वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६ वेदान्तपरिभाषा [ रजतज्ञाने गुरुमतप्रवेशशंका
अर्थ—ऐसा प्रतिपादित करने पर भी मिथ्या रजत का साक्षात् साक्षि-सम्बन्धित्वेन भान हो सकता है, तब रजत-विषयक अज्ञानाभासरूप अविद्या-वृत्ति का स्वीकार किस लिए ? उत्तर—अविद्यावृत्ति का स्वीकार बिना किये मिथ्या रजत का भान संभव ही नहीं, क्योंकि स्वविषय जो वृत्ति उसमें उपहित जो चैतन्य, उससे रजत की भिन्न सत्ता का न होना इसी को विषयापरोक्षरूपत्व होने से रजत का अपरोक्षत्व सिद्ध होने के लिए उस वृत्ति का स्वीकार करना पड़ता है ।
विवरण—यहाँ पर अद्वैत सिद्धान्तियों में से ही एकदेशी शंका करता है—आपके कथनानुसार शुक्तिरूप्य को इदमाकारानुभवविषयत्व भले ही रहे ( प्रातिभासिक रजत 'यह' आकार से अनुभव में भले ही आवे ) परन्तु तन्निमित्त उस रजत को विषय करने वाली अविद्या-वृत्ति का आश्रय करने का क्या प्रयोजन ? क्योंकि उस शुक्तिरूप्य का साक्षात् अनावृत साक्षी से सम्बन्ध हुआ होने से उसका अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ज्ञान ) होना शक्य है ।
समाधान—साक्षी पर आरोपित रजत की सत्ता, यद्यपि साक्षिचैतन्य से भिन्न नहीं है तथापि उस रजत का अपरोक्षत्व संभव नहीं होता । क्योंकि साक्षिचैतन्य में रजताकार वृत्त्युपहितत्व नहीं होता ( साक्षिचैतन्य, रजत विषयवृत्तिरूप उपाधि से युक्त नहीं रहता ) इसलिये रजत का अपरोक्षज्ञान होने के लिए अविद्यावृत्ति को अवश्य मानना चाहिए । 'न०' इत्यादि समाधान ग्रंथ का यही आशय है । विषयाकारवृत्त्युपहित चैतन्य से विषयचैतन्य की अभिन्न सत्ता का होना ही विषय का अपरोक्षत्व है । इसलिए प्रातिभासिक रजत का अपरोक्षत्व ( प्रत्यक्षत्व ) सिद्ध होने के लिए अविद्यावृत्ति को अवश्य ही मानना चाहिये—यह भाव है ।
शंका—आपके इस समाधान पर "एक ओर ध्यान दें तो दूसरी ओर का अनुसंधान छूट जाता है" अथवा 'एक को सम्हालने जायें तो दूसरा निकल जाता है' यह न्याय प्राप्त होता है, इस आशय से वादी की शंका और उसका सिद्धान्ती के द्वारा समाधान—
नन्विदंवृत्ते रजताकारवृत्तेश्च प्रत्येकमेकैक-विषय^१त्वे ^२गुरुमतवद्-विशिष्टज्ञानानभ्युपगमे कुतो भ्रमज्ञानसिद्धिरिति चेत् । न । वृत्ति-
१. 'यकत्वे०'-इति पाठान्तरम् ।
२. गुरुमतवत् प्रभाकरमतवत् । प्रभाकरमते 'इदं रजतम्' इति नैकं ज्ञानम् । अपितु इदमिति पुरोवर्तिद्रव्यमात्रविषयकं प्रत्यक्षम्, रजतमिति रजतविषयकं स्मरणम् । इति ग्रहण-स्मरणे एवं अगृहीत भेदे प्रवृत्तिप्रयोजयतः । इयांस्तु विशेषः—प्राभाकरमते ग्रहण-स्मरणात्मकमितिज्ञानद्वयम् । युष्मन्मते अन्तःकरणवृत्तिः आविद्यकवृत्तिश्चेति । एव चाख्यातिमतप्रवेशापत्तिः । अविद्यातत्परिणामादिकल्पनापेक्षया क्लृप्तसंस्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वकल्पनस्यैव युक्तत्वादिति शंकाकर्तुराशयः ।