वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०२ वेदान्तपरिभाषा [ ज्ञानलक्षण। सन्निकर्षखण्डनम्
को सर्वज्ञत्व अनायास ही प्राप्त होगा। क्योंकि--सामान्यलक्षणा-प्रत्यासत्ति भी एक सन्निकर्ष ही है। वह यदि असन्निहित (दूरस्थ) विषयों से भी होता हो तो भूत, वर्तमान और भविष्य काल की व्याप्तिमात्र से पुरुष को वह संयुक्त कर देगा, तब उसकी असर्वज्ञता में निमित्त ही क्या रहेगा। अर्थात् कोई निमित्त नहीं। अलौकिक-सन्निकर्ष के द्वारा पुरुष का त्रैकालिक पदार्थों से यदि संयोग होने लग जाय तो इसकी सर्वज्ञता अनायास ही सिद्ध है। अर्थात् तार्किक अपने को 'मैं सर्वज्ञ ईश्वर हूँ' मानने लग जाय तो उसे कौन मना कर सकेगा।
समीप स्थित धूमादि पदार्थों से संयुक्त हुए चक्षु मे भूत, भविष्य और दूरस्थित वर्तमान विषय के समर्पण करने का सामर्थ्य हमें तो दिखाई नहीं देता। (चक्षुरादि-इन्द्रिय-सन्निकृष्ट-पदार्थ से भिन्नकालीन तथा असन्निकृष्ट पदार्थ का ज्ञान कराने का सामर्थ्य उन-उन इन्द्रियों में होने का अनुभव हमें नहीं है) इसलिए अनुभव के विरुद्ध कल्पना करना—तुम्हारा साहस ही व्यक्त होता है।
हमारे (वेदान्तियों के) मत में महानस में ज्ञात हुई धूम-अग्नि की व्याप्ति से पर्वतीय अग्नि का अनुमान इस प्रकार होता है—
व्याप्तिज्ञान के समय महानसीय धूम और अग्नि का व्याप्य-व्यापकभाव, गोष्ठगत धूम और अग्नि का व्याप्य-व्यापक भाव, ऐसे ही भिन्न-भिन्न स्थानों में उनकी व्याप्ति देखकर धूम और अग्नि के व्याप्य-व्यापक भाव का निश्चय होता है। इस प्रकार प्रथम पृथक्-पृथक् धूमाग्नि के व्याप्य-व्यापकत्व का ज्ञान होने पर वह व्यक्ति पर्वतीय धूम अग्नि के व्याप्य-व्यापकभाव का अनुमान करता है—१—यह¹ धूम वह्निव्याप्य है। २—क्योंकि महानसादि में वैसा अनुभव आता है। ३—पृथिवीव्याप्य गन्ध के समान।
शंका—महानस आदि स्थानों में धूम से अग्नि के सम्बन्ध का प्रत्यक्षतया ग्रहण किये होने से देशान्तरीय और कालान्तरीय धूमादि का सम्बन्ध उपस्थित न होने से 'धूम' वह्नि-व्याप्य है या नहीं, यह संशय नहीं होगा। परन्तु सामान्य-लक्षणा के द्वारा सकल व्यक्तियों की उपस्थिति होने पर अन्य देशीय तथा भिन्न कालिक वह्नि-निरूपित व्याप्ति में सन्देह होगा।
समाधान—'समानप्रकारनिश्चयस्यैव संशयविरोधित्वात्'—समान-प्रकार-निश्चय में ही संशय-विरोधित्व रहता है—(प्रत्यक्ष हुए धूम-अग्नि के सम्बन्ध का निश्चय होने पर वह निश्चय, प्रत्यक्ष हुए धूम अग्नि की व्याप्ति में संदेह होने नहीं देगा, अर्थात् उसका विरोध करेगा। अप्रत्यक्ष रहने वाले धूमाग्नि की व्याप्ति में होने वाले संशय को वह नहीं रोक सकता। (अप्रत्यक्ष = देशान्तरीय और कालान्तरीय धूमाग्नि की व्याप्ति में अवश्य ही संशय होगा) पहले कह चुके हैं कि—अलौकिक-सन्निकर्ष, सामान्यात्मक है या ज्ञान रूप है? यह विकल्प कर उसमें कोई प्रमाण नहीं है। पहिले पक्ष में सन्निकृष्ट (समीपस्थित) धूमादि ही प्रत्यक्ष का विषय होता है। धूममात्र (सर्वधूम =
१. 'अयं धूमः वह्निव्याप्यः, महानसादौ तथानुभूतत्वात्, पृथिवीव्याप्यगन्धवत्' ।