वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०० | वेदान्तपरिभाषा | [ ज्ञानलक्षणासन्निकर्षखण्डनम्
**अर्थ—**शुक्ति के कारण होनेवाले रजतज्ञान में की जाने वाली प्रवृत्ति, विसंवादि (मिथ्या) सिद्ध होती है। अर्थात् 'यह चाँदी है' (ऐसा) समझ उसे लेने के लिये प्रवृत्त होने पर हाथ में सीप आती है, इस कारण 'यह चाँदी है' इत्याकारक सीप में 'रजतज्ञान' भ्रम है, प्रमा (यथार्थ ज्ञान) नहीं है। यद्यपि यह सच है तथापि उस ज्ञान का विषय प्रातिभासिक (अनिर्वचनीय, प्रतीति काल में ही उत्पन्न होने वाला) रजतादि है—इस विषय में कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि अन्य स्थान में स्थित पूर्वसिद्ध रजत को ही तद्विषयत्व है (ऐसा) कह सकते हैं। सराफे में दूकान पर पूर्व से ही विद्यमान सत्य रजत उस शुक्तिरजतज्ञान का विषय हो सकता है।
विवरण—'यह चाँदी है' ज्ञान होने पर उसे लेने के लिए स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। उस हाथ में लेते ही सत्य रजत यदि हाथ लगा तो प्रवृत्ति संवादी है—कहा जाता है। उसे हाथ में लेकर देखने से यदि ज्ञात हुआ कि यह रजत न होकर सीप या अन्य कोई पदार्थ है तो प्रवृत्ति को विसंवादी प्रवृत्ति कहते हैं। शुक्ति-रजत ज्ञान से हुई प्रवृत्ति विसंवादी सिद्ध होती है। क्योंकि समीप पहुँचने पर दिखाई देता है कि यह रजत नहीं किन्तु 'शुक्ति' है। अतः इस विसंवादी प्रवृत्ति से शुक्तिरजतज्ञान का भ्रान्ति-ज्ञान होना सिद्ध होता है। परन्तु किसी प्रमाण के न होने से उस (भ्रम) ज्ञान का विषय, अनिर्वचनीय (उसी समय उत्पन्न हुआ =) प्रातिभासिक रजत नहीं है। (भ्रान्तिकाल में वह रजत उत्पन्न होता है इस विषय में प्रत्यक्षादि कोई प्रमाण नहीं है) यदि ऐसा कहें कि—'दूसरे विषय की अनुपपत्ति (असम्भव) ही अनिर्वचनीयरजत के विषय होने में प्रमाण है' तो यह अनुचित है, क्योंकि—अन्य प्रदेश (स्थान) में पहले से ही विद्यमान रजत, उस भ्रान्तिज्ञान का विषय हो सकता है।
'इति चेत्' ग्रन्थ से शंका का अनुवाद कर 'न०' आदि ग्रन्थ में उसका निरसन करते हैं—
इति चेत् न। तस्यासन्निकृष्टतया प्रत्यक्ष-विषयत्वायोगात्। 'न च ज्ञानं तत्र प्रत्यासत्तिः, ज्ञानस्य प्रत्यासत्तित्वे तत एव वह्नयादेः प्रत्यक्षत्वापत्तावनुमानाद्युच्छेदापत्तेः।
अर्थ—-'शुक्तिरजत' आदि भ्रान्तिज्ञान का विषय, 'तत्कालोत्पन्न अनिर्वचनीय रजत न होकर अन्यत्र स्थित सत्यरजत है' यदि कहें तो ठीक नहीं। क्योंकि अन्य प्रदेश में स्थित सत्य रजत, असन्निकृष्ट (दूर) रहता है। सन्निकृष्ट (समीप) न होने से ही 'यह रजत' इत्याकारक प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय नहीं हो सकता। (दूर स्थित सत्य रजत,
१. 'न च ज्ञानं तत्र प्रत्यासत्तिः-ज्ञानं ज्ञानलक्षणा तत्र देशान्तरीयरजतादौ, प्रत्यासत्तिः सन्निकर्षः।