वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानलक्षणासन्निकर्षखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०१
'यह रजत' इत्याकारक प्रत्यक्षज्ञान का विषय नहीं हो सकता ) । यहाँ ज्ञान का ही प्रत्यासत्तित्व ( सामीप्य ) मानने पर वह्नि आदि को प्रत्यक्षत्व प्राप्त होता है, जिससे अनुमान आदिकों का उच्छेद होने का प्रसंग प्राप्त होगा ।
विवरण—'भ्रमज्ञान का विषय अनिर्वचनीय ( तत्कालोत्पन्न ) —पदार्थ न होकर अन्यत्र स्थित सत्य-पदार्थ उसका विषय है' यह कहना भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि भ्रमज्ञान का विषय सन्निकृष्ट ( समीप ) होता है, इसीलिये 'यह रजत' 'यह सर्प' 'यह जल' कहते हुए शुक्तिरजत, रज्जुसर्प, मृगजल आदि का अंगुलि से निर्देश करते हैं । वे रजतादि विषय यदि सन्निकृष्ट न होते तो वैसा अंगुलि-निर्देश न किया जाता । असन्निकृष्ट विषय का भान नहीं हो सकता, क्योंकि विषय का सान्निध्य भी—प्रत्यक्षज्ञान की सामग्री में से एक अंश है । शुक्तिरजत का ज्ञान, प्रत्यक्ष होता है । इसलिये उसका विषय सन्निकृष्ट ही होना चाहिये, बिना उसके वह हो ही नहीं सकता क्योंकि सुदूर प्रदेश में स्थित, वस्तु में प्रत्यक्षज्ञान के विषय होने की योग्यता ही नहीं रहती । इन्द्रियों से सन्निकृष्ट ( सम्बद्ध ) न हुई वस्तु, इन्द्रियों का विषय कैसे होगी, और इन्द्रियों के विषय न होनेवाले पदार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान कैसे होगा ।
शंका—भ्रमज्ञान के विषय का अलौकिक-सन्निकर्ष स्वीकार करने पर यह दोष नहीं होगा । ऐसा यदि कहें तो बताइये कि वह अलौकिक-सन्निकर्ष सामान्यरूप है या ज्ञान रूप है ? उसके सामान्य रूप होने में कोई प्रमाण नहीं । सामान्यलक्षणा-प्रत्यासत्ति माननेवाले तार्किक इस विषय में ऐसा कहते हैं—
महानस ( रसोईघर ) में अग्नि और धूम की व्याप्ति का ग्रहण करते समय धूमत्वेन और वह्नित्वेन—सकल धूम और सकल अग्नि-व्यक्तियों मन में उपस्थित होती हैं ( मन में धूमत्व और अग्नित्व जाति के द्वारा समस्त धूम और समस्त अग्नि की उपस्थिति होती है ) तदनन्तर उनके व्याप्य-व्यापक भाव का ग्रहण होता है । ( उनमें 'धूम' व्याप्य है और 'अग्नि' व्यापक है ऐसा ज्ञान होता है ) क्योंकि धूममात्र ( सकल धूमव्यक्ति ) व्याप्य है और अग्निमात्र ( सकल अग्निव्यक्ति ) व्यापक हैं—( यह ) ज्ञान न होता तो महानस के धूम और वहाँ की अग्नि की व्याप्ति से पर्वतीय धूम के दिखाई देने पर 'पर्वत पर अग्नि है' यह अनुमिति-ज्ञान न हुआ होता । किन्तु पर्वतीय धूम के देखते ही वहाँ पर अग्नि का अनुमिति ज्ञान होता है । उसकी उपपत्ति लगाने के लिये ही महानस में धूम और अग्नि की व्याप्ति के ग्रहण करते समय सकल धूम-अग्निव्यक्तियों की मन में उपस्थिति होने के लिये ही सामान्य लक्षणा ( सामान्यात्मिका ) प्रत्यासत्ति को अवश्य मानना पड़ता है ।
तार्किकों के उपर्युक्त कथन पर वेदान्तियों का कहना है कि—धूमत्व और अग्नित्व ( धूमसामान्य और वह्निसामान्य ) से अर्थात् सामान्यलक्षणा से सकल धूम और वह्नि व्यक्तियों की उपस्थिति होती है । ऐसा यदि माना जाय तो समस्त जीवों