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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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अनिर्बचनीयरजतोत्पत्तिः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०३

सार्वदेशिक और सार्वकालिक धूम ) प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय नहीं होता । इसलिए सामान्य-प्रत्यासत्ति की कल्पना नहीं की जा सकती ।

अब ज्ञानरूप अलौकिक-सन्निकर्ष के पक्ष में परिहार 'न च ज्ञानं०' आदि ग्रन्थ से किया जाता है ।

( भ्रान्ति ) भ्रम-प्रत्यक्ष-ज्ञान के विषय में ज्ञान ही प्रत्यासत्ति है— यह कथन अनुचित है । शुक्तिरजत में ज्ञान-सन्निकर्ष के होने में कोई प्रमाण नहीं है । भ्रान्तज्ञान के रजतादि विषयों से ज्ञानसन्निकर्ष के ( ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्ति ) मानने में दोष है—तथा च—ज्ञानलक्षणा-प्रत्यासत्ति से ही अनुमिति अग्न्यादि पदार्थों को प्रत्यक्षत्व प्राप्त होगा और ज्ञानरूप-सन्निकर्ष से पदार्थ का प्रत्यक्षज्ञान होने लगने पर अनुमानादि अन्य प्रमाणों का उच्छेद होने का प्रसंग आवेगा, कारण अलौकिक प्रत्यक्ष सामग्री, अनुमिति-ज्ञान की सामग्री से लाघव के कारण बलवती है । इस पर शंका और उसका समाधान—

ननु रजतोत्पादकानां रजतावयवा¹नामभावे शुक्तौ कथं तवापि रजतमुत्पद्यते इति चेत् । उच्यते । न हि लोकसिद्ध सामग्री प्रातिभासिक रजतोत्पादिका, किन्तु विलक्षणैव ।

अर्थ— रजतोत्पादक ( भ्रान्त रजत को उत्पन्न करनेवाले ) रजतावयवों के अभाव होने पर शुक्ति में रजतोत्पत्ति आप के पक्ष में भी कैसे हो सकेगी ? यदि पूछो तो बताते हैं—सत्यरजत की लोकसिद्ध सामग्री, 'प्रातिभासिक' रजत की उत्पादिका नहीं है ( लोकसिद्ध रजत-सामग्री भ्रान्त रजत को भी पैदा नहीं करती ) अपि तु प्रातिभासिक-रजत को उत्पन्न करनेवाली सामग्री लोकसिद्धसामग्री से अत्यन्त विलक्षण है ।

विवरण— 'ज्ञान में प्रत्यासत्तित्व है—मानने पर वह्न्यादिकों के प्रत्यक्ष होने का प्रसंग प्राप्त होता है और उससे अनुमानादि अन्य प्रमाणों का उच्छेद होने का प्रसंग आता है' यह दोष आप ( वेदान्ती ) हम पर ( तार्किकों पर ) देते हैं परन्तु 'शुक्ति-रजतस्थल में अपूर्वरजत की उत्पत्ति होती है' यह तुम्हारा ( वेदान्तियों का ) पक्ष भी असंगत है, क्योंकि—रजत के उपादान-कारण लौकिक रजतावयवों का शुक्ति में अभाव होने से वहाँ पर ( शुक्ति में ) रजतोत्पादक अलौकिक अवयवों का ही आप को स्वीकार करना होगा । परन्तु अलौकिक अवयवों को भ्रान्तरजत का उपादान मानने में कोई प्रमाण नहीं है—ऐसी आशंका करने पर सिद्धान्ती कहता है—

शुक्ति में रजत के अलौकिक अवयव यदि न हों तो उसकी उत्पत्ति का ही असम्भव होगा । परन्तु जब कि शुक्ति में रजत का प्रत्यय ( अनुभव ) होता है तब शुक्ति में अनिर्वचनीय रजतोत्पत्ति को 'परिशेष'न्याय से मानना आवश्यक हो जाता है । तन्नि-


१. वादीनां०-इति पाठान्तरम् ।