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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 482 में से

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पृष्ठ 179

स्वाप्नपदार्थविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १२१

प्रातिभासिकत्वे प्रयोजकम्। अत एव१ स्वप्नोपलब्धारथादीनामा- गन्तुक-निद्रादिदोषजन्यत्वात्प्रातिभासिकत्वम्॥

अर्थ— अथवा घटादिकों के अध्यास में अविद्या ही दोषत्व से कारण रहती है। परन्तु शुक्तिरूप्यादिकों के अध्यास में काचादि दोष भी कारण बनते हैं। इस कारण आगन्तुक दोषजन्यत्व शुक्तिरजतादिकों के प्रातिभासिकत्व में निमित्त है, और आगन्तुक दोषजन्यत्व, प्रतीत होने वाले शुक्तिरजतादिकों के प्रातिभासिकत्व में नियामक होने से ही स्वप्न में उपलब्ध होने वाले रथादिकों को प्रातिभासिकत्व (भ्रान्तत्व) है। क्योंकि उनमें आगन्तुक निद्रादिदोष-जन्यत्व है।

विवरण— सिद्धान्तियों ने प्रातिभासिक रजत और व्यावहारिक सत्य-रजत के वैलक्षण्य में स्वभावविशेषादिक एक नियामक बताया था। अब दूसरे प्रकार का वैलक्षण्य भी उसमें नियामक है। यह बताने के लिये वे कहते हैं—घटादि व्यावहारिक पदार्थ, चैतन्य पर अध्यस्त हैं। वे पदार्थ अविद्या से ही पैदा हुए हैं। और वह अविद्या ही (चैतन्य का अज्ञान ही) उस अध्यास के होने में दोष रूप से कारण भी हैं। (अविद्या-रूप दोष से ही घटादिकों का चैतन्य पर आरोप होता है), पर शुक्तिरूप्यादि के अध्यास में शुक्ति आदिकों का अज्ञान रजतादिकों का कारण बनकर सिवाय काचादिक दोष भी उसमें कारण हैं। (व्यावहारिक पदार्थों का चैतन्य पर अध्यास होने में मूलाविद्या ही कारण है, वह एक दोष है। परन्तु शुक्तिरूप्यादि अध्यास में तूलाविद्या कारण है और काचादि दोष उसके सहकारी रहते हैं)। इस कारण आगन्तुक दोषजन्यत्व (क्षणिक दोष से पैदा होना) रजतादिकों के प्रातिभासिकत्व में कारण है। इसलिये स्वप्न में दीखने वाले रथादि, आगन्तुक निद्रादि दोषजन्य होने से प्रातिभासिक हैं।

इस पर अख्यातिवादी की पुनः शङ्का और निरसन—

२ननु स्वप्नस्थले पूर्वानुभूत-रथादेः स्मरणमात्रेणैव ३-व्यवहारो- पपत्तौ न रथादि-सृष्टि-कल्पनं गौरवादिति, चेत्। न। रथादेः

चैतन्ये अहंकारोपहितचैतन्ये वाऽवस्थाज्ञानशून्येऽध्यासात् मूलाज्ञानकार्यतायामविद्यातिरिक्त- निद्रादिदोषजन्यतयैव प्रातिभासिकत्वम्।"


१. अतएव अविद्यातिरिक्तदोषजन्यत्वस्य प्रातिभासिकत्व-प्रयोजकत्वादेव। स्वाप्न-रथादौ अपि निद्रारूपदोषजन्यत्वं विद्यते, प्रातिभासिकत्वं च विद्यत इत्याशयः।
२. स्वप्ने समुपस्थितानां रथादीनां प्रातिभासिकत्वाभ्युपगमे तेषां तत्कालोत्पत्ति-र्वक्तव्या, सा चानुपपन्ना, स्मरणमात्रेण प्रातिभासिकव्यवहारोपपत्तौ सृष्टिकल्पनाऽनो-चित्यादित्यख्यातिवादी शङ्कते।
३. 'व प्रातिभासिकत्व-व्य०'-इति पाठान्तरम्।