भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 175

रजतज्ञाने गुरुमतप्रवेशशंका ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११७

द्वय-प्रतिबिम्बित-चैतन्यस्यैकस्य सत्यमिथ्यावस्तु-तादात्म्यावगाहि-
त्वेन भ्रमत्वस्य¹ स्वीकारात्। अत²एव साक्षिज्ञानस्य सत्यासत्यविषय-
तया³ प्रामाण्यानियमाद् अप्रामाण्योक्तिः साम्प्रदायिकानाम् ॥

अर्थ —'इदं वृत्ति' और 'रजताकारवृत्ति' इनमें प्रत्येक वृत्ति का—शुक्ति और रजत—ऐसा भिन्न-भिन्न विषय रहता है। इस कारण प्रभाकर (गुरु) मीमांसक के मतानुसार "विशेष ज्ञान का स्वीकार न करने पर 'यह रजत' इस ज्ञान के भ्रमत्व की सिद्धि न होगी" यह कहें तो ठीक नहीं। क्योंकि उन दो प्रकार की वृत्तियों में प्रतिबिम्बित हुआ चैतन्य एक (अभिन्न) है, और उस ज्ञान का, सत्य तथा मिथ्या वस्तुओं का तादात्म्य, विषय है। इसलिए उस ज्ञान का भ्रमत्व स्वीकृत किया है (सत्य और मिथ्या वस्तुओं का तादात्म्य ही उस ज्ञान का विषय होने से, वह ज्ञान, भ्रमज्ञान है। इसी कारण से साक्षिज्ञान का सत्य और असत्य दोनों प्रकार का विषय सम्भव होने से (उसका) प्रामाण्य नियमेन सिद्ध नहीं होता। अतएव साम्प्रदायिकों ने 'साक्षिज्ञान' को 'प्रामाण्य नहीं' (साक्षिज्ञान अप्रमाण है।) कहा है।

विवरण—सामने दिखाई देनेवाला शुक्त्यादि पदार्थ जिसका विषय है, ऐसी 'इदमाकार – यह इस आकारवाली' एक अन्तःकरणवृत्ति और उस शुक्ति में '(यह) रजत' है—ऐसी प्रातिभासिक रजत को विषय करने वाली दूसरी वृत्तियों को आप मानते हो, (रजत का प्रत्यक्ष ज्ञान होने के लिए प्रातिभासिक रजताकार दूसरी अविद्यावृत्ति को आप स्वीकार करते हैं) परन्तु उससे, प्राभाकरों के समान आप पर भी विशिष्ट ज्ञान को स्वीकार न करने का प्रसंग आता है और उस कारण शुक्ति-रजत-ज्ञान के भ्रमत्व का बोध होता है। जिस प्रकार वृक्ष का हरा पत्ता, पका पत्ता, भ्रमर, जपाकुसुम आदि पृथक्-पृथक् आश्रय में क्रमशः दिखाई देनेवाले हरे, पीले, काले, लाल वर्णों से भ्रमर में 'यह चित्ररूपी भ्रमर है' ऐसी विशिष्ट बुद्धि कभी नहीं होती, उसी तरह जिनके विषय भिन्न हैं ऐसी दो वृत्तियों के योग से होने वाला 'यह रजत' इत्याकारकज्ञान, कभी भी विशिष्ट ज्ञान नहीं हो सकेगा। इस कारण शुक्ति में रजतज्ञान भ्रमज्ञान है, यह नहीं कह सकेंगे।

उपर्युक्त कथन प्राभाकर के मतानुसार है इसलिये इस विषय में प्राभाकर मत को संक्षेप में बता देना आवश्यक है।


१. 'त्वस्वी—इति पाठान्तरम् ।
२. अतएव वृत्तिद्वयप्रतिफलित चैतन्यस्यैकत्वादेव ।
३. अतएवोक्तं भाष्ये—"सत्यानृते मिथुनीकृत्याहमिदं ममेदमिति नैसर्गिकोडयं लोक-व्यवहारः" इति । अनेन 'इदं रजतमिति ज्ञानस्य भ्रमत्वमुपपद्यते । अत एवोत्तरभाष्ये उक्तम्—"शुक्तिका हि रजतवदवभासते" इति ।