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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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पृष्ठ 178
१२०वेदान्तपरिभाषा[ प्रातिभासिकव्यावहारिकयोर्भेदः

विशेषादिक ही उनमें नियामक है, यह आप उत्तर देते हैं। अर्थात् घटादिकों से शुक्तिरूप्य की विलक्षणता में भी नियामक मेरे मत में स्वभावविशेषादिक ही हैं।

विवरण—इतने महाप्रयास से शुक्तिरूप्य में अविद्याकार्यत्व और अध्यस्तत्व आप किसलिए सिद्ध कर रहे हैं? देशान्तरीय रजत से शुक्तिरजत का वैलक्षण्य सिद्ध करने के लिये ही कर रहे हैं। परन्तु इतना प्रयास करने पर भी व्यावहारिक सत्यरजत और शुक्तिरजत का वैलक्षण्य आप के सिद्धान्त के अनुसार नहीं हो पाता। क्योंकि आप अद्वैती, देशान्तरीय व्यावहारिक सत्य रजादिकों में भी अविद्याकार्यत्व और अध्यस्तत्व बताते हैं। तब शुक्तिरजत और देशान्तरीय रजत में विलक्षणता दिखाने के लिए आप के मत में कौन सा विशेष हेतु है? अर्थात् कोई नहीं। यह उपर्युक्त शंका का आशय है।

सिद्धान्ती—आप के (नैयायिकों के) मत में शब्द, ज्ञान, इच्छा इत्यादि गुण और घटादि अन्य पदार्थ, इन सब में सत्यत्व यद्यपि एक-सा है तथापि उनमें से शब्दादिकों में क्षणिकत्व है और घटादिकों में स्थिरत्व होता है। इस वैलक्षण्य के मानने में जो नियामक (कारण) है, वही मेरे मत में शुक्तिरजत और देशान्तरीय रजत के वैलक्षण्य का नियामक है।

द्रव्यादि अनेक सत्य पदार्थों में से घटादि पदार्थों को अक्षणिकत्व है और शब्द, ज्ञान, इच्छा इत्यादिकों को क्षणिकत्व है—इस विषय में स्वभावविशेष को नियामक, जैसे आप मानते हैं, वैसे ही अद्वैत सिद्धान्ती भी उसी को नियामक मानते हैं। अतः 'यश्चोभयोः समो दोषः परिहारस्तयोः समः' जो दोष दोनों पक्षों में समान हो तो उसका परिहार भी दोनों पक्षों में समान ही होता है।

उनमें से एक पक्षवाले को दूसरे पक्ष पर उस दोष को देना उचित नहीं है। अतः आप के द्वारा हमें इस तरह प्रश्न किया जाना अनुचित है।

अब सिद्धान्ती 'यद्वा' ग्रन्थ से अपने पक्ष में एक और भी वैलक्षण्य उसका नियामक है—बताते हैं।

यद्वा¹ घटाद्यध्यासे अविद्यैव दोषत्वेनापि हेतुः, शुक्तिरूप्याद्य-ध्यासे तु काचादयो² दोषा अपि। तथा चागन्तुक³दोष-जन्यत्वं


१. घटाद्यध्यासस्य अविद्यादोषजन्यत्वेऽपि अविद्यातिरिक्तकाचादिदोषाऽजन्यत्वात् घटादीनां न भवति, शुक्तिरूप्यादीनां तु अविद्यातिरिक्तदोषजन्यत्वात् भवतीत्याशयेनाह—'यद्वे'ति'।
२. 'योऽपि दोषाः'—इति पाठान्तरम्।
३. आगन्तुकदोषजन्यत्वं काचादिदोषजन्यत्वम्। इदं स्वाप्निकानां मूलाविद्याकार्य-त्वमितिपक्षानुरोधेन। तथा च सिद्धान्तलेशसङ्ग्रहे—"स्वप्नाध्यासस्यापि अनवच्छिन्न-