वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवृत्तिव्याप्तेरावश्यकता ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११५
येद¹मंशाकारानुभवाहित-संस्कारजन्यत्वादिदमाकारानुभव-विषयता, न त्वहं रजतमित्यहमाकारानुभव-विषयतेत्यनुसन्धेयम् ।।
**अर्थ—**प्रकृत में (शुक्ति रजत–इस उदाहरण में) प्रातिभासिक रजत, यद्यपि प्रमातृचैतन्य से अभिन्न जो इदमंशावच्छिन्न-चैतन्य, तन्निष्ठ अविद्या का कार्य है, तथापि व्यावहारिक सत्यरजत का 'यह रजत' इत्याकारक जो इदमंशाकार अनुभव, उससे उत्पन्न हुए जो संस्कार, उन संस्कारों से उत्पन्न होने के कारण (उसे) 'यह रजत' इस इदमाकार अनुभव का विषयत्व होता है। क्योंकि उस प्रातिभासिक रजत की उपादान जो अविद्या है, वह 'यह रजत' इस व्यावहारिक सत्य रजत के अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कार से युक्त रहती है। इसलिए उस प्रातिभासिक रजत का 'यह रजत' ऐसा अनुभव आता है। व्यावहारिक रजत का 'मैं रजत' ऐसा अनुभव आता है। व्यावहारिक रजत का 'मैं रजत' ऐसा अनुभव न आने से प्रातिभासिक रजत का भी 'मैं रजत' यह अनुभव नहीं होता—समझना चाहिये।
**विवरण—**प्रातिभासिक रजत, इदमंशावच्छिन्न-चैतन्यनिष्ठ अविद्या का कार्य है, और वह चैतन्य, प्रमातृचैतन्य से अभिन्न है। इस कारण वह, चैतन्यनिष्ठ अविद्या का कार्य है—यह सच है। तथापि उसके सहकारी कारण जो पूर्वसंस्कार हैं, वे 'अहं रजतम्' मैं रजत—इस अहमाकार अनुभव से उत्पन्न हुए नहीं हैं, क्योंकि व्यवहार में सत्य रजत का जो अनुभव आता है वह 'यह रजत' इस प्रकार आता है, 'मैं रजत' ऐसा नहीं। इसलिये 'यह रजत' इस अनुभव से उत्पन्न संस्कारों से युक्त अविद्या के कार्यरूप प्रातिभासिक रजत को नियमेन इदमाकारानुभव-विषयत्व ही रहता है। अहमाकारानुभव-विषयत्व नहीं।
इस पर सिद्धान्त्येकदेशी की शंका और सिद्धान्ती के द्वारा उसका निरसन—
नन्वेवमपि मिथ्यारजतस्य साक्षात्साक्षि-सम्ब²न्धितया भानसम्भवे रजतगोचर-ज्ञानाभासरूपाया³ अविद्यावृत्तेरभ्युपगमः किमर्थः ? इति चेत् । न⁴। स्वगोचर-वृत्त्युपहित-चैतन्यभिन्न-सत्ताकत्वाभावस्य विषयापरोक्ष⁵रूपतया रजतस्यापरोक्षत्वसिद्धये तदभ्युपगमात् ।
१. 'दमाका०'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'म्बद्धत०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'पाऽविद्या०'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'उच्यते०'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'त्वरूप०'—इति पाठान्तरम् ।