वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२२ वेदान्तपरिभाषा [ स्वप्नपदार्थविचारः
^१स्मरणमात्राभ्युपगमे रथं पश्यामि स्वप्ने रथमद्राक्षमित्याद्यनुभव-विरोधापत्तेः, ^२‘अथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते’ बृ० ४।३।१० इति रथादि-सृष्टि-प्रतिपादक-श्रुतिविरोधापत्तेश्च । तस्माच्छुक्तिरूप्य ^३वत् स्वप्नोपलब्ध-रथादयोऽपि प्रातिभासिकाः यावत्प्रतिभासमवतिष्ठन्ते ^४ ॥
**अर्थ—**स्वप्न में पूर्वानुभूत रथादिकों के केवल स्मरण से ही उनके व्यवहार का सम्भव होने से स्वप्न में रथादिकों की उत्पत्ति की कल्पना करना योग्य नहीं है। क्योंकि उसमें गौरव दोष होता है। परन्तु यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि स्वप्न में रथादिकों का केवल स्मरण मान लेने पर 'मैं रथ को देखता हूँ' 'मैंने स्वप्न में रथ को देखा' इत्यादि अनुभव से विरोध होता है। उसी तरह "स्वप्न में रथादि नहीं होते। परन्तु यह स्वप्नद्रष्टा रथ, घोड़े, मार्ग आदि को उत्पन्न करता है" इत्यादि रथादिकों की उत्पत्ति का प्रतिपादन करने वाली श्रुति के साथ विरोध होता है। इसलिए स्वप्न में उपलब्ध होने वाले रथादिक भी, शुक्तिरूप्य की तरह प्रातिभासिक हैं। जब तक प्रतिभास रहता है तब तक वे प्रातिभासिक रथादिक अवस्थित होते हैं (रहते हैं)।
**विवरण—**स्वप्न के रथादिक प्रातिभासिक (भ्रान्त) हैं, यह मानने पर उनकी तात्कालिक उत्पत्ति होती है मानना होगा। (जिस समय प्रतिभास होता है उसी समय वे उत्पन्न होते हैं।) परन्तु उनकी वैसी तत्कालीन उत्पत्ति का होना सम्भव नहीं,
१. 'स्मृतिमा०'-इति पाठान्तरम् ।
२. स्वप्ने रथादीनां स्मरणमात्रमिति पक्षे पश्यामीति चाक्षुषत्वानुभवो नोपपद्यते । यद्यपि स्वप्ने चक्षुरादीनि उपरतानि, यद्यपि च प्रातिभासिकानामज्ञातसत्त्वानभ्युपगमात् प्रातिभासिकचक्षुरादिकल्पनमपि न संभवति तथापि चक्षुर्ग्राह्यत्वमात्रकल्पनया चाक्षुषानुभवस्य भ्रमरूपस्य कल्पनायां न दोषः । तदुक्तं सिद्धान्तलेशे "तस्मात् सर्वथापि स्वप्ने चक्षुरादिव्यापारासंभवात् स्वाप्नगजादौ चाक्षुषत्वानुभवो भ्रमः ।" अत एव "रथादाविन्द्रियग्राह्यत्वमपि प्रातिभासिकम्, तदा सर्वेन्द्रियाणामुपरमात्" इत्युत्तरग्रन्थोऽपि उपपद्यते ।
३. 'प्यादिव०' इति पाठान्तरम् ।
४. स्वाप्निकानुभवः अन्यथाख्यातिरेवेति कस्यचिन्मतमपि अयुक्तम् । जाग्रद्भोगप्रदकर्मोपरमे सति स्वाप्नभोगप्रदकर्माभिव्यक्त्यनन्तरं रथान्, रथयुक्तानश्वान् मार्गांश्च सृजते इति तत्सृष्टिप्रतिपादकश्रुत्या गौरवस्य प्रामाणिकतया उक्तप्रतीतेरन्यथानयनमयुक्तम् । यद्यपीदं सर्वमसृजतेति श्रुतिसिद्धानां सृज्यमानानामाकाशादीनां न प्रातिभासिकत्वम् तथापि अयंशब्दस्वारस्येन आगन्तुकदोषजन्यत्वं स्वाप्निकानामेव, नाकाशादीनाम् । अतएव "मायामात्रं तु कात्स्न्र्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात्" इति सूत्रोपपत्तिः । प्रातिभासिकाः प्रतिभासनियतसत्ताकाः ।