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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 482 में से

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स्वाप्नपदार्थविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेद १२३

क्योंकि केवल स्मरण से ही उनके व्यवहार की उपपत्ति लग जाती है। इसलिए तत्कालीन उत्पत्ति की कल्पना करना अयोग्य है, इस आशय से अख्यातिवादी कहता है—"स्वप्न में जाग्रत्काल में अनुभव किये हुए रथादि वस्तुओं के केवल स्मरण से ही 'मैं रथ देखता हूँ' इत्यादि व्यवहार का सम्भव हो सकता है। इसलिये स्वप्न में रथादिकों की उत्पत्ति की कल्पना नहीं की जा सकती। क्योंकि केवल स्मरण से ही व्यवहार की उपपत्ति लग जाने से रथादि की कल्पना करने में गौरव है।

सिद्धान्ती, अख्यातिवादी की इस शंका का समाधान; प्रतीतिविरोध दिखाकर 'न०' इत्यादि ग्रन्थ से करता है—यह शङ्का उचित नहीं है। (स्वप्न में पहले देखे हुए हुए रथादिकों का केवल स्मरण होता है—यह कहना ठीक नहीं) क्योंकि स्वप्न में 'मैं इस समय रथ देख रहा हूँ, गायन सुन रहा हूँ' ऐसा वर्तमानकालीन अनुभव होता है, परन्तु स्मरण, भूतकालीन अनुभव से उत्पन्न हुए संस्कारों का कार्य है। इसलिए स्वप्न में रथ, गायन, आदि का केवल स्मरण होता है—यह कहना अनुभव के विरुद्ध है।

शंका—किन्हीं दोषों के कारण 'मैं रथादि का स्मरण करता हूँ' इस स्मरण का अभान होता है और 'मैं रथ देखता हूँ और गाना सुनता हूँ,' ऐसी प्रतीति होती है।

समाधान—तो यह कहना भी उचित नहीं। क्योंकि स्वप्नकाल में दोषवश वैसी प्रतीत होती है, यह भी मान लें तब भी जाग्रदवस्था में उस दोष की निवृत्ति हुई रहती है। परन्तु उस दोषनिवृत्तिकाल में भी 'मैंने आज स्वप्न में रथ देखा, गाना सुना' यही प्रतीति होती है। इसके विपरीत 'पहिले देखे हुए रथ का मुझे आज स्वप्न में स्मरण हुआ, सुने हुए गाने का स्मरण हुआ' ऐसी प्रतीति नहीं होती। इसलिए पूर्वोक्त प्रत्यय का व्यवहार केवल स्मृति से उपपन्न नहीं होता। इस प्रकार पूर्वोक्त प्रत्यय से विरोध होने के कारण स्वप्नगत प्रत्यय को भी स्मृति नहीं कह सकते।

शंका—"जाग्रदवस्था में 'मैंने स्वप्न में रथादिकों को देखा' यह प्रतीति भी विरुद्ध नहीं है। क्योंकि स्वप्न की स्मृति, अनुभवाकार से उत्पन्न हुई होने से जाग्रदवस्था में उसका वैसा परामर्श होना, योग्य ही है। अर्थात् गौरवदोष से दूषित होनेवाली स्वप्न-रथ, रथादिकों की नवीन होने सृष्टि मानना योग्य नहीं है।"

समाधान—श्रुति-विरोध होने से अख्यातिवादी का यह कथन उपपन्न नहीं हो पाता। क्योंकि 'अथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते' जाग्रदवस्था में भोग देने वाला कर्म निवृत्त होकर, स्वप्न में भोग देने वाला कर्म अभिव्यक्त होने पर स्वप्नद्रष्टा जीव, रथ और उसके उपकरणभूत अश्वादि और उनके योग्य मार्ग आदि को पैदा करता है (बृ० उ० ४।३।१०) इस रथादिसृष्टि का प्रतिपादन करने वाली श्रुति के साथ विरोध होता है। श्रुति में स्वप्नद्रष्टा, रथादिकों को "पैदा करता है" यह स्पष्ट बताया है। इस