्यस्तं केवलसाक्षिवेद्यं सुखादिवदनन्यवेद्यमिति चोच्यते² ।
अर्थ— और उस विषयचैतन्य का तद्विषय—अन्तःकरणोपहित चैतन्य से अभिन्नत्व होने से ( वे दोनों चैतन्य अभिन्न = एकरूप होने से ) विषय चैतन्य में अध्यस्त होता हुआ भी रजत 'साक्षी' में अध्यस्त है । वह केवल साक्षिवेद्य है और सुखादिकों के समान अनन्यवेद्य है—ऐसा कहा जाता है ।
विवरण— यहाँ पर शङ्का का आशय इस प्रकार है—पुरोवर्ती शुक्तिकादि विषय का 'इदम्' आकार वाले (शुक्ति के) अंश से अवच्छिन्न हुए विषयचैतन्य में रजतादिकों का अध्यास होता है । साक्षिचैतन्य में रजतादिकों का अध्यास नहीं होता । अर्थात् विषयचैतन्य में अध्यस्त हुए रजत को साक्षी में अध्यस्तत्व न होने से उसे केवल साक्षिवेद्यत्व है (केवल साक्षिचैतन्य ही उसे जानता है) और सुखादिकों के समान उस अध्यस्त रजतादि को भी अन्यवेद्यत्व नहीं (जैसे सुखादि, साक्षिचैतन्य से अन्य वृत्त्यादि-चैतन्य से वेद्य नहीं रहते वैसे ही अध्यस्त-रजतादि भी अन्यवेद्य नहीं) होते—यह पञ्चपादिकाचार्य का कथन कैसे उपपन्न होता है ?
१. 'णचैत ०'-इति पाठान्तरम् ।
२. अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यस्य अन्तःकरणोपहित चैतन्यस्य च अभेदात् इदमवच्छिन्नचैतन्यस्य अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यस्य च अभेदे इदमवच्छिन्नचैतन्यान्तःकरणोपहितचैतन्यरूपयोर्विषयसाक्षिणोरपि अभेदो भवति । तेन इदमवच्छिन्नचैतन्याध्यस्तं रजतं साक्षिणि अपि अध्यस्तं तादात्म्येन सम्बद्धं भवति, इदमवच्छिन्न-चैतन्यं साक्षिचैतन्यस्य चाभेदात् । तदा च इदमवच्छिन्नचैतन्याश्रितस्य रजतस्य साक्षात् साक्षिसम्बन्धात् प्रत्यक्षत्वमस्त्येव ।
| ११२ | वेदान्तपरिभाषा | [ विविधाध्यासिकप्रत्ययः |
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समाधान का आशय-'इदमवच्छिन्न-चैतन्य' ही विषयचैतन्य है। वह तद्विषयक अन्तःकरणोपहित-चैतन्य से भिन्न नहीं है (अभिन्न = तद्रूप ही है)। इस कारण विषय-चैतन्य में अध्यस्त होता हुआ भी रजत, साक्षी, में अध्यस्त है। उसी तरह वह साक्षिवेद्य और सुखादि के समान अनन्यवेद्य भी है—यह साम्प्रदायिकों का कथन सर्वथा उचित है।
ननु साक्षिण्यध्यस्तत्वेऽहं रजतमिति¹ प्रत्ययः स्यात्, अहं सुखीतिवदिति चेत्। ²उच्यते। न हि सुखादीनामन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्यनिष्ठाऽविद्याकार्यत्वप्रयुक्तम् अहं सुखीति ज्ञानम्, सुखादीनां घटादिवच्छुद्धचैतन्य एवाध्यासात्। किन्तु यस्य यदाकारानुभवाहित-संस्कारसहकृता विद्याकार्यत्वं तस्य तदाकारानुभवविषयत्वमित्येवानुगतं नियामकम्³।
**अर्थ—**भ्रान्त रजत, साक्षी में यदि अध्यस्त है तो 'मैं रजत' यह प्रत्यय होगा 'यह रजत' ऐसा प्रत्यय नहीं होगा। क्योंकि 'अहं सुखी = मैं सुखी' यह सुखविषयक प्रत्यय हुआ करता है। 'यह सुख' ऐसा प्रत्यय नहीं होता—यह शंका हो तो उत्तर देते हैं—'मैं सुखी' यह ज्ञान, सुखादिकों को अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यनिष्ठ अविद्या-कार्यत्व होने से होता हो सो नहीं, क्योंकि घटादिकों की तरह सुखादिकों का भी शुद्ध चैतन्य में ही अध्यास हुआ है तो 'मैं सुखी' यह प्रत्यय किस कारण से होता है ? उत्तर—जिसे जिस आकार के अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कारों के साथ अविद्याकार्यत्व होता है उसे तदाकार अनुभवविषयत्व होता है यही इसमें अनुगत नियामक है।
**विवरण—**सुखादिकों का अवच्छेदक जो शरीर तन्निष्ठत्वेन सर्वदा उनका अनुभव नहीं होता, क्योंकि 'मैं सुखी' यह आत्मनिष्ठत्वेन भी सुखादिकों का अनुभव होता दिखाई देता है। उसी प्रकार रजतादिकों का भी अन्तःकरण-साक्षी में अध्यस्तत्व स्वीकृत किये होने से 'अहं मनुष्यः' मैं मनुष्य--इस प्रत्यय के समान 'मैं रजत' या 'मैं सुखी' प्रत्यय के समान 'मैं रजतवान् हूँ' यह प्रत्यय होना चाहिए, परन्तु ऐसा प्रत्यय कभी भी क्यों नहीं होता ? यह उपर्युक्त शंका का आशय है।
उत्तर—'जिसमें जिसका अध्यास होता है उसका भान, तन्निष्ठ अविद्याकार्यत्व के कारण तन्निष्ठत्वेनैव हो' यह नियम नहीं हो सकता क्योंकि सुखादिकों को घटादिकों
१. 'मित्यहं रजतवानिति वा०'—इति पाठान्तरम्।
२. 'यत्र यदध्यासः तस्य तन्निष्ठाविद्याकार्यत्वप्रयुक्तं तन्निष्ठतायैव भानमि'ति नियमः न सम्भवति। सुखादेर्घटादिवत् शुद्धचैतन्याध्यस्तत्वेऽपि अहं सुखीतिप्रत्ययो भवति इत्याशयः।
३. नाना नियामकाभ्युपगमे गौरवात् अनुगतैकनियामकस्वीकार उचित इत्याशयः।
रजतस्य साक्षिणि अध्यासः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११३
के समान ही शुद्ध चैतन्याऽध्यस्तत्व होने पर भी 'मैं सुखी' यह प्रत्यय होता है। ग्रंथकार ने भी इसी आशय से उपर्युक्त शंका का समाधान किया है। सुखादिकों का 'मैं सुखी' इत्याकारक जो जो ज्ञान होता है, वह, अन्तःकरणावच्छिन्न जो चैतन्य और उसमें रहने वाली (तन्निष्ठ) जो अविद्या उसका कार्यत्व सुखादिकों को होने से नहीं होता है। क्योंकि घटादि व्यावहारिक पदार्थ जैसे शुद्ध चैतन्य में अध्यस्त हैं उसी तरह सुखादिक भी शुद्ध चैतन्य में ही अध्यस्त हैं, इस कारण सुखादिकों को अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यनिष्ठ अविद्याकार्यत्व है। परन्तु इसके होने से 'मैं सुखी' ज्ञान होता है—यह नहीं कहा जा सकता।
शंका—यदि ऐसा है तो घटादि, सुखादि और शुक्तिरूप्यादि इनमें से प्रत्येक को प्रतीतिविषयत्व होने के लिये पृथक्-पृथक् नियामक माने गये हैं या एक ही? इस प्रकार वादी के प्रश्न करने पर सिद्धान्ती कहता है घटादिकों को प्रतीति का विषयत्व प्राप्त होने के लिए पृथक् नियामक और सुखादिकों की प्रतीतिविषयत्व में पृथक् तथा शुक्तिरूप्यादिकों की प्रतीतिविषयत्व में भिन्न नियामक मानने में गौरव होता है, इसलिए घटादि, सुखादि और शुक्तिरूप्यादिकों में प्रतीतिविषयत्व प्राप्त होने के लिये सर्वानुगत एक नियामक ही मानना उचित है। इसी आशय का समाधान मूल में 'यस्य यदाकारा०' इत्यादि ग्रंथ से किया गया है। जिस विषय का जिस आकार से अनुभव होता है वह अनुभव, अन्तःकरण में वैसा ही संस्कार उत्पन्न करता है और उस संस्कार से युक्त हुई अविद्या का कार्यत्व जिसमें होता है, उसमें तदाकार अनुभवविषयत्व होता है—यही सर्वत्र अनुगत एक नियामक है। अब 'तथा च०' इत्यादि ग्रन्थ से उक्त नियामक की सर्वत्र योजना करते हैं—
तथा च इदमाकारानुभवाहित संस्कार-सहकृताऽविद्याकार्यत्वात् घटादेरिदमाकारानुभव-विषयत्वम् । अहमाकारानुभवाहित-संस्कारसहिताऽविद्याकार्यत्वादन्तःकरणादेरहं¹माकारानुभवविषयत्वम् । शरीरेन्द्रियादेरुभयविधानुभव²संस्कार³सहिताविद्याकार्यत्वादुभयविधानुभवविषयत्वम् । तथा चोभयविधो ऽनुभवः इदं शरीरमहं देहोऽहं मनुष्योऽहं ब्राह्मण इदं चक्षुरहं काण इदं श्रोत्रमहं बधिर इति ॥
१. 'मनुभवः'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'वाहितसं०'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'सहकृतावि०'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'द्यानुभ०'-इति पाठान्तरम् ।
८ वे० प०
११४ | वेदान्तपरिभाषा | [ विविधाध्यासिकप्रत्ययः
अर्थ—इस रीति से तीनों प्रकार के प्रतीतिविषयों में एक ही अनुगत नियामक होने से घटादिकों को 'इदम्' = यह, इस आकार के अनुभव से उत्पन्न हुई अविद्या का कार्यत्व है, इस कारण उन घटादिकों को इदमाकार के अनुभव का विषयत्व है। अन्तःकरणादिकों को अहमाकार के अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कारों से युक्त अविद्या का कार्यत्व होने से उन अन्तःकरणादिकों को अहमाकार अनुभव का विषयत्व है। शरीर इन्द्रियादिकों को दोनों प्रकार के अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कारों से युक्त अविद्या का कार्यत्व होने से उन शरीरेन्द्रियादिकों को दोनों प्रकार के अनुभव का विषयत्व है। उनका दो प्रकार से अनुभव कैसे आता है? यह पूछो तो बताते हैं—'यह शरीर' 'मैं देह' 'मैं मनुष्य' 'मैं ब्राह्मण' 'यह चक्षुरिन्द्रिय' 'मैं काना' 'यह श्रोत्रेन्द्रिय' 'मैं बहिरा' इस प्रकार शरीरेन्द्रियादिकों का दोनों प्रकार से अनुभव आता है—यह प्रसिद्ध है।
विवरण—घटादि बाह्य पदार्थ अविद्या के कार्य हैं। परन्तु उनका पहले जो अनुभव हुआ, वह 'यह घट, यह पट' इस प्रकार से हुआ। उस अनुभव से वैसे ही संस्कार हुए। उन्हीं संस्कारों से युक्त हुई अविद्या से घटादि पदार्थ रूप कार्य हुए। इस कारण इन बाह्य पदार्थों को इदमाकार अनुभव का विषयत्व है। अन्तःकरणादि भी अविद्या के कार्य हैं, परन्तु उनकी कारणभूत अविद्या, अहमाकारानुभव के उत्पन्न संस्कार से युक्त होती है इसलिए अन्तःकरणादि पदार्थ अहमाकारानुभव के विषय होते हैं। शरीर और इन्द्रियाँ भी अविद्या कार्य हैं परन्तु वे (कार्य) 'यह' और 'मैं' इन दोनों प्रकार के अनुभव से उत्पन्न संस्कारों से युक्त हुई अविद्या से उत्पन्न हुए हैं, इसलिये उनका दोनों प्रकार से अनुभव आता है। 'अहम्' अनुभव आत्मा को विषय करता है। और 'यह' अनुभव आत्मभिन्न पदार्थों को विषय करता है। इन अनुभवों से वैसे ही संस्कार होते हैं। उन संस्कारों से युक्त हुई अविद्या से पैदा होने वाले कार्य भी वैसे ही अनुभवों के विषय होते हैं। जैसे—यह घट, यह वृक्ष, यह पुष्प, यह मैं इत्यादि। परन्तु शरीर, इन्द्रियाँ इत्यादि देह और देहसम्बन्धी पदार्थ 'इदम्' और 'अहम्' इन दोनों प्रकार के संस्कारों से युक्त हुई अविद्या से पैदा होने के कारण उनका दोनों प्रकार से अनुभव होता है। जैसे यह शरीर, यह चक्षुरिन्द्रिय, यह श्रोत्रेन्द्रिय इत्यादि, और 'मैं देह, मैं मनुष्य, मैं ब्राह्मण, मैं काना, मैं बहिरा इत्यादि।
अब इसी उक्त नियामक की 'यह रजत' इस प्रकृत विषय में योजना कर के दिखाते हैं—
प्रकृते च प्रातिभासिक-रजतस्य प्रमातृचैतन्याभिन्नेद¹मंशावच्छिन्न-चैतन्य-निष्ठाऽविद्याकार्यत्वेऽपि इदं रजतमिति सत्यस्थली-
१. 'दमव०'—इति पाठान्तरम् ।
वृत्तिव्याप्तेरावश्यकता ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११५
येद¹मंशाकारानुभवाहित-संस्कारजन्यत्वादिदमाकारानुभव-विषयता, न त्वहं रजतमित्यहमाकारानुभव-विषयतेत्यनुसन्धेयम् ।।
**अर्थ—**प्रकृत में (शुक्ति रजत–इस उदाहरण में) प्रातिभासिक रजत, यद्यपि प्रमातृचैतन्य से अभिन्न जो इदमंशावच्छिन्न-चैतन्य, तन्निष्ठ अविद्या का कार्य है, तथापि व्यावहारिक सत्यरजत का 'यह रजत' इत्याकारक जो इदमंशाकार अनुभव, उससे उत्पन्न हुए जो संस्कार, उन संस्कारों से उत्पन्न होने के कारण (उसे) 'यह रजत' इस इदमाकार अनुभव का विषयत्व होता है। क्योंकि उस प्रातिभासिक रजत की उपादान जो अविद्या है, वह 'यह रजत' इस व्यावहारिक सत्य रजत के अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कार से युक्त रहती है। इसलिए उस प्रातिभासिक रजत का 'यह रजत' ऐसा अनुभव आता है। व्यावहारिक रजत का 'मैं रजत' ऐसा अनुभव आता है। व्यावहारिक रजत का 'मैं रजत' ऐसा अनुभव न आने से प्रातिभासिक रजत का भी 'मैं रजत' यह अनुभव नहीं होता—समझना चाहिये।
**विवरण—**प्रातिभासिक रजत, इदमंशावच्छिन्न-चैतन्यनिष्ठ अविद्या का कार्य है, और वह चैतन्य, प्रमातृचैतन्य से अभिन्न है। इस कारण वह, चैतन्यनिष्ठ अविद्या का कार्य है—यह सच है। तथापि उसके सहकारी कारण जो पूर्वसंस्कार हैं, वे 'अहं रजतम्' मैं रजत—इस अहमाकार अनुभव से उत्पन्न हुए नहीं हैं, क्योंकि व्यवहार में सत्य रजत का जो अनुभव आता है वह 'यह रजत' इस प्रकार आता है, 'मैं रजत' ऐसा नहीं। इसलिये 'यह रजत' इस अनुभव से उत्पन्न संस्कारों से युक्त अविद्या के कार्यरूप प्रातिभासिक रजत को नियमेन इदमाकारानुभव-विषयत्व ही रहता है। अहमाकारानुभव-विषयत्व नहीं।
इस पर सिद्धान्त्येकदेशी की शंका और सिद्धान्ती के द्वारा उसका निरसन—
नन्वेवमपि मिथ्यारजतस्य साक्षात्साक्षि-सम्ब²न्धितया भानसम्भवे रजतगोचर-ज्ञानाभासरूपाया³ अविद्यावृत्तेरभ्युपगमः किमर्थः ? इति चेत् । न⁴। स्वगोचर-वृत्त्युपहित-चैतन्यभिन्न-सत्ताकत्वाभावस्य विषयापरोक्ष⁵रूपतया रजतस्यापरोक्षत्वसिद्धये तदभ्युपगमात् ।
१. 'दमाका०'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'म्बद्धत०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'पाऽविद्या०'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'उच्यते०'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'त्वरूप०'—इति पाठान्तरम् ।
११६ वेदान्तपरिभाषा [ रजतज्ञाने गुरुमतप्रवेशशंका
अर्थ—ऐसा प्रतिपादित करने पर भी मिथ्या रजत का साक्षात् साक्षि-सम्बन्धित्वेन भान हो सकता है, तब रजत-विषयक अज्ञानाभासरूप अविद्या-वृत्ति का स्वीकार किस लिए ? उत्तर—अविद्यावृत्ति का स्वीकार बिना किये मिथ्या रजत का भान संभव ही नहीं, क्योंकि स्वविषय जो वृत्ति उसमें उपहित जो चैतन्य, उससे रजत की भिन्न सत्ता का न होना इसी को विषयापरोक्षरूपत्व होने से रजत का अपरोक्षत्व सिद्ध होने के लिए उस वृत्ति का स्वीकार करना पड़ता है ।
विवरण—यहाँ पर अद्वैत सिद्धान्तियों में से ही एकदेशी शंका करता है—आपके कथनानुसार शुक्तिरूप्य को इदमाकारानुभवविषयत्व भले ही रहे ( प्रातिभासिक रजत 'यह' आकार से अनुभव में भले ही आवे ) परन्तु तन्निमित्त उस रजत को विषय करने वाली अविद्या-वृत्ति का आश्रय करने का क्या प्रयोजन ? क्योंकि उस शुक्तिरूप्य का साक्षात् अनावृत साक्षी से सम्बन्ध हुआ होने से उसका अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ज्ञान ) होना शक्य है ।
समाधान—साक्षी पर आरोपित रजत की सत्ता, यद्यपि साक्षिचैतन्य से भिन्न नहीं है तथापि उस रजत का अपरोक्षत्व संभव नहीं होता । क्योंकि साक्षिचैतन्य में रजताकार वृत्त्युपहितत्व नहीं होता ( साक्षिचैतन्य, रजत विषयवृत्तिरूप उपाधि से युक्त नहीं रहता ) इसलिये रजत का अपरोक्षज्ञान होने के लिए अविद्यावृत्ति को अवश्य मानना चाहिए । 'न०' इत्यादि समाधान ग्रंथ का यही आशय है । विषयाकारवृत्त्युपहित चैतन्य से विषयचैतन्य की अभिन्न सत्ता का होना ही विषय का अपरोक्षत्व है । इसलिए प्रातिभासिक रजत का अपरोक्षत्व ( प्रत्यक्षत्व ) सिद्ध होने के लिए अविद्यावृत्ति को अवश्य ही मानना चाहिये—यह भाव है ।
शंका—आपके इस समाधान पर "एक ओर ध्यान दें तो दूसरी ओर का अनुसंधान छूट जाता है" अथवा 'एक को सम्हालने जायें तो दूसरा निकल जाता है' यह न्याय प्राप्त होता है, इस आशय से वादी की शंका और उसका सिद्धान्ती के द्वारा समाधान—
नन्विदंवृत्ते रजताकारवृत्तेश्च प्रत्येकमेकैक-विषय^१त्वे ^२गुरुमतवद्-विशिष्टज्ञानानभ्युपगमे कुतो भ्रमज्ञानसिद्धिरिति चेत् । न । वृत्ति-
१. 'यकत्वे०'-इति पाठान्तरम् ।
२. गुरुमतवत् प्रभाकरमतवत् । प्रभाकरमते 'इदं रजतम्' इति नैकं ज्ञानम् । अपितु इदमिति पुरोवर्तिद्रव्यमात्रविषयकं प्रत्यक्षम्, रजतमिति रजतविषयकं स्मरणम् । इति ग्रहण-स्मरणे एवं अगृहीत भेदे प्रवृत्तिप्रयोजयतः । इयांस्तु विशेषः—प्राभाकरमते ग्रहण-स्मरणात्मकमितिज्ञानद्वयम् । युष्मन्मते अन्तःकरणवृत्तिः आविद्यकवृत्तिश्चेति । एव चाख्यातिमतप्रवेशापत्तिः । अविद्यातत्परिणामादिकल्पनापेक्षया क्लृप्तसंस्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वकल्पनस्यैव युक्तत्वादिति शंकाकर्तुराशयः ।
रजतज्ञाने गुरुमतप्रवेशशंका ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११७
द्वय-प्रतिबिम्बित-चैतन्यस्यैकस्य सत्यमिथ्यावस्तु-तादात्म्यावगाहि-
त्वेन भ्रमत्वस्य¹ स्वीकारात्। अत²एव साक्षिज्ञानस्य सत्यासत्यविषय-
तया³ प्रामाण्यानियमाद् अप्रामाण्योक्तिः साम्प्रदायिकानाम् ॥
अर्थ —'इदं वृत्ति' और 'रजताकारवृत्ति' इनमें प्रत्येक वृत्ति का—शुक्ति और रजत—ऐसा भिन्न-भिन्न विषय रहता है। इस कारण प्रभाकर (गुरु) मीमांसक के मतानुसार "विशेष ज्ञान का स्वीकार न करने पर 'यह रजत' इस ज्ञान के भ्रमत्व की सिद्धि न होगी" यह कहें तो ठीक नहीं। क्योंकि उन दो प्रकार की वृत्तियों में प्रतिबिम्बित हुआ चैतन्य एक (अभिन्न) है, और उस ज्ञान का, सत्य तथा मिथ्या वस्तुओं का तादात्म्य, विषय है। इसलिए उस ज्ञान का भ्रमत्व स्वीकृत किया है (सत्य और मिथ्या वस्तुओं का तादात्म्य ही उस ज्ञान का विषय होने से, वह ज्ञान, भ्रमज्ञान है। इसी कारण से साक्षिज्ञान का सत्य और असत्य दोनों प्रकार का विषय सम्भव होने से (उसका) प्रामाण्य नियमेन सिद्ध नहीं होता। अतएव साम्प्रदायिकों ने 'साक्षिज्ञान' को 'प्रामाण्य नहीं' (साक्षिज्ञान अप्रमाण है।) कहा है।
विवरण—सामने दिखाई देनेवाला शुक्त्यादि पदार्थ जिसका विषय है, ऐसी 'इदमाकार – यह इस आकारवाली' एक अन्तःकरणवृत्ति और उस शुक्ति में '(यह) रजत' है—ऐसी प्रातिभासिक रजत को विषय करने वाली दूसरी वृत्तियों को आप मानते हो, (रजत का प्रत्यक्ष ज्ञान होने के लिए प्रातिभासिक रजताकार दूसरी अविद्यावृत्ति को आप स्वीकार करते हैं) परन्तु उससे, प्राभाकरों के समान आप पर भी विशिष्ट ज्ञान को स्वीकार न करने का प्रसंग आता है और उस कारण शुक्ति-रजत-ज्ञान के भ्रमत्व का बोध होता है। जिस प्रकार वृक्ष का हरा पत्ता, पका पत्ता, भ्रमर, जपाकुसुम आदि पृथक्-पृथक् आश्रय में क्रमशः दिखाई देनेवाले हरे, पीले, काले, लाल वर्णों से भ्रमर में 'यह चित्ररूपी भ्रमर है' ऐसी विशिष्ट बुद्धि कभी नहीं होती, उसी तरह जिनके विषय भिन्न हैं ऐसी दो वृत्तियों के योग से होने वाला 'यह रजत' इत्याकारकज्ञान, कभी भी विशिष्ट ज्ञान नहीं हो सकेगा। इस कारण शुक्ति में रजतज्ञान भ्रमज्ञान है, यह नहीं कह सकेंगे।
उपर्युक्त कथन प्राभाकर के मतानुसार है इसलिये इस विषय में प्राभाकर मत को संक्षेप में बता देना आवश्यक है।
१. 'त्वस्वी—इति पाठान्तरम् ।
२. अतएव वृत्तिद्वयप्रतिफलित चैतन्यस्यैकत्वादेव ।
३. अतएवोक्तं भाष्ये—"सत्यानृते मिथुनीकृत्याहमिदं ममेदमिति नैसर्गिकोडयं लोक-व्यवहारः" इति । अनेन 'इदं रजतमिति ज्ञानस्य भ्रमत्वमुपपद्यते । अत एवोत्तरभाष्ये उक्तम्—"शुक्तिका हि रजतवदवभासते" इति ।
११८ | वेदान्तपरिभाषा | [ रजतज्ञाने गुरुमतप्रवेशशंका
प्राभाकर मीमांसकों के मत में—शुक्ति में 'यह रजत' इत्याकारक जो ज्ञान होता है, वह विशिष्ट एक ज्ञान न होकर, उसमें दो ज्ञानों को माना है। उनमें आगे स्थित पदार्थ का 'यह' इत्याकारक जो ज्ञान होता है वह अनुभवात्मक ज्ञान है और 'रजत' इत्याकारक जो ज्ञान होता है वह दूर स्थित रजत को विषय करने वाला स्मरणात्मक ज्ञान है। इसलिये इनके मत से दो वस्तुओं के तादात्म्य को विषय करने वाला विशिष्ट ज्ञान कहीं भी और कभी भी नहीं होता। अतः सभी ज्ञान यथार्थ ही है। इसलिये प्रभाकर के मत में भ्रमज्ञान की जैसे सिद्धि नहीं होती, वैसे ही तुम्हारे मत में भी दो वृत्तियाँ और उनके दो विषय, ऐसा भेद स्वीकृत होने के कारण दो वस्तुओं के तादात्म्य को विषय करने वाला एक विशिष्ट ज्ञान नहीं माना जा सकता। इसलिये 'यह रजत' इत्याकारक ज्ञान, भ्रमज्ञान है—यह बात आप के सिद्धान्तानुसार सिद्ध नहीं हो पाती।
आपके मत में वृत्ति का भेद स्वीकार किया गया है। और उन वृत्तियों के विषयों का भी भेद माना गया है। आप एक इदमाकार वृत्ति मानते हैं और दूसरी रजतज्ञानाकार वृत्ति। उनमें इदमाकार वृत्ति का पुरोवर्ती शुक्त्यादि वस्तु, विषय है, और रजतज्ञानाकार वृत्ति का अविद्या-परिणामरूप प्रातिभासिक रजत विषय है। इससे 'इदं रजतम्' यहाँ पर विशिष्ट ज्ञान की सिद्धि नहीं होती। इसीलिये वह भ्रमज्ञान है, यह भी सिद्ध नहीं होता। यह शंका पूर्वोक्त सिद्धान्त्येकदेशी की ही है। 'न वृत्तिद्वय०' इत्यादि ग्रन्थ से सिद्धान्ती समाधान करता है—आपके बताये हुए के अनुसार एक 'यह' आकार की और दूसरी 'रजत' ज्ञानाकार की—ऐसी दो वृत्तियों को यद्यपि हम मानते हैं ( 'इदं रजतम्' यहाँ वृत्तियों के भेद होने पर भी ) तथापि ज्ञान का भेद नहीं है क्योंकि उन दोनों वृत्तियों का प्रवेश एक ही है। ( वे दोनों वृत्तियाँ मठ और घट की तरह एक ही स्थान में रहती हैं ) इस कारण मठ से अवच्छिन्न हुआ आकाश और घट से अवच्छिन्न हुआ आकाश जैसे एक ही है, वैसे ही इदमाकार वृत्ति में प्रतिबिम्बित चैतन्य और रजतज्ञानाकार वृत्ति में प्रतिबिम्बित चैतन्य एक ही है, इसलिये शुक्ति का 'इदमंश' यह सत्य वस्तु और 'रजत' यह मिथ्या वस्तु इन दोनों का तादात्म्य ही उस एक चैतन्य का ( एक ही ) विषय है। अतः 'इदं रजतम्' इस ज्ञान को हम भ्रम मानते हैं। उपर्युक्त शंका—समाधान का निष्कर्ष यह है—
'यह रजत' इस शुक्तिरूप्यज्ञान में आपने दो वृत्तियाँ मानी है। उनमें 'इदमाकार' अन्तःकरण-वृत्ति एक है। इस वृत्ति से सामने की 'शुक्ति' का ग्रहण किया जाता है। 'इदम् से अविच्छिन्न जो चैतन्य, उसमें स्थित जो शुक्तित्वाविद्या (यह शुक्ति है—इस ज्ञान का अभाव = शुक्तित्व का अज्ञान) उस शुक्तित्वाविद्या की परिणामरूप वृत्ति दूसरी। इस अविद्या परिणामरूप वृत्ति से रजत का ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार इन दो वृत्तियों से दो विषयों का ग्रहण किया जाने से, वे दो ज्ञान हैं
प्रातिभासिकव्यावहारिकयोर्भेदः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११९
यह कहना पड़ता है। इस कारण 'यह रजत' भ्रमात्मक ज्ञान है यह आप का सिद्धान्त बाधित होता है। और आप का प्रभाकर मत में प्रवेश हो जाता है। अर्थात् स्वसिद्धान्त-भंग और प्रभाकर मत में प्रवेश ये दो दोष आप पर आते हैं।
जिनके विषय भिन्न-भिन्न हैं ऐसी 'इदमाकार' और 'रजताकार' वृत्तियाँ यद्यपि भिन्न-भिन्न हैं तथापि उन दोनों वृत्तियों में प्रतिबिम्बित हुआ चैतन्य एक ही है। सब प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान में वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य, प्रमातृचैतन्य, (अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य) और विषयावच्छिन्न चैतन्य, इन तीनों चैतन्यों का पूर्वोक्त प्रकार से ऐक्य होना अवश्य है। भ्रान्त प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय व्यावहारिक सत्य (पुरोवर्ती शुक्ति आदि वस्तु) और प्रातिभासिक रजतादि वस्तुओं का तादात्म्य है। इससे उस भ्रान्त रजत ज्ञान को विशिष्टज्ञानत्व भी है और भ्रमत्व भी है।
यस्मात् एक ही साक्षिज्ञान में सत्यासत्यवस्तुविषयत्व है (साक्षिज्ञान का विषय सत्यवस्तु होता है और असत्य वस्तु भी)। तस्मात् साम्प्रदायिकों ने 'साक्षिज्ञान मे अप्रामाण्य है' यह जो कहा है वह ठीक ही है।
इस पर नैयायिकों की शंका और उसका समाधान—
ननु¹ सिद्धान्ते देशान्तरीय-रजतमप्यविद्याकार्यमध्यस्तं चेति कथं शुक्तिरूप्यस्य ततो वैलक्षण्यमिति चेत्। न। तन्मते सत्यत्वा-विशेषेऽपि केषाञ्चित्क्षणिकत्वं केषाञ्चित्स्थायित्वमित्यत्र यदेव,² नियामकं, तदेव³ स्वभावविशेषादिकं ममापि।
**अर्थ—**आप के सिद्धान्त के अनुसार देशान्तरीय रजत भी अविद्या का कार्य और अध्यस्त है। तब शुक्तिरूप्य को उससे वैलक्षण्य कैसे ? यह यदि आप पूछें तो वह कोई दोष नहीं है। क्योंकि आप के (नैयायिकों के) मत में समस्त कार्यों की सत्यता यद्यपि एक सी है तथापि उनमें से कुछ कार्यों में क्षणिकत्व और कुछ कार्यों में स्थायित्व माना है। परंतु यह मानने में नियामक (कारण) क्या है ? पूछने पर, स्वभाव
१. पूर्वोक्तभाष्यानुसारेण ब्रह्मस्वरूपज्ञानव्यतिरिक्तस्य सर्वस्यापि ज्ञानस्य भ्रमात्मक-त्वमवगम्यते, भ्रमत्वं च अनिर्वचनीयतत्कालोत्पन्नवस्तुविषयत्वेनेति भवतां मतम्। तच्च यदि इदमुपपन्नं स्यात्, तर्हि घटादेर्व्यावहारिकत्वं शुक्तिरूप्यादेश्च प्रातिभासिकत्वं कुतः ? उभयोरपि अविद्याकार्यत्वाविशेषेण तन्नियामकमन्तरा तदसम्भवात्। यद्यपि मूलाविद्या-कार्यत्वेन व्यावहारिकत्वं, तूलाविद्याकार्यत्वेन प्रातिभासिकत्वमिति विशेषः संभवति, तथाप्ययं विशेषः शुक्तिरूप्यादीनामपि मूलाविद्याकार्यत्वपक्षे न संभवतीति शंकाकर्तुराशयः।
२. 'व स्वभावविशेषादिकं नि०'-इति पाठान्तरम्।
३. 'व ममापि०'-इति पाठान्तरम्।
| १२० | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रातिभासिकव्यावहारिकयोर्भेदः |
|---|
विशेषादिक ही उनमें नियामक है, यह आप उत्तर देते हैं। अर्थात् घटादिकों से शुक्तिरूप्य की विलक्षणता में भी नियामक मेरे मत में स्वभावविशेषादिक ही हैं।
विवरण—इतने महाप्रयास से शुक्तिरूप्य में अविद्याकार्यत्व और अध्यस्तत्व आप किसलिए सिद्ध कर रहे हैं? देशान्तरीय रजत से शुक्तिरजत का वैलक्षण्य सिद्ध करने के लिये ही कर रहे हैं। परन्तु इतना प्रयास करने पर भी व्यावहारिक सत्यरजत और शुक्तिरजत का वैलक्षण्य आप के सिद्धान्त के अनुसार नहीं हो पाता। क्योंकि आप अद्वैती, देशान्तरीय व्यावहारिक सत्य रजादिकों में भी अविद्याकार्यत्व और अध्यस्तत्व बताते हैं। तब शुक्तिरजत और देशान्तरीय रजत में विलक्षणता दिखाने के लिए आप के मत में कौन सा विशेष हेतु है? अर्थात् कोई नहीं। यह उपर्युक्त शंका का आशय है।
सिद्धान्ती—आप के (नैयायिकों के) मत में शब्द, ज्ञान, इच्छा इत्यादि गुण और घटादि अन्य पदार्थ, इन सब में सत्यत्व यद्यपि एक-सा है तथापि उनमें से शब्दादिकों में क्षणिकत्व है और घटादिकों में स्थिरत्व होता है। इस वैलक्षण्य के मानने में जो नियामक (कारण) है, वही मेरे मत में शुक्तिरजत और देशान्तरीय रजत के वैलक्षण्य का नियामक है।
द्रव्यादि अनेक सत्य पदार्थों में से घटादि पदार्थों को अक्षणिकत्व है और शब्द, ज्ञान, इच्छा इत्यादिकों को क्षणिकत्व है—इस विषय में स्वभावविशेष को नियामक, जैसे आप मानते हैं, वैसे ही अद्वैत सिद्धान्ती भी उसी को नियामक मानते हैं। अतः 'यश्चोभयोः समो दोषः परिहारस्तयोः समः' जो दोष दोनों पक्षों में समान हो तो उसका परिहार भी दोनों पक्षों में समान ही होता है।
उनमें से एक पक्षवाले को दूसरे पक्ष पर उस दोष को देना उचित नहीं है। अतः आप के द्वारा हमें इस तरह प्रश्न किया जाना अनुचित है।
अब सिद्धान्ती 'यद्वा' ग्रन्थ से अपने पक्ष में एक और भी वैलक्षण्य उसका नियामक है—बताते हैं।
यद्वा¹ घटाद्यध्यासे अविद्यैव दोषत्वेनापि हेतुः, शुक्तिरूप्याद्य-ध्यासे तु काचादयो² दोषा अपि। तथा चागन्तुक³दोष-जन्यत्वं
१. घटाद्यध्यासस्य अविद्यादोषजन्यत्वेऽपि अविद्यातिरिक्तकाचादिदोषाऽजन्यत्वात् घटादीनां न भवति, शुक्तिरूप्यादीनां तु अविद्यातिरिक्तदोषजन्यत्वात् भवतीत्याशयेनाह—'यद्वे'ति'।
२. 'योऽपि दोषाः'—इति पाठान्तरम्।
३. आगन्तुकदोषजन्यत्वं काचादिदोषजन्यत्वम्। इदं स्वाप्निकानां मूलाविद्याकार्य-त्वमितिपक्षानुरोधेन। तथा च सिद्धान्तलेशसङ्ग्रहे—"स्वप्नाध्यासस्यापि अनवच्छिन्न-
स्वाप्नपदार्थविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १२१
प्रातिभासिकत्वे प्रयोजकम्। अत एव१ स्वप्नोपलब्धारथादीनामा- गन्तुक-निद्रादिदोषजन्यत्वात्प्रातिभासिकत्वम्॥
अर्थ— अथवा घटादिकों के अध्यास में अविद्या ही दोषत्व से कारण रहती है। परन्तु शुक्तिरूप्यादिकों के अध्यास में काचादि दोष भी कारण बनते हैं। इस कारण आगन्तुक दोषजन्यत्व शुक्तिरजतादिकों के प्रातिभासिकत्व में निमित्त है, और आगन्तुक दोषजन्यत्व, प्रतीत होने वाले शुक्तिरजतादिकों के प्रातिभासिकत्व में नियामक होने से ही स्वप्न में उपलब्ध होने वाले रथादिकों को प्रातिभासिकत्व (भ्रान्तत्व) है। क्योंकि उनमें आगन्तुक निद्रादिदोष-जन्यत्व है।
विवरण— सिद्धान्तियों ने प्रातिभासिक रजत और व्यावहारिक सत्य-रजत के वैलक्षण्य में स्वभावविशेषादिक एक नियामक बताया था। अब दूसरे प्रकार का वैलक्षण्य भी उसमें नियामक है। यह बताने के लिये वे कहते हैं—घटादि व्यावहारिक पदार्थ, चैतन्य पर अध्यस्त हैं। वे पदार्थ अविद्या से ही पैदा हुए हैं। और वह अविद्या ही (चैतन्य का अज्ञान ही) उस अध्यास के होने में दोष रूप से कारण भी हैं। (अविद्या-रूप दोष से ही घटादिकों का चैतन्य पर आरोप होता है), पर शुक्तिरूप्यादि के अध्यास में शुक्ति आदिकों का अज्ञान रजतादिकों का कारण बनकर सिवाय काचादिक दोष भी उसमें कारण हैं। (व्यावहारिक पदार्थों का चैतन्य पर अध्यास होने में मूलाविद्या ही कारण है, वह एक दोष है। परन्तु शुक्तिरूप्यादि अध्यास में तूलाविद्या कारण है और काचादि दोष उसके सहकारी रहते हैं)। इस कारण आगन्तुक दोषजन्यत्व (क्षणिक दोष से पैदा होना) रजतादिकों के प्रातिभासिकत्व में कारण है। इसलिये स्वप्न में दीखने वाले रथादि, आगन्तुक निद्रादि दोषजन्य होने से प्रातिभासिक हैं।
इस पर अख्यातिवादी की पुनः शङ्का और निरसन—
२ननु स्वप्नस्थले पूर्वानुभूत-रथादेः स्मरणमात्रेणैव ३-व्यवहारो- पपत्तौ न रथादि-सृष्टि-कल्पनं गौरवादिति, चेत्। न। रथादेः
चैतन्ये अहंकारोपहितचैतन्ये वाऽवस्थाज्ञानशून्येऽध्यासात् मूलाज्ञानकार्यतायामविद्यातिरिक्त- निद्रादिदोषजन्यतयैव प्रातिभासिकत्वम्।"
१. अतएव अविद्यातिरिक्तदोषजन्यत्वस्य प्रातिभासिकत्व-प्रयोजकत्वादेव। स्वाप्न-रथादौ अपि निद्रारूपदोषजन्यत्वं विद्यते, प्रातिभासिकत्वं च विद्यत इत्याशयः।
२. स्वप्ने समुपस्थितानां रथादीनां प्रातिभासिकत्वाभ्युपगमे तेषां तत्कालोत्पत्ति-र्वक्तव्या, सा चानुपपन्ना, स्मरणमात्रेण प्रातिभासिकव्यवहारोपपत्तौ सृष्टिकल्पनाऽनो-चित्यादित्यख्यातिवादी शङ्कते।
३. 'व प्रातिभासिकत्व-व्य०'-इति पाठान्तरम्।
१२२ वेदान्तपरिभाषा [ स्वप्नपदार्थविचारः
^१स्मरणमात्राभ्युपगमे रथं पश्यामि स्वप्ने रथमद्राक्षमित्याद्यनुभव-विरोधापत्तेः, ^२‘अथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते’ बृ० ४।३।१० इति रथादि-सृष्टि-प्रतिपादक-श्रुतिविरोधापत्तेश्च । तस्माच्छुक्तिरूप्य ^३वत् स्वप्नोपलब्ध-रथादयोऽपि प्रातिभासिकाः यावत्प्रतिभासमवतिष्ठन्ते ^४ ॥
**अर्थ—**स्वप्न में पूर्वानुभूत रथादिकों के केवल स्मरण से ही उनके व्यवहार का सम्भव होने से स्वप्न में रथादिकों की उत्पत्ति की कल्पना करना योग्य नहीं है। क्योंकि उसमें गौरव दोष होता है। परन्तु यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि स्वप्न में रथादिकों का केवल स्मरण मान लेने पर 'मैं रथ को देखता हूँ' 'मैंने स्वप्न में रथ को देखा' इत्यादि अनुभव से विरोध होता है। उसी तरह "स्वप्न में रथादि नहीं होते। परन्तु यह स्वप्नद्रष्टा रथ, घोड़े, मार्ग आदि को उत्पन्न करता है" इत्यादि रथादिकों की उत्पत्ति का प्रतिपादन करने वाली श्रुति के साथ विरोध होता है। इसलिए स्वप्न में उपलब्ध होने वाले रथादिक भी, शुक्तिरूप्य की तरह प्रातिभासिक हैं। जब तक प्रतिभास रहता है तब तक वे प्रातिभासिक रथादिक अवस्थित होते हैं (रहते हैं)।
**विवरण—**स्वप्न के रथादिक प्रातिभासिक (भ्रान्त) हैं, यह मानने पर उनकी तात्कालिक उत्पत्ति होती है मानना होगा। (जिस समय प्रतिभास होता है उसी समय वे उत्पन्न होते हैं।) परन्तु उनकी वैसी तत्कालीन उत्पत्ति का होना सम्भव नहीं,
१. 'स्मृतिमा०'-इति पाठान्तरम् ।
२. स्वप्ने रथादीनां स्मरणमात्रमिति पक्षे पश्यामीति चाक्षुषत्वानुभवो नोपपद्यते । यद्यपि स्वप्ने चक्षुरादीनि उपरतानि, यद्यपि च प्रातिभासिकानामज्ञातसत्त्वानभ्युपगमात् प्रातिभासिकचक्षुरादिकल्पनमपि न संभवति तथापि चक्षुर्ग्राह्यत्वमात्रकल्पनया चाक्षुषानुभवस्य भ्रमरूपस्य कल्पनायां न दोषः । तदुक्तं सिद्धान्तलेशे "तस्मात् सर्वथापि स्वप्ने चक्षुरादिव्यापारासंभवात् स्वाप्नगजादौ चाक्षुषत्वानुभवो भ्रमः ।" अत एव "रथादाविन्द्रियग्राह्यत्वमपि प्रातिभासिकम्, तदा सर्वेन्द्रियाणामुपरमात्" इत्युत्तरग्रन्थोऽपि उपपद्यते ।
३. 'प्यादिव०' इति पाठान्तरम् ।
४. स्वाप्निकानुभवः अन्यथाख्यातिरेवेति कस्यचिन्मतमपि अयुक्तम् । जाग्रद्भोगप्रदकर्मोपरमे सति स्वाप्नभोगप्रदकर्माभिव्यक्त्यनन्तरं रथान्, रथयुक्तानश्वान् मार्गांश्च सृजते इति तत्सृष्टिप्रतिपादकश्रुत्या गौरवस्य प्रामाणिकतया उक्तप्रतीतेरन्यथानयनमयुक्तम् । यद्यपीदं सर्वमसृजतेति श्रुतिसिद्धानां सृज्यमानानामाकाशादीनां न प्रातिभासिकत्वम् तथापि अयंशब्दस्वारस्येन आगन्तुकदोषजन्यत्वं स्वाप्निकानामेव, नाकाशादीनाम् । अतएव "मायामात्रं तु कात्स्न्र्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात्" इति सूत्रोपपत्तिः । प्रातिभासिकाः प्रतिभासनियतसत्ताकाः ।
स्वाप्नपदार्थविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेद १२३
क्योंकि केवल स्मरण से ही उनके व्यवहार की उपपत्ति लग जाती है। इसलिए तत्कालीन उत्पत्ति की कल्पना करना अयोग्य है, इस आशय से अख्यातिवादी कहता है—"स्वप्न में जाग्रत्काल में अनुभव किये हुए रथादि वस्तुओं के केवल स्मरण से ही 'मैं रथ देखता हूँ' इत्यादि व्यवहार का सम्भव हो सकता है। इसलिये स्वप्न में रथादिकों की उत्पत्ति की कल्पना नहीं की जा सकती। क्योंकि केवल स्मरण से ही व्यवहार की उपपत्ति लग जाने से रथादि की कल्पना करने में गौरव है।
सिद्धान्ती, अख्यातिवादी की इस शंका का समाधान; प्रतीतिविरोध दिखाकर 'न०' इत्यादि ग्रन्थ से करता है—यह शङ्का उचित नहीं है। (स्वप्न में पहले देखे हुए हुए रथादिकों का केवल स्मरण होता है—यह कहना ठीक नहीं) क्योंकि स्वप्न में 'मैं इस समय रथ देख रहा हूँ, गायन सुन रहा हूँ' ऐसा वर्तमानकालीन अनुभव होता है, परन्तु स्मरण, भूतकालीन अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कारों का कार्य है। इसलिए स्वप्न में रथ, गायन, आदि का केवल स्मरण होता है—यह कहना अनुभव के विरुद्ध है।
शंका—किन्हीं दोषों के कारण 'मैं रथादि का स्मरण करता हूँ' इस स्मरण का अभान होता है और 'मैं रथ देखता हूँ और गाना सुनता हूँ,' ऐसी प्रतीति होती है।
समाधान—तो यह कहना भी उचित नहीं। क्योंकि स्वप्नकाल में दोषवश वैसी प्रतीत होती है, यह भी मान लें तब भी जाग्रदवस्था में उस दोष की निवृत्ति हुई रहती है। परन्तु उस दोषनिवृत्तिकाल में भी 'मैंने आज स्वप्न में रथ देखा, गाना सुना' यही प्रतीति होती है। इसके विपरीत 'पहिले देखे हुए रथ का मुझे आज स्वप्न में स्मरण हुआ, सुने हुए गाने का स्मरण हुआ' ऐसी प्रतीति नहीं होती। इसलिए पूर्वोक्त प्रत्यय का व्यवहार केवल स्मृति से उपपन्न नहीं होता। इस प्रकार पूर्वोक्त प्रत्यय से विरोध होने के कारण स्वप्नगत प्रत्यय को भी स्मृति नहीं कह सकते।
शंका—"जाग्रदवस्था में 'मैंने स्वप्न में रथादिकों को देखा' यह प्रतीति भी विरुद्ध नहीं है। क्योंकि स्वप्न की स्मृति, अनुभवाकार से उत्पन्न हुई होने से जाग्रदवस्था में उसका वैसा परामर्श होना, योग्य ही है। अर्थात् गौरवदोष से दूषित होनेवाली स्वप्न-रथ, रथादिकों की नवीन होने सृष्टि मानना योग्य नहीं है।"
समाधान—श्रुति-विरोध होने से अख्यातिवादी का यह कथन उपपन्न नहीं हो पाता। क्योंकि 'अथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते' जाग्रदवस्था में भोग देने वाला कर्म निवृत्त होकर, स्वप्न में भोग देने वाला कर्म अभिव्यक्त होने पर स्वप्नद्रष्टा जीव, रथ और उसके उपकरणभूत अश्वादि और उनके योग्य मार्ग आदि को पैदा करता है (बृ० उ० ४।३।१०) इस रथादिसृष्टि का प्रतिपादन करने वाली श्रुति के साथ विरोध होता है। श्रुति में स्वप्नद्रष्टा, रथादिकों को "पैदा करता है" यह स्पष्ट बताया है। इस
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कारण यहाँ पर गौरव को स्वीकार करना प्रामाणिक है । इसलिये पूर्वोक्त प्रतीति की अन्य प्रकार से उपपत्ति लगाना अयोग्य है ।
इस प्रकार श्रुति-विरोध होने के कारण अन्यथाख्याति भी अयुक्त है । इस आशय से ग्रंथकार 'तस्मात्०' इत्यादि ग्रंथ से सिद्धान्त का उपसंहार करते हैं--शुक्ति में भासमान रूप्य की तरह स्वप्न में प्रतीत होनेवाले रथादिक भी प्रातिभासिक हैं । परन्तु 'प्रातिभासिक' पद के अर्थ में किसी प्रकार शंका न रहने पावे, एतदर्थ ग्रन्थकार स्वयं उस पद का व्याख्यान करते हैं—
'जब तक प्रतिभास होता है तब तक वे रहते हैं इसलिए वे प्रातिभासिक हैं' प्रतिभास का अर्थ है-आभास, भ्रम । जब तक उसकी सत्ता रहती है तभी तक जिनकी नियमेन सत्ता होती है--वे पदार्थ प्रातिभासिक कहलाते हैं ।
स्वप्नगत रथादि पदार्थ प्रातिभासिक हैं और वे शुक्तिरूप्य की तरह प्रतिभास के समय उत्पन्न होते हैं । सिद्धान्तियों के इस समाधान पर पुनः शंका और उसका समाधान—
ननु^१ स्वप्ने रथाद्यधिष्ठानतयोपलभ्यमान-देशविशेषस्यापि तदा-ऽसन्निकृष्टतयाऽनिर्वचनीय-प्रातिभासिक-देशोऽभ्युपगन्तव्यः, तथा च रथाद्यध्यासः कुत्रेति चेत् । न^२ । चैतन्यस्य स्वयंप्रकाशस्य रथाद्य-
१. स्वप्ने रथादीनामधिष्ठानं किं चैतन्यम्, उत देशविशेषः ? आद्येऽपि अनवच्छिन्न-चैतन्यमधिष्ठानमुत उपहितचैतन्यम् द्वितीयेऽपि अवच्छिन्नचैतन्यं किं बिम्बचैतन्यं वा उत प्रतिबिम्बचैतन्यं वा ? तत्र न तावत् बिम्बचैतन्यमधिष्ठानम्, तस्यावृतस्य ज्ञानविषयत्वा-भावेन अधिष्ठानत्वाभावात् । नापि प्रतिबिम्बचैतन्यं, तस्य सिद्धान्तलेशसंग्रहोक्तरीत्या स्वयं प्रकाशस्य अज्ञातत्वाभावेन अनधिष्ठानत्वात्, किञ्चिद्रूपेण ज्ञातस्य किञ्चिद्रूपेण अज्ञातस्यैव अधिष्ठानत्वात् । अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्याधिष्ठानत्वमहं गज इति प्रतीत्यापत्त्या न संभवत्येव । अतः परिशेषात् देशविशेष एवं अधिष्ठानमिति वर्णनीयम्, स च देहात् बहिःस्थश्चेत् स्वप्नकालेचक्षुरिन्द्रियोपरमेण असन्निकृष्टतया अधिष्ठा-नत्वायोगाः, देहान्तःस्थश्चेत् देहान्तर्दृश्यमान परिमाणोचित देशसम्पत्त्यभावात् सोऽपि प्रातिभासिकः कल्पितः इत्यङ्गीकरणीयम्, कल्पितस्य च अज्ञानाविषयस्य अधिष्ठानत्वाऽ-योगः । एवं च निरधिष्ठानवादापत्तिः शून्याधिष्ठानतापत्तिर्वेत्याशंकतुंराशयः ।
२. देशविशेषः कल्पितः न अधिष्ठानम्, चैतन्यं तु अनवच्छिन्नमविद्याप्रतिबिम्बं वाऽधिष्ठानमिति भवत्येव । तस्य च सामान्यरूपेण ज्ञातस्यापि विशेषरूपेणाऽज्ञानमपि संभवत्येव । वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यमेव अज्ञानविरोधि, न स्वरूपचैतन्यमिति एवं च न निरधिष्ठानतावादः इति समाघातुराशयः ।