वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११८ | वेदान्तपरिभाषा | [ रजतज्ञाने गुरुमतप्रवेशशंका
प्राभाकर मीमांसकों के मत में—शुक्ति में 'यह रजत' इत्याकारक जो ज्ञान होता है, वह विशिष्ट एक ज्ञान न होकर, उसमें दो ज्ञानों को माना है। उनमें आगे स्थित पदार्थ का 'यह' इत्याकारक जो ज्ञान होता है वह अनुभवात्मक ज्ञान है और 'रजत' इत्याकारक जो ज्ञान होता है वह दूर स्थित रजत को विषय करने वाला स्मरणात्मक ज्ञान है। इसलिये इनके मत से दो वस्तुओं के तादात्म्य को विषय करने वाला विशिष्ट ज्ञान कहीं भी और कभी भी नहीं होता। अतः सभी ज्ञान यथार्थ ही है। इसलिये प्रभाकर के मत में भ्रमज्ञान की जैसे सिद्धि नहीं होती, वैसे ही तुम्हारे मत में भी दो वृत्तियाँ और उनके दो विषय, ऐसा भेद स्वीकृत होने के कारण दो वस्तुओं के तादात्म्य को विषय करने वाला एक विशिष्ट ज्ञान नहीं माना जा सकता। इसलिये 'यह रजत' इत्याकारक ज्ञान, भ्रमज्ञान है—यह बात आप के सिद्धान्तानुसार सिद्ध नहीं हो पाती।
आपके मत में वृत्ति का भेद स्वीकार किया गया है। और उन वृत्तियों के विषयों का भी भेद माना गया है। आप एक इदमाकार वृत्ति मानते हैं और दूसरी रजतज्ञानाकार वृत्ति। उनमें इदमाकार वृत्ति का पुरोवर्ती शुक्त्यादि वस्तु, विषय है, और रजतज्ञानाकार वृत्ति का अविद्या-परिणामरूप प्रातिभासिक रजत विषय है। इससे 'इदं रजतम्' यहाँ पर विशिष्ट ज्ञान की सिद्धि नहीं होती। इसीलिये वह भ्रमज्ञान है, यह भी सिद्ध नहीं होता। यह शंका पूर्वोक्त सिद्धान्त्येकदेशी की ही है। 'न वृत्तिद्वय०' इत्यादि ग्रन्थ से सिद्धान्ती समाधान करता है—आपके बताये हुए के अनुसार एक 'यह' आकार की और दूसरी 'रजत' ज्ञानाकार की—ऐसी दो वृत्तियों को यद्यपि हम मानते हैं ( 'इदं रजतम्' यहाँ वृत्तियों के भेद होने पर भी ) तथापि ज्ञान का भेद नहीं है क्योंकि उन दोनों वृत्तियों का प्रवेश एक ही है। ( वे दोनों वृत्तियाँ मठ और घट की तरह एक ही स्थान में रहती हैं ) इस कारण मठ से अवच्छिन्न हुआ आकाश और घट से अवच्छिन्न हुआ आकाश जैसे एक ही है, वैसे ही इदमाकार वृत्ति में प्रतिबिम्बित चैतन्य और रजतज्ञानाकार वृत्ति में प्रतिबिम्बित चैतन्य एक ही है, इसलिये शुक्ति का 'इदमंश' यह सत्य वस्तु और 'रजत' यह मिथ्या वस्तु इन दोनों का तादात्म्य ही उस एक चैतन्य का ( एक ही ) विषय है। अतः 'इदं रजतम्' इस ज्ञान को हम भ्रम मानते हैं। उपर्युक्त शंका—समाधान का निष्कर्ष यह है—
'यह रजत' इस शुक्तिरूप्यज्ञान में आपने दो वृत्तियाँ मानी है। उनमें 'इदमाकार' अन्तःकरण-वृत्ति एक है। इस वृत्ति से सामने की 'शुक्ति' का ग्रहण किया जाता है। 'इदम् से अविच्छिन्न जो चैतन्य, उसमें स्थित जो शुक्तित्वाविद्या (यह शुक्ति है—इस ज्ञान का अभाव = शुक्तित्व का अज्ञान) उस शुक्तित्वाविद्या की परिणामरूप वृत्ति दूसरी। इस अविद्या परिणामरूप वृत्ति से रजत का ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार इन दो वृत्तियों से दो विषयों का ग्रहण किया जाने से, वे दो ज्ञान हैं