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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 482 में से

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पृष्ठ 177

प्रातिभासिकव्यावहारिकयोर्भेदः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११९

यह कहना पड़ता है। इस कारण 'यह रजत' भ्रमात्मक ज्ञान है यह आप का सिद्धान्त बाधित होता है। और आप का प्रभाकर मत में प्रवेश हो जाता है। अर्थात् स्वसिद्धान्त-भंग और प्रभाकर मत में प्रवेश ये दो दोष आप पर आते हैं।

जिनके विषय भिन्न-भिन्न हैं ऐसी 'इदमाकार' और 'रजताकार' वृत्तियाँ यद्यपि भिन्न-भिन्न हैं तथापि उन दोनों वृत्तियों में प्रतिबिम्बित हुआ चैतन्य एक ही है। सब प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान में वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य, प्रमातृचैतन्य, (अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य) और विषयावच्छिन्न चैतन्य, इन तीनों चैतन्यों का पूर्वोक्त प्रकार से ऐक्य होना अवश्य है। भ्रान्त प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय व्यावहारिक सत्य (पुरोवर्ती शुक्ति आदि वस्तु) और प्रातिभासिक रजतादि वस्तुओं का तादात्म्य है। इससे उस भ्रान्त रजत ज्ञान को विशिष्टज्ञानत्व भी है और भ्रमत्व भी है।

यस्मात् एक ही साक्षिज्ञान में सत्यासत्यवस्तुविषयत्व है (साक्षिज्ञान का विषय सत्यवस्तु होता है और असत्य वस्तु भी)। तस्मात् साम्प्रदायिकों ने 'साक्षिज्ञान मे अप्रामाण्य है' यह जो कहा है वह ठीक ही है।

इस पर नैयायिकों की शंका और उसका समाधान—

ननु¹ सिद्धान्ते देशान्तरीय-रजतमप्यविद्याकार्यमध्यस्तं चेति कथं शुक्तिरूप्यस्य ततो वैलक्षण्यमिति चेत्। न। तन्मते सत्यत्वा-विशेषेऽपि केषाञ्चित्क्षणिकत्वं केषाञ्चित्स्थायित्वमित्यत्र यदेव,² नियामकं, तदेव³ स्वभावविशेषादिकं ममापि।

**अर्थ—**आप के सिद्धान्त के अनुसार देशान्तरीय रजत भी अविद्या का कार्य और अध्यस्त है। तब शुक्तिरूप्य को उससे वैलक्षण्य कैसे ? यह यदि आप पूछें तो वह कोई दोष नहीं है। क्योंकि आप के (नैयायिकों के) मत में समस्त कार्यों की सत्यता यद्यपि एक सी है तथापि उनमें से कुछ कार्यों में क्षणिकत्व और कुछ कार्यों में स्थायित्व माना है। परंतु यह मानने में नियामक (कारण) क्या है ? पूछने पर, स्वभाव


१. पूर्वोक्तभाष्यानुसारेण ब्रह्मस्वरूपज्ञानव्यतिरिक्तस्य सर्वस्यापि ज्ञानस्य भ्रमात्मक-त्वमवगम्यते, भ्रमत्वं च अनिर्वचनीयतत्कालोत्पन्नवस्तुविषयत्वेनेति भवतां मतम्। तच्च यदि इदमुपपन्नं स्यात्, तर्हि घटादेर्व्यावहारिकत्वं शुक्तिरूप्यादेश्च प्रातिभासिकत्वं कुतः ? उभयोरपि अविद्याकार्यत्वाविशेषेण तन्नियामकमन्तरा तदसम्भवात्। यद्यपि मूलाविद्या-कार्यत्वेन व्यावहारिकत्वं, तूलाविद्याकार्यत्वेन प्रातिभासिकत्वमिति विशेषः संभवति, तथाप्ययं विशेषः शुक्तिरूप्यादीनामपि मूलाविद्याकार्यत्वपक्षे न संभवतीति शंकाकर्तुराशयः।
२. 'व स्वभावविशेषादिकं नि०'-इति पाठान्तरम्।
३. 'व ममापि०'-इति पाठान्तरम्।

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